जेन-जी का गुस्सा उबाल पर, बैरिकेडिंग और वॉटर कैनन ने बढ़ाया सियासी ताप: एनएसयूआई आंदोलन में कांग्रेस ने संभाली कमान
By, वामन पोटे
जेन-जी का गुस्सा उबाल पर, बैरिकेडिंग और वॉटर कैनन ने बढ़ाया सियासी ताप: एनएसयूआई आंदोलन में कांग्रेस ने संभाली कमान
बैतूल, 4 सितंबर। मध्यप्रदेश के बैतूल में विद्यार्थियों और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर एनएसयूआई के कलेक्ट्रेट घेराव ने प्रशासन की रणनीति पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। छात्र-युवाओं को कलेक्ट्रेट पहुंचने से रोकने के लिए पुलिस की बैरिकेडिंग और वॉटर कैनन के इस्तेमाल ने जिस प्रदर्शन को नियंत्रित करने की कोशिश की, वही कार्रवाई आंदोलन को और ज्यादा मुखर बनाने का कारण बन गई। प्रदर्शनकारियों के बैरिकेड पार करने और पुलिस की पानी की बौछार के बावजूद पीछे नहीं हटने से साफ संकेत मिला कि युवाओं में मुद्दों को लेकर असंतोष धीरे-धीरे उबाल की ओर बढ़ रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि एनएसयूआई के आंदोलन की कमान जिला कांग्रेस ने भी संभाल ली। कांग्रेस जिला अध्यक्ष निलय विनोद डागा और एनएसयूआई जिला अध्यक्ष रोहन सिंह ठाकुर के नेतृत्व में सैकड़ों छात्र-युवा शिवाजी ऑडिटोरियम से रैली के रूप में कलेक्ट्रेट पहुंचे। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति बनी। वॉटर कैनन की बौछार के बावजूद छात्र पीछे नहीं हटे और अपनी मांगों को लेकर नारेबाजी करते रहे।
रोकने की रणनीति उलटी पड़ी
प्रशासन की ओर से प्रदर्शनकारियों को कलेक्ट्रेट परिसर में प्रवेश से रोकने के लिए व्यापक पुलिस बल और बैरिकेडिंग की व्यवस्था की गई थी। लेकिन जब युवा बैरिकेड पर चढ़ने लगे तो पुलिस ने वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया। इसके बाद आंदोलन और अधिक आक्रामक नजर आया।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यही वह क्षण था जब प्रशासन की नियंत्रण रणनीति उलटी पड़ती दिखाई दी। जिस कार्रवाई का उद्देश्य भीड़ को पीछे हटाना था, उसने प्रदर्शन को दृश्यता और राजनीतिक धार दे दी। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे एनएसयूआई के नए जिला अध्यक्ष रोहन सिंह ठाकुर भी इस पूरे घटनाक्रम के बाद छात्र राजनीति में ज्यादा प्रमुखता से उभरते दिखाई दिए।
धारा 163 पर उठे सवाल
प्रदर्शन के दौरान सबसे बड़ा सवाल कलेक्ट्रेट परिसर और उसके आसपास लागू प्रतिबंधात्मक आदेशों को लेकर उठा। कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी डॉ. सौरभ संजय सोनवणे ने 9 जून 2026 को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) 2023 की धारा 163 के तहत आदेश जारी कर कलेक्ट्रेट परिसर और उसकी 100 मीटर की परिधि में सामूहिक प्रवेश, धरना-प्रदर्शन और नारेबाजी पर प्रतिबंध लगाया था।
आदेश में सामूहिक ज्ञापन के लिए पूर्व अनुमति, अधिकतम पांच लोगों के प्रवेश और कलेक्ट्रेट के मुख्य द्वार क्रमांक-1 पर ज्ञापन लेने की व्यवस्था का उल्लेख किया गया था। रैली-जुलूस के लिए भी पूर्व सूचना और अनुमति की व्यवस्था निर्धारित की गई थी।
ऐसे में सवाल यह है कि जब प्रशासन को पहले से मालूम था कि एनएसयूआई और कांग्रेस बड़ी संख्या में प्रदर्शन करने जा रहे हैं, तो प्रदर्शनकारियों से धरना स्थल पर ही ज्ञापन लेने की प्रभावी व्यवस्था क्यों नहीं की गई? यदि पांच प्रतिनिधियों के माध्यम से ज्ञापन लिया जाता और उनकी बात सुनी जाती तो स्थिति टकराव तक पहुंचने से रोकी जा सकती थी।
तीन महीने पुराने घटनाक्रम से तुलना
इस पूरे मामले को लेकर राजनीतिक हलकों में प्रशासन की भूमिका की तुलना कुछ महीने पहले हुए एक अन्य प्रदर्शन से भी की जा रही है। उस समय एबीवीपी कार्यकर्ताओं के कलेक्टर कक्ष तक पहुंचने के बाद कलेक्ट्रेट परिसर के आसपास प्रतिबंधात्मक व्यवस्था को और सख्त किया गया था।
अब कांग्रेस और एनएसयूआई के प्रदर्शन में बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं का कलेक्ट्रेट परिसर की ओर बढ़ना और ज्ञापन सौंपना इस बात पर बहस को जन्म दे रहा है कि प्रतिबंधात्मक आदेशों को लागू करने की प्रशासनिक रणनीति क्या थी।
हालांकि, यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी आदेश के उल्लंघन की कानूनी स्थिति का अंतिम निर्धारण सक्षम प्राधिकारी ही कर सकता है। लेकिन प्रशासनिक स्तर पर यह सवाल जरूर उठ रहा है कि यदि धारा 163 प्रभावी थी तो प्रदर्शनकारियों को कलेक्ट्रेट की ओर बढ़ने से रोकने की रणनीति पहले से क्यों कारगर नहीं बनाई गई।
मुद्दे छात्र-युवा से जुड़े, इसलिए बढ़ी प्रतिक्रिया
एनएसयूआई ने छात्रसंघ चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से कराने, शिक्षा संजीवनी अभियान का विरोध और पीपीपी मोड के बजाय सरकारी मेडिकल कॉलेज की मांग को प्रमुखता से उठाया। इसके अलावा भीमपुर और शाहपुर की शासकीय आईटीआई को परम फाउंडेशन को सौंपने का विरोध, बीएड-डीएड कॉलेजों की फीस पर नियंत्रण, कॉलेजों की मान्यता और संचालन की जांच जैसी मांगें भी रखी गईं।
छात्रों ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए जिला स्तरीय अध्ययन केंद्र, बेरोजगार युवाओं के लिए विशेष रोजगार अभियान, सरकारी छात्रावासों की उच्चस्तरीय जांच, ग्रामीण विद्यार्थियों के लिए बेहतर परिवहन सुविधा और खेल सुविधाओं के विस्तार की मांग की।
इन मांगों का दायरा केवल छात्र राजनीति तक सीमित नहीं है। रोजगार, शिक्षा, सरकारी संस्थानों की व्यवस्था और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दे सीधे बड़ी युवा आबादी को प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि आंदोलन में छात्र-युवाओं की भागीदारी को कांग्रेस ने भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना।
कांग्रेस को मिला मुद्दा, एनएसयूआई को मिला चेहरा
लंबे समय से विपक्ष में मौजूद कांग्रेस के लिए यह प्रदर्शन राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण रहा। संगठन ने छात्र और युवा मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरकर अपनी सक्रियता दिखाई। वहीं एनएसयूआई के नए जिला अध्यक्ष रोहन सिंह ठाकुर के नेतृत्व में हुआ यह प्रदर्शन उन्हें छात्र राजनीति के व्यापक मंच पर स्थापित करने वाला घटनाक्रम माना जा रहा है।
पुलिस की बैरिकेडिंग और वॉटर कैनन की कार्रवाई ने आंदोलन की तस्वीरों और वीडियो को भी व्यापक चर्चा का विषय बना दिया। इससे प्रदर्शन का प्रभाव केवल कलेक्ट्रेट परिसर तक सीमित नहीं रहा।
प्रशासन के सामने चुनौती
बैतूल में यह घटनाक्रम प्रशासन के लिए भी एक संकेत माना जा रहा है। युवा वर्ग के बीच शिक्षा, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं, सरकारी संस्थानों और भविष्य को लेकर असंतोष यदि लगातार आंदोलनों का रूप लेता है तो आने वाले दिनों में प्रशासन को केवल कानून-व्यवस्था के नजरिए से नहीं, बल्कि संवाद और समाधान की रणनीति से भी ऐसे आंदोलनों को संभालना होगा।
एनएसयूआई जिला अध्यक्ष ठाकुर ने मांगें पूरी नहीं होने पर चरणबद्ध लोकतांत्रिक आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी है। ऐसे में गुरुवार का प्रदर्शन अंतिम आंदोलन के बजाय आने वाले राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत बन सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा संदेश यही है कि जेन-जी के गुस्से को केवल बैरिकेड और वॉटर कैनन से रोकना आसान नहीं होगा। युवाओं के मुद्दों पर समय रहते संवाद और समाधान नहीं हुआ तो यह असंतोष आने वाले दिनों में और व्यापक राजनीतिक आंदोलन का रूप ले सकता है। प्रशासन के लिए चुनौती अब भीड़ को रोकने से ज्यादा उस गुस्से के कारणों को समझने की है।