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सार्वजनिक वितरण प्रणाली में घुसे इन चूहों का क्‍या करें?

By, बैतूल वार्ता

सार्वजनिक वितरण प्रणाली में घुसे इन चूहों का क्‍या करें?
By, बैतूल वार्ता

यह घटनाक्रम पूरे देश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली की हक़ीक़त उजागर करने और परेशान करने वाला है। “जिन लोगों पर किसानों की मेहनत से उगाये अन्न के संरक्षण व न्यायसंगत वितरण का दायित्व था, वे ही निहित स्वार्थों के लिये इसको ठिकाने लगाने में शामिल मिले।“
देश के नीति-नियंताओं ने जिस विभाग की स्थापना किसान को न्यायसंगत दाम देकर भूख के कारगर समाधान के लिये की थी, उसी विभाग की काली भेड़ें आज घोटालों व हेराफेरी में लिप्त पाई गयी हैं। इस बात की पुष्टि सीबीआई द्वारा पंजाब, हरियाणा व दिल्ली के पचास ठिकानों पर हुई दबिश से होती है।
इस छापे में जहां भारतीय खाद्य निगम के चंडीगढ़ स्थित उप महाप्रबंधक व एक एग्रो इंडस्ट्री के मालिक को गिरफ्तार किया गया है, वहीं चौहत्तर लोगों के खिलाफ केस दर्ज किये गये हैं। इतना ही नहीं, अस्सी लाख से अधिक की नकदी भी बरामद हुई है। कमोबेश देश के हर राज्य की यही तस्वीर है, कहीं थोड़ी हल्की तो कहीं थोड़ी स्याह।
इसे क्या कहें? कैसी विडंबना है कि जिन लोगों पर खाद्यान्न संरक्षण का दायित्व था वे ही इसकी बंदरबांट में लगे थे। आपराधिक कृत्य देखिये कि कुछ अनाज के व्यापारी व निजी चावल मिल मालिक घटिया अनाज सस्ती दरों में खरीदकर अधिकारियों की जेब गर्म करने के बाद एफसीआई को ऊंचे दामों में बेचकर गोदामों में रखवा देते हैं इससे सारे राज्य पीड़ित हैं।
दुर्भाग्य की बात है कि यही अनाज सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत गरीब व कमजोर वर्ग के लोगों को बांटा जाता है। पता नहीं कब से यह गोरखधंधा चल रहा था। इस छापे में बरामद मोटी रकम घोटाले के आकार की ओर इशारा करती है। निस्संदेह, सीबीआई का ‘ऑपरेशन कनक’ भ्रष्ट अधिकारियों के लिये एक सबक साबित होगा और भविष्य में हेराफेरी करने से पहले कई बार सोचेंगे।
पक्की बात है कि सीबीआई की जांच में भविष्य में कुछ बड़े खुलासे होंगे और विभाग की कई बड़ी काली भेड़ें सामने आएंगी। फिलहाल एफसीआई के एक कार्यकारी निदेशक समेत 74 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। इन लोगों में विभाग के कुछ सेवानिवृत्त अधिकारी, कुछ संस्थाएं और बिचौलिये किस्म के आम लोग भी शामिल हैं।
यह गोरखधंधा कई वर्षों से चल रहा है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। इस घोटाले में एफसीआई द्वारा आउटसोर्स किये गये बेनामी गोदामों को भ्रष्टाचार का जरिया बनाया गया। इस बात की पुष्टि सीबीआई अधिकारियों ने भी की है। जिसमें पंजाब सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका को भी संदिग्ध बताया जाता है।
निस्संदेह, भारतीय खाद्य निगम, कारोबारियों व प्रशासनिक अधिकारियों के द्वारा बनाये भ्रष्टाचार के नापाक गठजोड़ पर सीबीआई की चोट एक स्वागत योग्य कदम है। बेहतर होता कि वर्षों पहले इस तरह के अपवित्र गठबंधन की लगातार निगरानी होती।
यह कहना कठिन है कि भ्रष्ट अधिकारियों का यह निंदनीय कृत्य कब से देश में चल रहा है और कितने गरीब व जरूरतमंद लोग घटिया अनाज लेने को मजबूर हैं। कहीं न कहीं इस तरह के मामलों में किसानों के साथ भी अन्याय होता रहा है। सिंडिकेट के जरिये घटिया अनाज खरीदकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली को तो चूना लगाया ही जा रहा है।
इस मामले में सीबीआई ने भ्रष्ट भारतीय खाद्य निगम के अधिकारियों, चावल मिल मालिकों तथा बिचौलियों के सिंडिकेट में शामिल लोगों की पहचान के लिये छह माह तक अंडरकवर ऑपरेशन चलाया। तब जाकर इस गोरखधंधे में शामिल बड़ी मछलियां हाथ आईं।
आमतौर पर मान्यता रही है कि महिला अधिकारी ईमानदारी से अपने विभागीय दायित्वों का निर्वहन करती हैं, लेकिन इस छापे में एक महिला अधिकारी के घर की वाशिंग मशीन से लाखों की नकदी बरामद की गई।  अभी इस अपवित्र गठबंधन की और परतें खुलेंगी। बहुत संभव है कि चारे घोटाले की तरह इस मामले का दायरा विस्तृत निकले।
खुलासा हुआ है कि जो निविदाएं आमंत्रित की जाती थी उनमें भी रिश्वत ली जाती थी। एफसीआई द्वारा भंडारण के लिये आउटसोर्स किये गये कई बेनामी गोदामों के मालिक भी सीबीआई के रडार पर हैं। अभी इस छापे में बरामद दस्तावेज, पुलिस की पूछताछ तथा डिजिटल उपकरणों से कई काले सच सामने आएंगे।
समाज के कमजोर व जरूरतमंद लोगों के लिये सार्वजनिक वितरण प्रणाली हेतु दिये जाने वाले अनाज में घोटाला करना हमारे समाज में नैतिक पराभव की कहानी भी कहता है।राकेश दुबे
(बैतूल वार्ता)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता, सटीकता व तथ्यात्मकता के लिए लेखक स्वयं जवाबदेह है। इसके लिए बैतूल वार्ता किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है। यदि लेख पर आपके कोई विचार हों या आपको आपत्ति हो तो हमें जरूर लिखें।– संपादक

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