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क्लाइमेट रिस्क: मध्य प्रदेश में बदलता मौसम बना रहा नया संकट, शहरी कंक्रीट और ग्रामीण इलाकों पर मंडरा रहा बड़ा खतरा

By,वामन पोटे

क्लाइमेट रिस्क: मध्य प्रदेश में बदलता मौसम बना रहा नया संकट, शहरी कंक्रीट और ग्रामीण इलाकों पर मंडरा रहा बड़ा खतरा

​विशेष रिपोर्ट: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट और वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (WRI) के नए अध्ययन ने खोली मध्य प्रदेश में जलवायु परिवर्तन की जमीनी हकीकत। राज्य में एक जैसी नहीं है आपदा, हर जिले और क्षेत्र के हिसाब से बदल रही है रणनीति।
​बैतूल / भोपाल :
मध्य प्रदेश में जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की कोई दूर की आहट नहीं, बल्कि वर्तमान का एक कड़वा सच बन चुका है। साल 2025 के दौरान मौसम संबंधी चरम घटनाओं और आपदाओं की वजह से राज्य में 537 लोगों की जान चली गई। पर्यावरण और विकास के क्षेत्र में काम करने वाले प्रतिष्ठित संगठन सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (CSE) की इस रिपोर्ट ने नीति निर्माताओं के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। राज्य के अलग-अलग हिस्सों में कहीं भीषण गर्मी, कहीं बेमौसम बारिश और सूखा, तो कहीं भूजल और बोरवेल पर बढ़ता दबाव आम जनजीवन और आजीविका के लिए गंभीर चुनौती बनकर उभरा है।
​इसी खतरे की गहराई को समझने और उससे निपटने के उपाय तलाशने के लिए वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (WRI) ने मध्य प्रदेश में एक विस्तृत जलवायु जोखिम (Climate Risk) अध्ययन किया है। डब्ल्यूआरआई की सीनियर प्रोग्राम रिसर्च स्पेशलिस्ट अनन्या चक्रवर्ती और अन्य विशेषज्ञों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में जलवायु जोखिम एक जैसा बिल्कुल नहीं है। यही वजह है कि राज्य के बड़े शहरों से लेकर ग्रामीण और वन क्षेत्रों तक, हर जगह की स्थानीय समस्याओं के हिसाब से अलग-अलग समाधान खोजने पर जोर दिया जा रहा है।

​5 बड़े शहरों का हाल: एक ही शहर में तापमान का भारी अंतर

​WRI की रिसर्च में मध्य प्रदेश के पांच प्रमुख शहरों का गहराई से अध्ययन किया गया है, जहां जलवायु और कंक्रीट का असर अलग-अलग रूप में सामने आया है:

​भोपाल: शहर के भीतर ही तापमान में 4 से 6 डिग्री सेल्सियस तक का अंतर दर्ज किया गया है। जिन इलाकों में हरियाली और झीलें हैं, वहां प्राकृतिक ठंडक है, लेकिन घनी बसावट और कम छायादार क्षेत्रों में तापमान आसपास के रिहायशी इलाकों की तुलना में काफी ज्यादा है।

​इंदौर: तेज शहरीकरण, बढ़ती निर्माण गतिविधियों और अनियमित बारिश ने गर्मी के जोखिम को बढ़ा दिया है। औद्योगिक और कामकाजी क्षेत्रों में लंबे समय तक धूप या गर्मी में काम करने वाले मजदूरों की उत्पादकता और पारिवारिक आय पर इसका बुरा असर पड़ रहा है।

​ग्वालियर: शहर के घने और कंक्रीट से पटे हुए मध्य हिस्से में इमारतें और सड़कें गर्मी को सोखकर लंबे समय तक वातावरण में बनाए रखती हैं, जिससे शहर के इस हिस्से में हीट-स्ट्रेस का खतरा अधिक है।

​जबलपुर: यद्यपि शहर के पास जंगल, खुले क्षेत्र और जल स्रोत प्राकृतिक राहत देते हैं, लेकिन WRI के अनुसार शहर की करीब 49% आबादी के आसपास गर्मी से राहत देने वाली पर्याप्त हरियाली उपलब्ध ही नहीं है।

​उज्जैन: धार्मिक पर्यटन के कारण शिप्रा के घाटों और खुले स्थानों पर भारी भीड़ रहती है। सीमित छाया वाले इन स्थानों पर बढ़ती गर्मी का सीधा असर स्थानीय निवासियों के साथ-साथ दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों पर पड़ रहा है।

​ग्रामीण और वन क्षेत्र: खेती, जमीन और आजीविका पर संकट

​शहरों की कंक्रीट की दीवारों से इतर, गांवों की कहानी भी चिंताजनक है। WRI की ग्रामीण रिसर्च के अनुसार, किसान केवल पानी की कमी से नहीं, बल्कि अनियमित और बेमौसम बारिश से भी बुरी तरह जूझ रहे हैं। बेमौसम बारिश फसलों में फूल आने की प्रक्रिया को बाधित करती है, जिससे दाने कमजोर होते हैं और कीटों का प्रकोप तेजी से बढ़ता है। मानसून में देरी होने के कारण भूजल रिचार्ज नहीं हो पाता, जिससे गर्मियों में ग्रामीण इलाकों में पेयजल संकट गहरा जाता है।

​बड़वानी और सीधी: अध्ययन में बताया गया है कि जमीन और पानी की खराब होती स्थिति सीधे तौर पर ग्रामीण परिवारों की आय पर असर डालती है। मिट्टी की गुणवत्ता घटने से खेती प्रभावित होती है, जिसके चलते स्थानीय लोगों की भागीदारी से प्रकृति संसाधनों को बहाल करने की मांग जोर पकड़ रही है।

​बैतूल – बदलाव को समझने का जमीनी मॉडल: बैतूल जिला मध्य प्रदेश में जलवायु बदलाव को समझने का एक बेहतरीन मॉडल बनकर उभरा है। जिले के दो अलग-अलग ब्लॉकों में जलवायु जोखिम बिल्कुल भिन्न हैं। एक तरफ जहां गिरता भूजल और पानी की कमी चिंता का विषय है, वहीं दूसरी ओर तेज बारिश (फ्लैश फ्लड) और भूस्खलन का खतरा भी मंडरा रहा है।

​जंगलों पर संकट: बैतूल के वनों में सागौन की हिस्सेदारी करीब 70% है। तापमान और बारिश के पैटर्न में बदलाव के साथ-साथ जंगल में आग के जोखिम ने सागौन की वृद्धि और लकड़ी की गुणवत्ता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। इससे लकड़ी आधारित छोटे कारोबारियों और वन आश्रितों की आजीविका पर संकट आ गया है।

​प्रशासनिक और विशेषज्ञ स्तर पर तैयारी

​बैतूल के कलेक्टर डॉ. सौरभ सोनवने ने इस बात की पुष्टि की है कि जिले में बारिश में करीब 30% तक की कमी आई है और कई तालाब 50% से भी कम भर पाए हैं। उन्होंने बताया कि इस वर्ष ‘सुपर अल नीनो’ प्रभाव के कारण मानसूनी गतिविधियां कमजोर रहीं। इससे निपटने के लिए जिला प्रशासन पौधारोपण, जल स्रोत विकास और ‘सिरपुर मॉडल’ पर युद्धस्तर पर काम कर रहा है।
​विशेषज्ञ अनन्या चक्रवर्ती का साफ कहना है कि बिना ब्लॉक-स्तरीय डाटा और स्थानीय लोगों की भागीदारी के जलवायु जोखिमों को समझ पाना असंभव है। इसलिए, मध्य प्रदेश में ‘क्लाइमेट रेजिलियंस’ (जलवायु सहनशीलता) की योजनाएं राज्य स्तर पर थोपने के बजाय पूरी तरह स्थानीय जरूरतों और डेटा के आधार पर ही तैयार की जानी चाहिए।
​निष्कर्ष यह है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की चिंता नहीं, बल्कि वर्तमान की चुनौती है। प्रदेशभर में एक जैसी नीतियों के बजाय स्थानीय जोखिमों की पहचान, बेहतर डेटा प्रबंधन, पानी-हरियाली का संरक्षण और आजीविका के नए विकल्पों को अपनाना ही अब एकमात्र कारगर उपाय है।
​एक नजर में मुख्य बिंदु:

​वर्ष 2025 में मध्य प्रदेश में मौसम जनित घटनाओं से 537 मौतें हुईं।

​शहरों में कंक्रीट का विस्तार और गांवों में बदलता बारिश का पैटर्न सबसे बड़े खतरे हैं।

​बैतूल में भूजल संकट और 70% सागौन वनों पर मंडराते खतरे का विशेष अध्ययन किया गया।

​प्रशासन द्वारा जल संरक्षण, पौधारोपण और स्थानीय स्तर पर क्लाइमेट एक्शन प्लान पर जोर दिया जा रहा है।

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