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कॉरपोरेट की गोद में लोकतंत्र: रैलियों के शोर में पिसता गरीब और सत्ता के ढोल पीटता बाजार!

By,वामन पोटे

कॉरपोरेट की गोद में लोकतंत्र: रैलियों के शोर में पिसता गरीब और सत्ता के ढोल पीटता बाजार!
​राजधानी दिल्ली के चमकते हुए चौराहों और मॉल संस्कृति की चकाचौंध के पीछे एक ऐसी हकीकत सांस ले रही है, जो सिस्टम के नकाब को बेरहमी से नोच फेंकती है। एक तरफ व्यापारियों के सबसे बड़े संगठन CAIT (कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स) ने विपक्ष और राहुल गांधी की रैलियों के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए ‘धिक्कार दिवस’ मनाने का ऐलान किया है और संविधान के आर्टिकल 19(1)(G) का हवाला देकर अपनी आजीविका बचाने की दुहाई दी है। तर्क दिया जा रहा है कि प्रदर्शनों से कारोबार चौपट होता है। बात ठीक भी है, जब रास्ते ब्लॉक होंगे तो ठेले वाले और छोटे दुकानदार का चूल्हा कैसे जलेगा? लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह नाराजगी सिर्फ विपक्ष की रैलियों तक ही सीमित रहनी चाहिए? क्या सत्ता के सिंहासन पर बैठे हुक्मरानों की महा-रैलियों, वीवीआईपी मूवमेंट और जनता के पैसों से होने वाले राजनीतिक आयोजनों से देश का व्यापार और गरीब तबका कभी अछूता रहता है? तब यह संगठन अपनी जुबान क्यों सील लेते हैं?

​क्या व्यापारी और उद्योगपति सत्ता के मुखौटे बन चुके हैं?

​आज इस देश की आर्थिक और राजनीतिक सरज़मीन पर एक खतरनाक सच खुलकर सामने आ रहा है। वह यह कि क्या देश का बड़ा व्यापारिक नेतृत्व और कॉरपोरेट घराने अब अनजाने में नहीं, बल्कि पूरी तरह होशोहवास में सत्ता के नुमाइंदे और मुखौटे बन चुके हैं?
​जब-जब देश का मजदूर, किसान, बेरोजगार युवा और विपक्षी दल अपनी बदहाली, महंगाई, बेरोजगारी और कॉरपोरेट परस्त नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतरकर सरकार को आईना दिखाने की कोशिश करता है, तब-तब व्यापारियों और उद्योगपतियों के मंचों से ऐसी आवाजें क्यों गूंजने लगती हैं जो सीधे तौर पर सत्ता के एजेंडे को मजबूत करती हैं? क्या देश का व्यापारी वर्ग अब सिर्फ अपने चंद मुनाफे के खातिर उस व्यवस्था का मोहरा बन गया है, जो इस देश के गांव, गरीब, किसान और मजदूर की आखिरी सांस तक निचोड़ने में जुटी है?

​संविधान के पन्नों से चुनिंदा न्याय की बयार!

​CAIT ने राहुल गांधी को पत्र लिखकर याद दिलाया कि प्रदर्शन का अधिकार किसी की आजीविका छीनने का लाइसेंस नहीं है। बिल्कुल सही बात है। लेकिन इसी संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार भी दर्ज है।
​जब देश के कुछ गिने-चुने उद्योगपतियों को देश की पूरी की पूरी संपत्ति और संसाधनों की चाबी सौंपी जा रही है, जब छोटे दुकानदार ऑनलाइन ई-कॉमर्स दिग्गजों और मॉल संस्कृति की चक्की में पिसकर आत्महत्या करने को मजबूर हैं, तब यही व्यापारिक संगठन सरकार की नीतियों के खिलाफ एक शब्द क्यों नहीं बोलते? क्या संविधान के प्रावधान सिर्फ तब याद आते हैं जब विपक्ष कोई प्रदर्शन करे? सत्ता के गलियारों में जब जनता के हक पर डाका डाला जाता है, तब यही व्यापारी वर्ग अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर क्यों बैठ जाता है?

​गांव, गरीब और किसान की आवाज दबाने का षड्यंत्र?

​यह देश सिर्फ एयरकंडीशन कमरों में बैठकर जीडीपी के आंकड़े गढ़ने वालों का नहीं है। यह उन करोड़ों किसानों, मजदूरों, रेहड़ी-पटरी वालों और दिहाड़ी पर जीने वाले गरीबों के खून-पसीने से चलता है, जो हर रोज अपनी रोजी-रोटी की लड़ाई लड़ते हैं।
​लेकिन आज स्थिति यह है कि जब भी गांव और गरीब की आवाज संसद से लेकर सड़क तक गूंजती है, तो उस आवाज को दबाने के लिए बड़े-बड़े कॉरपोरेट तंत्र और व्यापारिक संघों के कंधे का इस्तेमाल किया जाता है। क्या व्यापारी और उद्योगपति आज उस व्यवस्था के साथ खड़े हैं जो असहमति के हर स्वर को कुचल देना चाहती है?
​अगर आज लोकतंत्र में विरोध करने का हक ही छीन लिया गया, और विपक्ष की हर रैली को ‘अराजकता’ बताकर जनता का ध्यान भटकाया जाता रहा, तो कल को वहशी नीतियां इन छोटे दुकानदारों और मध्यम वर्गीय व्यापारियों को भी नहीं छोड़ेगी। आज वक्त आ गया है कि व्यापारी समाज आईने में अपना चेहरा देखे और खुद से पूछे— क्या वह सच में देश के आम आदमी की रीढ़ है, या फिर सत्ता के सिंहासन पर बैठी उस तानाशाही व्यवस्था का मुखौटा, जो हर उस आवाज को मिटा देना चाहती है जो गरीब के हक की बात करती है?

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