जिस घर में प्रेम हो वह घर स्वर्ग से भी ज्यादा सुखी होता है: राष्ट्रसंत ललितप्रभ
By, बैतूल वार्ता
जिस घर में प्रेम हो वह घर स्वर्ग से भी ज्यादा सुखी होता है: राष्ट्रसंत ललितप्रभ
चक्कर रोड स्थित दादावाड़ी में जीने की कला पर आधारित प्रवचन माला को सुनने उमड़े हजारों श्रावक
शुक्रवार को कैसे बनें जीवन में मालामाल विषय पर सुबह 9 बजे होंगे विशेष प्रवचन


बैतूल। मधुर व्याख्यानी जीवन जीने की कला के मार्गदर्शक पूज्य महोपाध्याय गुरुदेव ललितप्रभ सागर, मुनि शांतिप्रिय म.साहब तथा श्रमण संघ स्थानकवासी संप्रदाय के आचार्य गुरुदेव सौभाग्य मल म. साठ के सुशिष्य परम पूज्य गुरुदेव प्रकाश मुनि का व्याख्यान हेतु जैन दादावाड़ी में प्रवेश हुआ। श्रावक सतीश पारख, मुकेश गोठी ने बताया व्याख्यान के पूर्व इंदरकरण प्रशांत मरोठी की ओर से सभी महिला-पुरुष व बच्चों को गुरुदेव द्वारा लिखित सुखी जीवन का सीक्रेट, क्या स्वाद है जिंदगी का उपहार स्वरूप भेंट की गई। वहीं बच्चों को पुस्तकें भेंट की गई। इस अवसर पर डागा परिवार ने मरोठी परिवार का स्वागत किया। गुरुदेव के परम भक्त रायपुर निवासी सुमित नम्रता कांकारिया, जबलपुर निवासी किशोर, अजीत समदड़िया का स्वागत नीलय डागा, निर्मला डागा, दीपाली डागा, जयंतीलाल गोठी, नवीन तातेड, सुशीला देवी गोठी ने किया। प्रवचन के दौरान छिंदवाड़ा, सिवनी मालवा, जबलपुर से श्रावक श्राविका उपस्थित थे।
राष्ट्रसंत महोपाध्याय ललितप्रभ सागर महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि घर-परिवार की अगर सबसे बड़ी कोई संपत्ति होती है तो वो है परिवार के सब लोगों में रहने वाला प्रेम। जैसे बिना पैसे के पर्स खाली व बेकार होता है, जैसे बिना पानी की नदी व्यर्थ होती है, वैसे ही बिना प्रेम का परिवार बेकार होता है। घर को स्वर्ग बनाने की शुरुआत ही प्रेम से होती है। अगर आप चार भाई हैं और कभी ऐसी नौबत आ जाए कि या तो आपको 25 लाख का नुकसान उठाना पड़ेगा या चार भाइयों को अलग होना पड़ेगा, भरोसा कीजिए आप दुनिया के सबसे अमीर आदमी बने रहेंगे अगर आपने ये निर्णय कर लिया कि मैं 25 लाख का नुकसान उठाने तैयार हूं, पर हम चार भाई कभी आपस में जुदा नहीं होंगे। ये नुकसान नहीं, आपका लिया महान निर्णय है। जिंदगीभर आप लाभ ही लाभ में रहेंगे। संतप्रवर ने कहा कि जिस घर में प्रेम होता है, वह घर स्वर्ग होता है और जिस घर में प्रेम नहीं होता वह घर श्मशान होता है। कब्रिस्तान में रहने वाले हजारों लोग अलग-अलग कब्रों में रहते हैं, वे आपस में गले मिलते नहीं हैं, वे एक-दूजे को देख मुस्कुराते नहीं हैं, एक-दूजे की कब्रों में जाते नहीं हैं, वे एक-दूजे के सुख-दुख में काम आते नहीं हैं। कब्रिस्तानों में कब्रें हैं और घर में कमरे हैं। एक बहु दूसरी बहु से, एक सास अपनी बहु से नहीं बोल रही है, भाई अपने भाई से नहीं बोल रहा है, तो फिर कब्रिस्तान की कब्रों में और हमारे घरों में क्या फर्क रह गया है।
संत प्रवर गुरुवार को सकल जैन समाज द्वारा चक्कर रोड स्थित जैन दादावाड़ी में आयोजित तीन दिवसीय प्रवचन माला के दूसरे दिन घर को कैसे स्वर्ग बनाएं विषय पर हजारों बच्चों और श्रद्धालु भाई बहनों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि एक बार किसी ने मुझसे पूछा कि जिन लोगों के घर में माँ-बाप का स्वर्गवास वृद्धाश्रम में होता है, उन्हें सूतक कितने दिनों का लगता है? मैंने कहा- जिस दिन से उनके माँ-बाप वृद्धाश्रम गए उसी दिन से उन्हें आजीवन सूतक लग जाता है, क्योंकि उन्होंने माँ-बाप को अपने हाथों से रोटी नहीं खिलाई। बूढ़े लोगों की उम्र कितनी होगी यह उुपर वाला तय नहीं करता, यह घर के लोग तय किया करते हैं। जिस घर में बूढ़े माँ-बाप को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है, उसी का नाम नर्क है और जिस घर में बूढ़े माँ-बाप को पलकों पर बैठाया जाता है, उसी का नाम स्वर्ग है। सप्ताह में सात वार होते हैं, पर आज मैं आपको आठवां वार देता हूं और वो है- परिवार। अगर ये आठवां वार मीठा हो तो सभी सातों वार मीठे और मधुर बन जाते हैं। सभी सातों वार देवों के हुआ करते हैं, यह आठवा वार परिवार बड़े-बुजुर्गों का हुआ करता है। मकान, घर और परिवार ये तीनों एक नहीं हैं। जहां पर आदमी केवल अपने बीवी-बच्चों के साथ रहता है, उसका नाम मकान है। जहां पर आदमी अपने माता-पिता को सम्मानपूर्वक रखता है, उसका नाम घर है। और जहां भाई-बहनों को भी प्रेम और सम्मान से रखा जाता है, उसी का नाम परिवार है। अपने घर को कभी मकान बनने मत देना, बना सको तो अपने घर को परिवार बनाने का सौभाग्य हासिल करना। अगर सब कुछ खो कर भी आपने परिवार के प्रेम को बचा लिया तो समझ लो आप जीवन की बाजी जीत गए।
–जिस घर में प्रेम वहां हर दिन ईद, दिवाली और होली—
संतश्री ने कहा कि साल में एक बार होली-दिवाली, ईद आती है, पर जिस घर में सुबह उठकर भाई-भाई आपस में गले मिलते हैं उस घर में साल के 365 दिन ईद होती है। जहां देवरानियों-जेठानियां एक थाली में भोजन करती हैं, उस घर में साल में 365 दिन होली होती है। जिस घर में बहुएं रात को अपने बेडरूम में जाने से पहले अपनी दादी के पांव और कमर दबाने जाया करती है, वहां दिवाली साल में एक दिन नहीं होती साल के 365 दिया हुआ करती है। भगवान करे, ये ईद, दिवाली, होली जैसे पर्व हमारे घरों में हमेशा मनते रहें। अपने घरों में एक चीज की दौलत बढ़ाओ और वह है प्रेम की दौलत।
–परिवार में कैसे रहें यह राम से सीखें—
विषयान्तर्गत संतश्री ने आगे कहा कि रामायण और महाभारत दोनों ही राजकुल की, भाई-भाई की कहानी है, फर्क केवल इतना है कि महाभारत में भाई-भाई को लूट रहा है और रामायण में भाई-भाई को लुटा रहा है। एक त्याग की एक स्वार्थ की, एक लूटने की और एक लुटाने की कहानी है। एक आदर्शों को स्थापित करने की कहानी और एक स्वार्थभरी कहानी है। भारत में रामायण जरूर तो हो पर भूल से भी हमारे भारत में महाभारत कभी न हो। यदि किसी कारण से रिश्तों में दूरियां-दरारें आ गईं हैं तो स्वयं बी-पाॅजीटिव होकर तो देखें, कैसे आपके टूटे रिश्ते दोनों ही ओर से खुद ही जुड़ जाते हैं। परिवार में कैसे रहें यह हमें राम से सीखना चाहिए, दुनिया में कैसा जीना इसे कृष्ण से सीखना चाहिए और मुक्ति के मार्ग पर कैसे जाया जाता है, यह सीखना हो तो भगवान श्रीमहावीर से सीखो। परिवार को एक बनाए रखने के लिए रामायण को अपने जीवन का आदर्श बनाओ।
माँ-बाप उपहार में आए हुए चलते-फिरते भगवान
संतप्रवर ने कहा कि किस्मत वाले होते हैं जिनके घर में बड़े-बुजुर्गों का साया होता है। बूढ़ा पेड़ फल तो नहीं देता, छाया जरूर देता है। वे किस्मत वाले होते हैं, जिनके घरों में बुजुर्गों की छाया होती है। यह सही है कि परिवार में पत्नी भगवान दिया हुआ उपहार है, उसको खूब प्रेम दीजिए पर माँ-बाप उपहार में आए हुए भगवान हैं, उनकी खूब सेवा कीजिए। अगर संत कभी झूठ नहीं बोलते तो मैं यही कहूंगा कि वे किस्मत वाले होते हैं जिनके घर में माँ-बाप के रूप में जीते-जागते भगवान हैं।
–घर को स्वर्ग बनाने करें ये संकल्प—
संतश्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान कर कहा कि अपने घर को स्वर्ग बनाने के लिए पहला संकल्प आप यह करें कि मैं बड़े-बुजुर्गों की साज-सम्हाल, सेवा-सुश्रुषा और उनका मांगल्य प्रतिदिन जरूर करुंगा। रास्ते में दो मिनट की लिफ्ट देने वाले को, एक गिलास पानी पिलाने वाले को हम थैंक्यू कहा करते हैं पर जिन्होंने हमें जिंदगी दी, उन्हें कितनी बार थैंक्यू कहते हैं। यदि उन्होंने आपको भगवान-भरोसे छोड़ दिया होता तो आप आज यहां नहीं किसी अनाथालय या यतीमखाने में रहे होते। जिन्होंने आपकी जिंदगी बनाई, प्लीज उनका बुढ़ापा बिगाड़ने का काम मत करना। जितना उन्होंने हमें निभाया है, उतना और उससे ज्यादा हम उन्हें निभाएं। जिन्होंने अपने माता-पिता, सास-ससुर का बुढ़ापा सुखी बनाया, उनका भी बुढ़ापा सुखी हो जाएगा। हम अपने जीवन में ऐसी महान भूमिका अदा करें जो घर को स्वर्ग बना दे।
–गाॅड न बन पाएं पर गुड जरूर बनेंः डॉ. मुनि शांतिप्रिय–
दिव्य सत्संग के पूर्वार्ध में डॉ. मुनिश्री शांतिप्रिय सागरजी ने कहा कि इंसान जब इस धरती पर आता है तो अपने साथ कुछ अच्छाइयां और कुछ बुराइयां साथ लेकर आता है। उन अच्छाइयों को हम जीने की और बुराइयों को जीतने का निरंतर प्रयास करें। जो बुराइयों को जीत लेते हैं वे इंसान से भगवान बन जाया करते हैं और जो बुराइयों अपना लेते हैं वे शैतान बन जाया करते हैं। हो सकता है हम गाॅड बन पाएं कि न बन पाएं पर अपने जीवन में गुड जरूर बन जाएं। क्योंकि जो गुड बन जाता है वह एक दिन अपने-आप गाॅड भी बन जाता है। आप अपने जीवन को जैसा चाहे वैसा जी सकते हैं, आप इसे वरदान भी बना सकते हैं और चाहे तो इसे अभिशाप भी बना सकते हैं। चाहे तो इसे भाग्य और चाहे तो इसे भार भी बना सकते हैं। जीवन को क्या बनाना है, यह आपके ही हाथ में है। यदि तुम चाहते हो कि जहां तुम रहो, वहां सब तुम्हें प्यार करें, जहां तुम जाने वाले हो-वहां सब तुम्हारा इंतजार करें और जहां से तुम चले गए-वहां सब तुम्हें याद करें तो अपने जीवन का इस पहले मंत्र- नो कम्पलेंड को जीवन का मंत्र बना लो कि मैं जीवन में कभी शिकायत नहीं करुंगा। दूसरों के लिए अपने मन में शिकायतों को नहीं पालुंगा। शिकायतें छोड़ कर प्रेम और साधुवाद देने की आदत डाल दीजिए। दूसरा मंत्र है- नो क्रिटीसाइज। कभी किसी से एक-दूसरे की निंदा नहीं करूंगा। तीसरा- नो कम्पेयर। मैं किसी और से अपनी तुलना नहीं करुंगा। उस भगवान पर भरोसा करो, उसने हमें इस धरती पर भेजा है तो पूरा कम्पलीट भेजा है। जीवन में यदि ये तीन मंत्र आ गए तो हमारा जीवन खुशियों से आनंद से भर जाएगा। धर्मसभा में अनेक साधु साध्वी भंगवतों ने भी श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दिया। इससे पूर्व डॉ मुनि श्री शांतिप्रिय सागर ने सभा को संबोधित करते हुए हर परिस्थिति में प्रसन्न रहने की कला सिखाई। कार्यक्रम में अनेक महानुभाव उपस्थित थे। इस अवसर पर मरोठी परिवार द्वारा सभी सत्संग प्रेमियों को साहित्य का उपहार दिया गया। मंच संचालन और आभार प्रकट किया गया। शुक्रवार को सुबह 9 बजे राष्ट्रसंत दादावाड़ी में कैसे बनें जीवन में मालामाल विषय पर आम जनता को संबोधित करेंगे।
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