सियासत के दावों और कागजी विज्ञापनों के बीच दम तोड़ता बैतूल: क्या आदिवासियों के विकास के लिए सिर्फ कागजों पर खर्च होता है सीएसआर फंड?
By,वामन पोटे
सियासत के दावों और कागजी विज्ञापनों के बीच दम तोड़ता बैतूल: क्या आदिवासियों के विकास के लिए सिर्फ कागजों पर खर्च होता है सीएसआर फंड?
बैतूल 10अक्टूबर (betulvarta)
मध्य प्रदेश का आदिवासी बहुल बैतूल जिला एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। इस बार मामला मौसम की मार या सुपर अलनीनो की भविष्यवाणियों का नहीं, बल्कि उन व्यवस्थाओं का है जो हर संकट के वक्त मूकदर्शक बनी रहती हैं। अप्रैल और मई के महीनों में ही यह साफ हो चुका था कि इस बार मानसून कमजोर रहेगा और बारिश कम होगी। इसके बावजूद न तो सत्ता जागी, न संगठन ने सुधि ली और न ही तथाकथित सामाजिक संस्थाओं व संघ ने कोई ठोस जमीन तैयार की। सवाल यह है कि आखिर इस गरीब आदिवासी जिले के हालात कैसे सुधरेंगे? यह सवाल आज भी प्रशासन और समाज के मुंह बाए खड़ा है।
कागजी विकास और जमीनी हकीकत का अंतर
जिले के 10 विकास खंडों और तमाम नगरीय व पंचायत क्षेत्रों में दर्जनों निजी स्वयंसेवी संस्थाएं (NGOs) सक्रिय हैं। ये संस्थाएं अपने-अपने कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड का बड़ा बजट होने का दावा करती हैं। कागजों और चमकदार तस्वीरों में इनका कामकाज बेहतरीन नजर आता है, लेकिन गांवों और स्लम बस्तियों की जमीनी हकीकत आज भी बाबा आदम के जमाने जैसी ही है।
जिले में 1300 से ज्यादा गांव और 4 हजार से अधिक मजरे-टोले हैं, जहां बुनियादी सुविधाओं का आज भी अकाल है। स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में गांवों के हालात बद से बदतर हैं। आज भी हर दूसरे गांव में झोलाछाप डॉक्टरों की दुकानें धड़ल्ले से खुली हैं, लेकिन इन पर रोक लगाने वाला तंत्र कुंभकर्णी नींद में सोया हुआ है।
कहां खर्च हो रहा है सीएसआर फंड?
बैतूल के उद्योगपतियों ने अपने निजी प्रभाव के लिए खुद की स्वयंसेवी संस्थाएं बना रखी हैं, जहां सीएसआर फंड की राशि खर्च होती है। विडंबना यह है कि सरकारी संस्थान भी सीएसआर फंड का उपयोग जनहित के बजाय राजनेताओं की प्राथमिकताओं और घोषणाओं के आधार पर कर रहे हैं।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण जिला अस्पताल में देखा जा सकता है, जहां स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के बजाय बिजली विभाग से जुड़े कार्यों पर सीएसआर फंड खर्च कर दिया गया। जिले में ऐसे तमाम उदाहरण मौजूद हैं, जो साफ बयां करते हैं कि सीएसआर फंड के नाम पर किस तरह सिर्फ पैसे की बर्बादी की जा रही है।
पानी पर राजनीति, पर समाधान शून्य
बैतूल जिले में पानी को लेकर आए दिन राजनीतिक रोटियां सेकी जाती हैं, लेकिन विडंबना यह है कि कोई भी स्वयंसेवी संस्था या जिम्मेदार महकमा पानी की स्थाई समस्या पर पैसा खर्च करने को तैयार नहीं है। सीएसआर फंड की असल सार्थकता तब साबित होती, जब दूरदराज के मजरों-टोलों तक शुद्ध पेयजल और स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचतीं, लेकिन यहां स्थिति इसके उलट है।
बड़ा सवाल: जब आपदा की भविष्यवाणी पहले ही हो चुकी थी, तब प्रशासन, उद्योग जगत और सामाजिक संगठनों ने आदिवासियों की जिंदगी को बचाने के लिए कौन सा ठोस ब्लूप्रिंट तैयार किया था?
ऐसी व्यवस्था में जहां जनप्रतिनिधि और संगठन सिर्फ भाषणों तक सीमित हों, क्या बैतूल के आदिवासी इलाकों की तस्वीर कभी बदलेगी या विकास केवल विज्ञापनों की सुर्खियां बनकर रह जाएगा?