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कार्यकर्ता अब बोझ नहीं, ताकत हैं — खंडेलवाल ने बदल दी भाजपा की कार्यसंस्कृति “वादों से आगे कार्रवाई: खंडेलवाल ने बदली भाजपा की राजनीति”

By,वामन पोटे

कार्यकर्ता अब बोझ नहीं, ताकत हैं — खंडेलवाल ने बदल दी भाजपा की कार्यसंस्कृति
“वादों से आगे कार्रवाई: खंडेलवाल ने बदली भाजपा की राजनीति”
बैतूल 31 जनवरी ।।
भाजपा में वर्षों से चल रही एक बड़ी बीमारी रही है — कार्यकर्ता सुना जाता था, लेकिन निपटारा नहीं होता था। आवेदन आते थे, आश्वासन मिलते थे, लेकिन फाइलें सिस्टम की धूल में गुम हो जाती थीं। इसी जड़ता पर अब प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने सीधा प्रहार कर दिया है। उन्होंने संगठन को साफ संदेश दे दिया है — अब शिकायत नहीं, समाधान चलेगा। अब रसूख नहीं, रिकॉर्ड बोलेगा।
खंडेलवाल की नई व्यवस्था सिर्फ प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि संगठनात्मक सत्ता संरचना में बड़ा झटका है। पहली बार तय किया गया है कि हर आवेदन की एक्शन रिपोर्ट सीधे प्रदेश अध्यक्ष तक पहुंचेगी। यानी अब न मंत्री बच सकेंगे, न अफसर और न ही संगठन पदाधिकारी — सबको जवाब देना होगा। यह भाजपा की राजनीति में अब तक का सबसे सख्त जवाबदेही मॉडल माना जा रहा है।
सबसे बड़ा हमला उस संस्कृति पर है जिसमें कार्यकर्ता को दर-दर भटकाया जाता था। अब “सहयोग सेल पोर्टल” के जरिए हर आवेदन डिजिटल रिकॉर्ड बनेगा, टोकन नंबर मिलेगा और उसका स्टेटस ट्रैक होगा। मतलब साफ है — अब कोई फाइल दबा नहीं सकेगा, कोई मामला टाल नहीं सकेगा और कोई कार्यकर्ता अनसुना नहीं रहेगा।
यहीं नहीं, खंडेलवाल ने रोस्टर सिस्टम में भी बड़ा बदलाव कर दिया है। अब मंत्री अकेले नहीं बैठेंगे — उनके साथ संगठन पदाधिकारी भी अनिवार्य होंगे। यानी पार्टी से जुड़े मामलों में अब विभागों पर नहीं, संगठन पर सीधा फैसला होगा। यह कदम साफ दिखाता है कि भाजपा नेतृत्व अब सरकार को नहीं, संगठन को प्राथमिकता देने के मूड में है।
राजनीतिक गलियारों में इस फैसले को “सिस्टम के अंदर सिस्टम की सर्जरी” कहा जा रहा है। वर्षों से संगठन में यह शिकायत रही है कि बड़े नेता और पदाधिकारी आम कार्यकर्ता से कट चुके हैं। कई जिलों में कार्यकर्ताओं की उपेक्षा ने पार्टी को भीतर ही भीतर कमजोर किया है। खंडेलवाल की यह पहल उसी टूटन को जोड़ने की कोशिश नहीं, बल्कि भविष्य के चुनावों की तैयारी में संगठन को जमीनी लड़ाकू मशीन में बदलने की रणनीति है।
इस मॉडल का असली असर मंत्री और अफसरशाही पर पड़ेगा। अब उन्हें हर मामले में लिखित बताना होगा कि किस अधिकारी को निर्देश दिए, क्या कार्रवाई हुई और कितने समय में समाधान हुआ। यानी अब फाइलें घूमने के बजाय नतीजे देने को मजबूर होंगी। यह व्यवस्था सीधे तौर पर सत्ता के आरामदेह ढांचे को चुनौती देती है।
सबसे अहम बात यह है कि खंडेलवाल ने कार्यकर्ता को भावनात्मक नारे नहीं, बल्कि प्रशासनिक ताकत दी है। यह भाजपा के भीतर नेतृत्व के नए स्कूल की शुरुआत है — जहां संगठन फोटो से नहीं, फाइल से चलेगा; भाषण से नहीं, डेटा से चलेगा; और वादे से नहीं, रिपोर्ट से चलेगा।
राजनीति में अक्सर घोषणाएं होती हैं, बदलाव नहीं। लेकिन इस बार बदलाव सिस्टम में लिखा जा रहा है। यही कारण है कि भाजपा संगठन में इसे सिर्फ सुधार नहीं, बल्कि “साइलेंट रेवोल्यूशन” माना जा रहा है — ऐसा बदलाव जो शोर नहीं करता, लेकिन जड़ें हिला देता है।

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