गणेश चतुर्थी पर विशेष व्यंग्य: जब पार्किंग और सम्मान मांगने बप्पा के दरबार पहुंचे देवों के वाहन
By, वामन पोटे
गणेश चतुर्थी पर विशेष व्यंग्य: जब पार्किंग और सम्मान मांगने बप्पा के दरबार पहुंचे देवों के वाहन
बैतूल ।।विघ्नहर्ता, प्रथम पूज्य शिवपुत्र श्री गणेश जी का महाउत्सव गणेश चतुर्थी बस आ ही गया है। इस मौके पर सभी देवी-देवताओं के वाहनों ने डिसाइड किया कि क्यों ना इस बार गणेश जी से अपने लिए एक सेपरेट पार्किंग की मांग रखी जाए। गणेश जी चतुर हैं, न्यायप्रिय है, इसलिए कोई न कोई युक्ति जरूर निकाल लेंगे। इसे देख कई देवी-देवताओं के वाहन गणेश जी के दरबार मे अर्जी लेकर हाजिर हुए। दृश्यवार वर्णन प्रस्तुत है…
दृश्य-1
गणेश जी का दरबार सजा है। कई भक्त, याचक अपनी-अपनी अर्जी लगाने के लिए खड़े हैं। इस बीच एक दृश्य ने सबको चौंका दिया। पक्षीराज गरुड़, ऐरावत, शेर, मूषक, श्वान, नंदी और अन्य भी गणेश दरबार में पहुंचे। ये सभी देवी-देवताओं के वाहन हैं, तो इन्हें वीआईपी पास से आगे भेजा गया। पब्लिक हैरान है कि आखिर सारे वीआईपी वाहन एक साथ इधर कैसे।
दृश्य-2
आखिरकार भगवान गणेश जी की दरबार में एंट्री हुई और शुरू हुई मामलों की सुनवाई। कतार में सबसे आगे हैं देवताओं के वाहन, जिनका नेतृत्व कर रहे हैं शिव जी के वाहन नंदी। नंदी बोले भगवान गणेश की जय हो। प्रभु दरअसल बात ये है कि मृत्यु लोक में मानव ने ऐसा भौकाल मचा रखा है कि अब हमारी पार्किंग के लिए स्थान ही नहीं बचा है। हमें जहां-तहां सड़कों पर बैठना पड़ता है। मानव निर्मित वाहन चालक हमें तुच्छ समझते हैं। हमें हटाने ध्वनि प्रदूषण का सहारा लेते हैं और यदि नहीं हटे तो वाहनों से हम पर आक्रमण कर देते हैं। हर टाइम हमारी जान को खतरा बना हुआ है। सड़क पर कोई भी हादसा हो तो हमें ही दोषी ठहराया जाता है। आखिर जाएं तो कहां जाएं। ये सुन भगवान गणेश जी कुछ देर के लिए स्तब्ध रह गए। काफी सोच-विचार के पश्चात गणेश जी ने सभी दैवीय वाहनों की याचिका पर सुनवाई का आदेश दिया और सभी से अपनी-अपनी प्रॉब्लम बताने कहा गया।
दृश्य-3
शुरुआत हुई भगवान विष्णु जी के वाहन पक्षीराज गरुड़ से, जिन्होंने बताया कि उन्हें पार्किंग का कोई संकट नहीं क्योंकि वे तो आकाश में विचरण करते हैं और जहां मन किया वहीं विश्राम कर लेते हैं। लेकिन, मानव द्वारा प्रदूषण और रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग ने हमारी पक्षी प्रजातियों को विलुप्ति की कगार पर ला दिया है। न भोजन शुद्ध है, ना वायु और न जल। इसके बाद बारी आई भगवान इंद्र के वाहन ऐरावत की, जिन्होंने बताया कि मैं तो भगवन की सेवा के बाद केवल धार्मिक आख्यानों में ही रहता हूँ। यूं तो मुझसे कोई उलझता नहीं, परन्तु मेरे निवास स्थानों पर मानवीय गतिविधियों से रहने का संकट है। आजकल हमारे कई साथी गजराज अभ्यारण्य में रेंट पर रहते हैं। अगला नंबर आया दुर्गा जी के वाहन शेर का, जिन्होंने बताया कि प्रभु मानव हमारे प्राकृतिक आवासों में घुस रहे हैं। इसलिए पार्किंग का संकट गहराते जा रहा है। अगर हम खाने-पानी के लिए मानवों के क्षेत्र में घुसे तो सीधे हमला करते हैं। आत्मरक्षा में कुछ करो तो बेहोश करके कहीं भी बंद पार्किंग में छोड़ आते हैं और बाकी जीवन वहीं चलते-फिरते रहो। जो मिला खाओ और तमाशा दिखाते रहो। अगला नंबर था खुद गणेश जी के वाहन मूषकराज का, जिन्होंने कहा कि प्रभु मेरे बारे में तो आप सब जानते हैं। ऐसा कोई स्थान नहीं जहां अपनी पार्किंग ना हो। मानवों के घर, दुकान, गोदाम, खेत-खलिहान से लेकर कोने-कोने में अपनी पार्किंग है। अपन ने तो मानवीय क्षेत्रों में ही उत्पात मचा रखा है। आप तो बस अब नंदी जी और श्वान की समस्या सुने, जो हम सबमें सबसे अधिक गम्भीर हैं।
दृश्य-4
बाबा भैरोनाथ का वाहन श्वान फफक-फफक कर रोते हुए बोला- प्रभु मैं इसलिए रो रहा हूँ क्योंकि आपके पास आते समय एक मानव ने मुझे डंडे से कूटा है क्योंकि मैं उसके घर के सामने बैठा रोटी खा रहा था। हम श्वानों को यदि मानव अपने पास रखते हैं तो चकाचक व्यवस्था मिलती है। रहने को पार्किंग, खाने तो माल मसाला। लेकिन भूलोक पर अगर हमारा कोई स्वामी ना हो तो स्थिति बदतर है। मानव तो एक-दूसरे को ये तक कहता है कि कुत्ते की मौत मरोगे। सोचिए ऐसे विकट हालात में हम कहा जाएं, क्या करें। हमारा यूनियन कभी भी 100 परसेंट परिवार नियोजन नहीं अपना पाया, क्योंकि ये चार्ज भी मानव के पास है और वो बिना स्वामी वाले श्वानों पर ध्यान ही नहीं देते। रही बात पार्किंग की तो हम ना घर के, ना घाट के। श्वान व्यथा सुनाता रहा और भगवान गणेश सहित पूरा दरबार उनकी व्यथा सुनकर द्रवित होता रहा।
दृश्य-5
अंत में आया महादेव के वाहन नंदी का नंबर जो क्रोध और पीड़ा से आगबबूला दिख रहे थे। नंदी बोले- भगवन, मैं आपके पिता महादेव का वाहन हूँ और आदिकाल से मेरी भी पूजा होती है। परंतु हमारी पत्थरों की प्रतिमा बनाकर पूजा जा रहा है जबकि रीयल लाइफ में हमें कोई सम्मान नहीं मिलता। आप भूलोक पर मेरी ही हालत देखेंगे तो आपको यकीन नहीं होगा कि मैं महादेव का प्रिय हूँ। क्या खाऊं और कहां पार्किंग खोजूं, इसी में पूरा जीवन बीत रहा है । हमारे लिए पार्किंग मतलब सड़क के बीच या कोने में बैठना। भोजन मतलब कचरा घरों या सड़कों के किनारे जूठन, कचरा खाना है। शहरों की सरकारें हमें सुविधा देने के नाम पर बस हम पर जुल्म ही करती है। हमारी माँ-बहनें यानि हमारी गौमाता को लेकर पॉलिटिक्स खूब होती है। लेकिन, उनके भी रहने-खाने के उचित प्रबंधन सीमित हैं और वो भी सड़कों पर पड़ी हैं। अब आप ही बताएं प्रभु हम सारे देवी-देवताओं के वाहन आखिर जाएं तो कहां जाएं। कभी फ्रस्ट्रेशन में किसी मानव को पीट दो तो न्यूज चैनल वाले हमें पागल सांड कहकर अपमानित करते हैं और तो और मानव एक दूसरे को भी पागल सांड कहकर गाली देते हैं। गजब बेइज्जती है।
दृश्य- 6
सारे देवी-देवताओं के वाहनों के बयान दर्ज हो गए। गणेश दरबार में सन्नाटा है। फिर सन्नाटे को चीरती भगवान गणेश की आवाज आती है। भगवान गणेश बोले- मैं ये देखकर चकित हूं कि मानव कितना निर्लज्ज, कपटी और धर्मांध है। आप सभी दैवीय वाहन सृष्टि की एक धरोहर हैं और देवताओं के परम सेवक माने जाते हैं। आप सबकी समस्याएं विचारणीय हैं और मानव के दोहरे चरित्र को सामने ला रही हैं। आपको भूलोक पर उचित पार्किंग, भोजन और सम्मान मिलना ही चाहिए। ये आपका भी मौलिक अधिकार है। इसलिए मैं मानव सभ्यता को ये आदेश देता हूं कि पत्थर की मूर्तियों को पूजते हो तो उसके जीवित स्वरूप का भी सम्मान करों। दैवीय वाहनों को भोजन, पानी, पार्किंग का स्थान दो। मेरे जन्मदिन गणेश चतुर्थी पर संकल्प लो कि तुम्हारे आसपास जो भी जीव जंतु हैं, उनके संरक्षण में तुम्हारा योगदान रहे क्योंकि ब्रम्हा जी ने मानव को ही ये सामर्थ्य दिया है। यदि तुम ऐसा नहीं कर पाते हो फिर सारे कर्मकांड व्यर्थ हैं। आदेश तत्काल प्रभाव से लागू ।
देवलोक की प्रतिलिपि-
समस्त नगर निगम, नगर पालिकाओं, स्थानीय प्रशासन और आम जन तक पहुंचाई जाएं।
जय श्री गणेश…
(नोट: ये व्यंग्य किसी की भी धार्मिक भावनाओं को आहत करने नहीं लिखा गया बल्कि व्यंग्य का उद्देश्य समसामयिक समस्या पर व्यंग्यात्मक प्रहार है//रिशु कुमार नायडू पत्रकार //