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अन्नदाता की ठंड में ठिठुरती रातें और मंडी की चौखट पर लूट: बैतूल कृषि उपज मंडी में पिसता किसान

By,वामन पोटे

​अन्नदाता की ठंड में ठिठुरती रातें और मंडी की चौखट पर लूट: बैतूल कृषि उपज मंडी में पिसता किसान

​बैतूल 1 नवंबर :
मध्य प्रदेश के बैतूल जिला मुख्यालय पर स्थित बडोरा कृषि उपज मंडी, जिसे स्थानीय स्तर पर ‘लोचन मंडी’ के नाम से भी जाना जाता है, इन दिनों किसानों के लिए राहत की नहीं बल्कि यंत्रणा और शोषण का केंद्र बन चुकी है। राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा किसानों की आय दोगुनी करने और उनकी फसलों के सुगम विक्रय के चाहे जितने दावे किए जाएं, लेकिन बैतूल मंडी की जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। यहां खुलेआम चल रही व्यापारियों और हमालों की मनमानी, प्रशासनिक उदासीनता और बुनियादी सुविधाओं के आभाव ने अन्नदाता को दाने-दाने के लिए मोहताज कर दिया है।

​शेड गायब, बोरियों का कब्जा और ठंड में ठिठुरते किसान

​मंडी परिसर में प्रवेश करते ही व्यवस्थाओं की पोल खुल जाती है। हालात यह हैं कि किसानों को अपनी उपज रखने के लिए शेड के नीचे तो दूर, खुले परिसर में भी बमुश्किल जगह मिलती है। मंडी के शेड्स पर व्यापारियों द्वारा पहले से खरीदी गई उपज के बोरियों के बड़े-बड़े ढेर इस तरह कब्जा जमाए बैठे हैं कि नए आने वाले किसानों के लिए पैर रखने की भी जगह नहीं बचती।
​नतीजतन, किसानों को मजबूरन खुले आसमान के नीचे या ट्रॉलियों के पास अपनी फसल का ढेर लगाना पड़ रहा है। हालात इतने बदतर हैं कि शनिवार और रविवार को नीलामी ठप रहने के कारण किसानों को कड़ाके की ठंड में खुले में रातें गुजारनी पड़ रही हैं। ठंड से बचने के लिए किसान बोरियों को ओढ़कर रात बिताने को मजबूर हैं, लेकिन इस मानवीय संकट पर भी मंडी प्रशासन की आंखें नहीं खुलतीं।

​तौल के नाम पर अवैध उगाही और मनमानी

​मंडी में केवल नीलामी की सुस्ती ही नहीं, बल्कि हम्मालों और व्यापारियों द्वारा की जाने वाली अवैध वसूली भी किसानों का आर्थिक खून चूस रही है। किसानों का आरोप है कि मंडी परिसर में नियमों को ताक पर रखकर हर स्तर पर उनकी लूट की जा रही है।
​मण्डईबुजुर्ग के किसान अमरचंद यादव अपनी आपबीती सुनाते हुए कहते हैं कि उन्होंने लगभग 50 बोरे मक्का शनिवार को बेचने के लिए लाई थी। व्यापारी ने उपज की नीलामी तो कर दी, लेकिन जब हम्माल तौलने आए तो उन्होंने सीधे तौर पर 1500 रुपए की मांग कर दी। अमरचंद के अनुसार, वे तौल के एवज में 300 रुपए देने को तैयार थे, लेकिन हम्माल इससे कम पर राजी नहीं हुए और पैसे न मिलने पर मक्का तोलने से साफ मना कर दिया। अब वे मजबूरी में मंडी में फंसे हुए हैं।
​कुछ ऐसा ही हाल अर्जुनवाड़ी के विजय वाड़िवा और खड़ला के राजू देशमुख का है। उनका कहना है कि वे शुक्रवार और शनिवार से मंडी में अपनी फसल का ढेर लगाकर बैठे हैं, लेकिन व्यापारियों ने बिना किसी ठोस कारण के नीलामी रोक दी। अब उन्हें मजबूरन सोमवार तक का इंतजार करना पड़ रहा है।
​दूसरी ओर, राहुल धुर्वे नामक किसान ने लगभग 90 बोरे मक्का मंडी में लाई थी, जिसे व्यापारियों ने ‘गीली’ बताकर खरीदने से इनकार कर दिया और फसल वापस घर ले जाने का दबाव बनाने लगे। किसानों का कहना है कि भारी किराया भाड़ा खर्च कर ट्रैक्टर-ट्रॉली से उपज मंडी तक पहुंचाई जाती है, और ऐसे में उपज वापस ले जाना या मनमाने दामों पर बेचना उनकी नियति बन चुका है।

​प्रशासनिक मौन और सांठगांठ के गंभीर आरोप

​स्थानीय किसानों और जानकारों का आरोप है कि बैतूल की इस मंडी में अधिकारी पूरी तरह से व्यापारियों के इशारों पर काम कर रहे हैं। नियम यह कहता है कि किसानों को उपज बेचने के 24 घंटे के भीतर भुगतान मिल जाना चाहिए, लेकिन मंडी के अधिकारी कभी यह जांचने की जहमत नहीं उठाते कि व्यापारियों द्वारा जारी खरीदी पत्रक के बाद वास्तव में किसानों के खातों में भुगतान पहुंचा है या नहीं।
​किसानों का यह भी गंभीर आरोप है कि व्यापारी ‘झाड़ू’ या अन्य बहाने बनाकर प्रति क्विंटल 500 ग्राम से ज्यादा उपज किसानों से अवैध रूप से काट लेते हैं। यदि कोई किसान इसका विरोध करे या आवाज उठाए, तो व्यापारी नीलामी रुकवाकर अपनी दादागिरी दिखाते हैं। इस पूरे तंत्र में बिचौलियों और हमालों की सांठगांठ इतनी मजबूत है कि किसान अंततः परेशान होकर बिचौलियों के हाथों औने-पौने दामों पर अपनी उपज बेचने को मजबूर हो जाते हैं।

​बेपरवाह जिम्मेदार

​मंडी की इस बदहाल व्यवस्था और किसानों के शोषण के संबंध में जब बैतूल कृषि उपज मंडी सचिव सुरेश परते से उनका पक्ष जानने के लिए दूरभाष पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो  अधिकारियों ने फोन उठाना मुनासिब नहीं समझा।
​जब देश का अन्नदाता अपनी मेहनत की फसल बेचने के लिए कड़ाके की ठंड में मंडी के फर्श पर रातें बिताने को मजबूर हो और प्रशासन कुंभकर्णी नींद में सो रहा हो, तो यह व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। बैतूल की इस मंडी के हालात चीख-चीखकर कह रहे हैं कि कागजी विकास के दावों के बीच असल किसान आज भी बिचौलियों और प्रशासनिक उदासीनता की चक्की में पिस रहा है।
​एक नज़र में मुख्य समस्याएं:

​3 दिनों तक नीलामी बंद: शुक्रवार-शनिवार को आने वाले किसानों को सोमवार तक का इंतजार, खुले आसमान के नीचे ठंड में बोरे ओढ़कर बितानी पड़ रही रातें।

​तौल के नाम पर अवैध वसूली: हम्मालों द्वारा 1500 रुपए तक की मांग, पैसे न देने पर तौल से इनकार।

​जगह का अभाव: शेड्स पर व्यापारियों के बोरियों का कब्जा, किसानों को परिसर में जगह नहीं।

​गुणवत्ता के नाम पर मनमानी: मक्का को ‘गीला’ बताकर खरीदने से इनकार और वापस भेजने का दबाव।

​प्रशासनिक उदासीनता: मंडी सचिव द्वारा फोन न उठाना और शिकायतों पर कोई कार्रवाई न होना।

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