सत्ता शिखर पर बैठी भाजपा, ज़मीन पर कार्यकर्ता बेहाल: बैतूल में क्यों गिर रहा भरोसे का ग्राफ ?
By ,वामन पोटे
अमृत मंथन 2
सत्ता शिखर पर बैठी भाजपा, ज़मीन पर कार्यकर्ता बेहाल: बैतूल में क्यों गिर रहा भरोसे का ग्राफ ?
पांच विधायक, सांसद, केंद्रीय मंत्री… फिर भी बैतूल में भाजपा क्यों जूझ रही अंदरूनी नाराज़गी और जन असंतोष से ?
बैतूल(वामन पोटे)
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष का गृह जिला, पांच विधायक, जिला पंचायत से लेकर नगर पालिका–नगर पंचायत तक भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल, सांसद और केंद्रीय मंत्री की मौजूदगी… कागजों पर देखें तो बैतूल भाजपा का सबसे मजबूत किला नजर आता है। लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे उलट तस्वीर पेश कर रही है। संगठन के भीतर असंतोष बढ़ रहा है, कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं और जनता में सरकार की योजनाओं को लेकर गहरी नाराज़गी उभर रही है। नतीजा यह है कि धीरे-धीरे भाजपा का जनाधार कमजोर पड़ता दिख रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सत्ता, संगठन और प्रशासन—तीनों स्तर पर भाजपा का दबदबा है, तब भी कार्यकर्ता परेशान क्यों हैं? बैतूल भाजपा जिला अध्यक्ष सुधाकर पवार खुद संगठन को संभालने की कोशिश में जुटे हैं, लेकिन पार्टी के अंदर फैली नाराज़गी और बाहर जनता के बीच बढ़ती शिकायतों ने उनकी राह मुश्किल बना दी है।
कार्यकर्ता बोले—सुनवाई नहीं, सम्मान नहीं
भाजपा कार्यकर्ताओं का कहना है कि चुनाव के समय जिन कार्यकर्ताओं ने रात-दिन मेहनत की, आज वही संगठन और जनप्रतिनिधियों की अनदेखी का शिकार हैं। न मंडल स्तर पर उनकी बात सुनी जा रही है और न ही योजनाओं के क्रियान्वयन में उनकी भूमिका को महत्व दिया जा रहा है। इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट रहा है, जिसका असर पार्टी की जमीनी पकड़ पर साफ दिखाई देने लगा है।
जल जीवन मिशन बना परेशानी का दूसरा नाम
भाजपा सरकार की बहुप्रचारित जल जीवन मिशन योजना बैतूल जिले में सबसे बड़ी विफलता के रूप में सामने आ रही है। गांव-गांव पाइपलाइन तो बिछाई गई, लेकिन पानी नहीं पहुंच रहा। कहीं अधूरे काम पड़े हैं तो कहीं घटिया निर्माण के चलते बार-बार लीकेज हो रहे हैं। कई गांवों में टंकी तो बन गई, लेकिन मोटर चालू नहीं हुई। ग्रामीणों का कहना है कि पहले कुएं और हैंडपंप से जैसे-तैसे पानी मिल जाता था, लेकिन अब योजनाओं के अधूरे काम ने समस्या और बढ़ा दी है।
ठेकेदार बेलगाम, अधिकारी मौन
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिले में ठेकेदार अपनी मर्जी से काम कर रहे हैं। समयसीमा का पालन नहीं हो रहा, गुणवत्ता से समझौता किया जा रहा है, फिर भी जिम्मेदार अधिकारी कार्रवाई करने के बजाय बार-बार समय बढ़ा रहे हैं। नियमों के तहत जहां पेनल्टी लगनी चाहिए, वहां ठेकेदारों को राहत दी जा रही है। इससे न केवल सरकारी धन की बर्बादी हो रही है, बल्कि जनता का भरोसा भी टूट रहा है।
डेम और जल योजनाएं—घोषणाएं ज्यादा, हकीकत कम
बैतूल जिले में कई जल संरचनाओं और डेम परियोजनाओं की घोषणाएं हुईं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर प्रगति बेहद धीमी है। कहीं भूमि विवाद तो कहीं तकनीकी खामियों के नाम पर वर्षों से काम लटका हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में किसान आज भी सिंचाई और पेयजल संकट से जूझ रहे हैं। यही नहीं, जल निगम की योजनाएं भी समय पर पूरी नहीं हो पा रही हैं, जिससे आम जनता में आक्रोश बढ़ता जा रहा है।
जनता पूछ रही—जब सब भाजपा के हाथ में है, फिर जिम्मेदार कौन?
बैतूल की राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि जिले में सत्ता की लगभग हर कुर्सी भाजपा के पास है।भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल, केंद्रीय मंत्री डीडी उइके, पांच विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष से लेकर नगर पालिका और नगर पंचायत अध्यक्ष,जनपद अध्यक्ष तक—सभी भाजपा के हैं। ऐसे में जनता का सवाल है कि अगर विकास नहीं हो रहा, योजनाएं फेल हो रही हैं और अधिकारी मनमानी कर रहे हैं, तो आखिर जिम्मेदारी किसकी है?
यही सवाल भाजपा के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है। विपक्ष भले ही कमजोर नजर आए, लेकिन जनता की नाराज़गी अगर यूं ही बढ़ती रही तो आने वाले चुनावों में इसका सीधा असर पार्टी को झेलना पड़ सकता है।
संगठन बनाम सरकार: तालमेल की कमी उजागर
सूत्रों की मानें तो संगठन और जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल की भारी कमी है। कार्यकर्ताओं की शिकायतें जनप्रतिनिधियों तक नहीं पहुंच पा रहीं, और जब पहुंचती हैं तो उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता। यही वजह है कि कई मंडलों में निष्क्रियता बढ़ रही है और पार्टी कार्यक्रमों में पहले जैसी ऊर्जा नजर नहीं आ रही।
भाजपा अध्यक्ष सुधाकर पवार की अग्निपरीक्षा
जिला भाजपा अध्यक्ष सुधाकर पवार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती संगठन को एकजुट करना और कार्यकर्ताओं में फिर से भरोसा पैदा करना है। उन्हें न केवल जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच समन्वय बनाना होगा, बल्कि योजनाओं की जमीनी हकीकत की सख्त समीक्षा भी करनी होगी। अगर जल जीवन मिशन और अन्य विकास योजनाओं में तेजी नहीं लाई गई, तो भाजपा के लिए बैतूल में स्थिति संभालना मुश्किल हो सकता है।
ग्राफ गिरने के संकेत साफ
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अभी चुनाव दूर हैं, लेकिन जिस तरह जनता और कार्यकर्ता दोनों ही नाराज़ नजर आ रहे हैं, उससे भाजपा के ग्राफ में धीरे-धीरे गिरावट के संकेत मिल रहे हैं। गांवों में चर्चा है कि सरकार योजनाएं बना रही है, लेकिन क्रियान्वयन में गंभीरता नहीं दिख रही। यही असंतोष आने वाले समय में वोट में तब्दील हो सकता है।
अब भी वक्त है संभलने का
बैतूल भाजपा के लिए यह चेतावनी का वक्त है। सत्ता की ताकत तभी मायने रखती है जब उसका असर ज़मीनी विकास में दिखे और कार्यकर्ता खुद को सम्मानित महसूस करें। यदि संगठन ने समय रहते ठेकेदारों की मनमानी पर लगाम नहीं लगाई, अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं की और जनता की समस्याओं का समाधान नहीं किया, तो मजबूत किला भी दरकते देर नहीं लगेगी।
फिलहाल बैतूल में भाजपा सत्ता के शिखर पर खड़ी तो है, लेकिन नीचे जमीन खिसकती नजर आ रही है। सवाल यही है—क्या पार्टी समय रहते हालात संभालेगी, या फिर यह गिरता ग्राफ आने वाले चुनावों में बड़ा संदेश बनकर उभरेगा?
Comments are closed.