सरकारी स्कूलों मे शिक्षा संजीवनी अभियान ? “कक्षा से कमल तक: भाजपा की नई राजनीतिक पाठशाला”? स्कूल से वोट बैंक तक भाजपा की नई बिसात: कॉलेज के बाद अब हाईस्कूल-हायर सेकेंडरी पर नजर, बैतूल का ‘संजीवनी स्कूल’ मॉडल बना नया फार्मूला
By, वामन पोटे
सरकारी स्कूलों मे शिक्षा संजीवनी अभियान ?
“कक्षा से कमल तक: भाजपा की नई राजनीतिक पाठशाला”?
स्कूल से वोट बैंक तक भाजपा की नई बिसात: कॉलेज के बाद अब हाईस्कूल-हायर सेकेंडरी पर नजर, बैतूल का ‘संजीवनी स्कूल’ मॉडल बना नया फार्मूला
बैतूल 30 अगस्त वामन पोटे // मध्यप्रदेश भाजपा ने अब राजनीति की वह जमीन तलाशनी शुरू कर दी है, जहां आज वोट नहीं है, लेकिन अगले चुनावों में वोटर तैयार होंगे। कॉलेजों के बाद पार्टी की नजर अब हाईस्कूल और हायर सेकेंडरी स्कूलों के विद्यार्थियों पर है। 9वीं से 12वीं तक की कक्षाओं में पढ़ने वाली जेनरेशन-जेड और आने वाली जेनरेशन-अल्फा को संगठन से जोड़ने की रणनीति भाजपा की नई राजनीतिक बिसात का सबसे अहम हिस्सा बनती दिख रही है।
ओरछा में 30 और 31 अगस्त को हो रही भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक को इसी नजरिए से देखें तो यह केवल संगठन की सामान्य समीक्षा बैठक नहीं है। इसके एजेंडे में बूथ, पंचायत, नगरीय निकाय और 2028 विधानसभा चुनाव के साथ वह युवा भी है, जो अभी स्कूल में है और आने वाले वर्षों में पहली बार मतदान करेगा।
यानी भाजपा ने चुनावी गणित को पांच साल के बजाय अब दस साल आगे देखना शुरू कर दिया है।
कॉलेज के बाद स्कूल क्यों ?
भाजपा की राजनीति लंबे समय से बूथ और पन्ना प्रमुख के मजबूत नेटवर्क पर टिकी रही है। इसके बाद युवा मोर्चा और कॉलेज परिसरों को युवाओं से संपर्क का माध्यम बनाया गया। लेकिन सोशल मीडिया के विस्तार ने युवा राजनीति का पूरा चरित्र बदल दिया है। आज 16 से 25 वर्ष की उम्र का युवा राजनीतिक भाषण से ज्यादा मोबाइल स्क्रीन पर सक्रिय है।
यही कारण है कि पार्टी अब केवल कॉलेज पहुंचने की रणनीति से संतुष्ट नहीं है। हाईस्कूल और हायर सेकेंडरी तक पहुंचने की तैयारी का अर्थ साफ है—मतदाता बनने से पहले ही संवाद शुरू करना।
यह संवाद सीधे राजनीतिक सदस्यता के रूप में नहीं, बल्कि करियर काउंसलिंग, प्रतियोगिताओं, डिजिटल साक्षरता, खेल, सांस्कृतिक गतिविधियों, राष्ट्रवाद और ‘भविष्य के भारत’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से स्थापित करने की कोशिश होगी।
राजनीति का पुराना फार्मूला था—पहले वोटर बनाओ, फिर कार्यकर्ता बनाओ। नया फार्मूला इससे एक कदम आगे है—पहले संपर्क बनाओ, फिर विश्वास बनाओ और उसके बाद संगठन से जोड़ो।
बैतूल का शिक्षा संजीवनी अभियान
मॉडल क्यों महत्वपूर्ण ?
इसी पूरी रणनीति के बीच बैतूल का ‘शिक्षा संजीवनी’ अभियान अचानक राजनीतिक नजरिए से महत्वपूर्ण हो जाता है। कलेक्टर डॉ. सौरभ संजय सोनवणे की पहल पर जिले के सरकारी स्कूलों की अधोसंरचना और शैक्षणिक माहौल सुधारने के लिए प्रशासन ने जनप्रतिनिधियों, निजी क्षेत्र, सामाजिक संगठनों और अन्य संस्थाओं को जोड़ने का प्रयास किया।
यानी स्कूल सुधार के लिए सरकारी खजाने के साथ समाज की भागीदारी का मॉडल तैयार किया गया।
कहीं बाउंड्रीवॉल की जरूरत है, कहीं भवन की मरम्मत, कहीं फर्नीचर, कहीं डिजिटल सुविधा, कहीं खेल सामग्री तो कहीं स्कूल परिसर को बेहतर बनाने की आवश्यकता। संजीवनी अभियान ने इन जरूरतों को समाज और संस्थाओं के सहयोग से पूरा करने की दिशा दिखाई।
अब भाजपा के लिए इस मॉडल की राजनीतिक उपयोगिता समझना मुश्किल नहीं है।
जिस स्कूल में जनप्रतिनिधि आएगा, संस्था सहयोग करेगी, स्थानीय संगठन मदद करेगा और विद्यार्थियों के बीच करियर व भविष्य से जुड़े कार्यक्रम होंगे, वहां स्वाभाविक रूप से सामाजिक संपर्क का एक नया नेटवर्क बनेगा।
यही नेटवर्क भविष्य में राजनीतिक संवाद की जमीन भी बन सकता है।
प्रदेश अध्यक्ष के दस स्कूल, एक करोड़ का प्रयोग
बैतूल विधानसभा क्षेत्र में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं बैतूल विधायक हेमंत खंडेलवाल द्वारा विजय न्यास के माध्यम से 10 सरकारी स्कूलों के कायाकल्प के लिए करीब एक करोड़ रुपये की पहल इस मॉडल को और महत्वपूर्ण बनाती है।
दस स्कूलों पर करीब एक करोड़ रुपये का निवेश सिर्फ अधोसंरचना सुधार का मामला नहीं है। राजनीतिक विश्लेषण के नजरिए से देखें तो यह उस सरकारी स्कूल नेटवर्क तक पहुंच बनाने का प्रयोग है, जहां बड़ी संख्या में ग्रामीण, निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों के बच्चे पढ़ते हैं।
यही परिवार चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा सामाजिक आधार भी बनते हैं।
यदि स्कूल बेहतर होता है, बच्चों को सुविधा मिलती है, खेल और शिक्षा के अवसर बढ़ते हैं और अभिभावकों को लगता है कि उनके इलाके का स्कूल बदल रहा है, तो उस बदलाव का श्रेय स्वाभाविक रूप से उस व्यक्ति और संस्था को भी मिलता है, जिसने उसमें भूमिका निभाई।
यहीं से विकास, सामाजिक संपर्क और राजनीति की तीनों धाराएं एक-दूसरे से जुड़ती हैं।
‘स्कूल से वोट बैंक’ तक का सफर
भाजपा की प्रस्तावित रणनीति को केवल छात्र संपर्क अभियान कहना शायद अधूरा होगा। इसके पीछे दीर्घकालीन राजनीतिक गणित भी दिखाई देता है।
आज 15-16 वर्ष का विद्यार्थी अगले विधानसभा चुनाव तक संभवतः मतदाता बन चुका होगा। उसके अभिभावक आज मतदाता हैं और वह स्वयं कल का मतदाता है। ऐसे में स्कूल के माध्यम से परिवार तक पहुंच बनाना राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत प्रभावी संपर्क माध्यम साबित हो सकता है।
यानी भाजपा के लिए स्कूल सिर्फ शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि भविष्य के मतदाता और उसके परिवार तक पहुंचने का सामाजिक प्रवेश द्वार बन सकता है।
यही वजह है कि प्रस्तावित रणनीति में हर विधानसभा क्षेत्र के चुनिंदा हाईस्कूल और हायर सेकेंडरी स्कूलों में कार्यक्रमों की बात हो रही है। यदि इसे संगठन के बूथ नेटवर्क से जोड़ दिया गया तो स्कूल, पंचायत और बूथ के बीच एक नया संपर्क तंत्र तैयार हो सकता है।
शिक्षक सबसे महत्वपूर्ण कड़ी, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती भी
इस प्रयोग में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका शिक्षक समुदाय की होगी। लेकिन यहीं भाजपा और सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल भी खड़ा होगा।
सरकारी स्कूलों को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखना शिक्षा व्यवस्था की बुनियादी आवश्यकता है। यदि करियर काउंसलिंग, खेल, डिजिटल शिक्षा और प्रतियोगिताओं के नाम पर स्कूल परिसर राजनीतिक प्रचार का माध्यम बनने लगे तो इस रणनीति पर सवाल भी उठेंगे।
इसलिए भाजपा के लिए असली चुनौती यह होगी कि स्कूल में राजनीति नहीं, लेकिन स्कूल के माध्यम से सामाजिक संवाद कैसे कायम रखा जाए।
यदि यह सीमा कायम रहती है तो मॉडल लोकप्रिय हो सकता है। यदि सीमा टूटती है तो विपक्ष को भाजपा पर शिक्षा संस्थानों के राजनीतिकरण का आरोप लगाने का बड़ा मौका मिल जाएगा।
जेन जी को साधना आसान नहीं
भाजपा के सामने दूसरी चुनौती खुद जेन जी है। यह पीढ़ी किसी एक राजनीतिक विचारधारा से लंबे समय तक बंधी रहने वाली पीढ़ी नहीं मानी जाती। रोजगार, शिक्षा, महंगाई, प्रतियोगी परीक्षाएं, डिजिटल निजता, इंटरनेट, पर्यावरण और अवसर इसके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।
इंस्टाग्राम, यूट्यूब और शॉर्ट वीडियो ने राजनीतिक संवाद का तरीका बदल दिया है। इसलिए पुराने नारों और भाषणों से इस पीढ़ी को प्रभावित करना कठिन होगा।
भाजपा यदि स्कूल तक जाती है तो उसे केवल अपना संदेश सुनाने के बजाय युवाओं को सुनना भी पड़ेगा।
यही कारण है कि ‘युवा संवाद’ की सफलता इस बात से तय होगी कि वहां युवाओं के सवाल कितने सुने जाते हैं, न कि भाजपा के कितने भाषण होते हैं।
106 नेताओं का प्रवास, कमजोर बूथों पर नजर
ओरछा की बैठक में संगठनात्मक स्तर पर भी बड़ा रोडमैप तैयार होने की संभावना है। कार्यसमिति सदस्यों को विधानसभा क्षेत्रों में प्रवास, कमजोर बूथों की पहचान, नए कार्यकर्ताओं को जोड़ने और संगठन को पंचायत स्तर तक मजबूत करने की जिम्मेदारी देने की रणनीति पर काम हो रहा है।
यदि इसी नेटवर्क में स्कूल स्तर का युवा संपर्क जोड़ दिया गया तो भाजपा की रणनीति तीन स्तरों पर काम करेगी—बूथ पर आज का मतदाता, कॉलेज में कल का सक्रिय युवा और स्कूल में भविष्य का मतदाता।
यही इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है।
2028 नहीं, 2033 की तैयारी ?
भाजपा की यह रणनीति केवल 2028 विधानसभा चुनाव तक सीमित मानना भी शायद जल्दबाजी होगी। राजनीति में संगठन का सबसे बड़ा लाभ वही पार्टी उठाती है जो अगले चुनाव के साथ उसके बाद के चुनाव की तैयारी भी शुरू कर दे।
स्कूलों में आज शुरू होने वाला संपर्क आने वाले वर्षों में युवा संगठन, डिजिटल नेटवर्क और मतदाता समूह में बदल सकता है।
इसलिए ओरछा में चल रहा महामंथन असल में सिर्फ 2028 की पटकथा नहीं लिख रहा। यह उस राजनीतिक पीढ़ी को तैयार करने की कोशिश है जो 2030 के दशक की मध्यप्रदेश की राजनीति को प्रभावित करेगी।
बैतूल का शिक्षा संजीवनी स्कूल मॉडल इस पूरी रणनीति के लिए एक तैयार प्रयोगशाला की तरह सामने है।
एक तरफ प्रशासन स्कूलों को समाज की भागीदारी से संवारने का मॉडल बना रहा है, दूसरी तरफ भाजपा उसी स्कूल नेटवर्क को युवा संवाद के नए माध्यम के रूप में देख रही है। अब देखना यह होगा कि यह प्रयोग शिक्षा सुधार तक सीमित रहता है या धीरे-धीरे राजनीतिक संगठन के विस्तार का नया आधार बन जाता है।
क्योंकि भाजपा की नई बिसात में मोहरा बूथ पर नहीं, स्कूल की कक्षा में तैयार हो रहा है। आज वह विद्यार्थी है, कल कॉलेज का युवा होगा और उसके बाद मतदाता।
यही वजह है कि मध्यप्रदेश की राजनीति में आने वाले वर्षों का सबसे बड़ा सवाल शायद यह नहीं होगा कि भाजपा के पास कितने बूथ हैं, बल्कि यह होगा कि स्कूल से निकलने वाली नई पीढ़ी में भाजपा के पास कितने संपर्क, कितने संवाद और कितने समर्थक हैं।
यानी खेल 2028 का दिखाई दे रहा है, लेकिन नजर 2033 और उसके आगे की राजनीति पर है।