महाशिवरात्रि पर चौरागढ़ में उमड़ा आस्था का सैलाब: 1300 सीढ़ियां चढ़कर भक्तों ने चढ़ाए त्रिशूल, सिंदूर और कपूर से पूरी की मन्नत
By,वामन पोटे
महाशिवरात्रि पर चौरागढ़ में उमड़ा आस्था का सैलाब: 1300 सीढ़ियां चढ़कर भक्तों ने चढ़ाए त्रिशूल, सिंदूर और कपूर से पूरी की मन्नत
पचमढ़ी 15 फरवरी।। मध्य प्रदेश के एकमात्र हिल स्टेशन और देवों के देव महादेव की पावन नगरी पचमढ़ी इन दिनों शिवभक्ति के रंग में पूरी तरह रंगी हुई है। महाशिवरात्रि के अवसर पर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहां पहुंच रहे हैं। पचमढ़ी की सबसे ऊंची और पवित्र चोटियों में शामिल चौरागढ़ मंदिर में महाशिवरात्रि के मौके पर एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने पहुंचकर भगवान महादेव के दर्शन किए और अपनी मनोकामनाएं पूरी होने की कामना की।
चौरागढ़ की यात्रा को श्रद्धालु अत्यंत कठिन लेकिन पुण्यदायी मानते हैं। यहां पहुंचने के लिए भक्तों को लगभग 1300 खड़ी सीढ़ियों की कठिन चढ़ाई पूरी करनी पड़ती है। इस दौरान भक्त ‘हर हर महादेव’ और ‘बम बम भोले’ के जयकारों के साथ उत्साहपूर्वक आगे बढ़ते हैं। चौरागढ़ की ऊंची पहाड़ी पर स्थित मंदिर में भगवान शिव के दर्शन करना भक्तों के लिए विशेष आध्यात्मिक अनुभव माना जाता है।
दो जिलों की सीमाओं से शुरू होती है आस्था की चढ़ाई
चौरागढ़ मंदिर की यात्रा दो प्रमुख प्रवेश द्वारों से शुरू होती है। पहला प्रवेश द्वार नर्मदापुरम जिले के पचमढ़ी से लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित है, जबकि दूसरा प्रवेश मार्ग छिंदवाड़ा जिले की सीमा पर भूरा भगत क्षेत्र से होकर जाता है। इन दोनों स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु चौरागढ़ की कठिन चढ़ाई पूरी करते हैं।
मान्यता के अनुसार, चौरागढ़ की चढ़ाई शुरू करने से पहले भक्त प्रवेश द्वार पर सिंदूर, कपूर, नारियल, खारक, सुपारी और छोटे त्रिशूल अर्पित करते हैं। इसके बाद ही वे अपनी मन्नत की चढ़ाई शुरू करते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और भक्त इसे अपनी श्रद्धा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।
मन्नत पूरी होने पर चढ़ाया जाता है त्रिशूल
चौरागढ़ मंदिर की सबसे खास परंपरा यहां त्रिशूल अर्पित करने की है। भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने पर भगवान शिव को त्रिशूल अर्पित करते हैं। यही कारण है कि मंदिर परिसर में हजारों की संख्या में त्रिशूल स्थापित दिखाई देते हैं। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु यहां त्रिशूल चढ़ाते हैं।
इस वर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर महाराष्ट्र से आए श्रद्धालुओं का एक समूह एक क्विंटल से अधिक वजन का विशाल त्रिशूल लेकर पहुंचा। भक्त नाचते-गाते और भजन गाते हुए इस भारी त्रिशूल को 1300 सीढ़ियां चढ़कर मंदिर तक ले जा रहे हैं। यह दृश्य श्रद्धा, समर्पण और आस्था का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।
भूरा भगत की तपस्या से जुड़ी है ऐतिहासिक मान्यता
चौरागढ़ मंदिर का संबंध संत भूरा भगत की तपस्या से भी जुड़ा हुआ है। मंदिर के पुजारी देवीदास महाराज के अनुसार, 16वीं सदी में नागवंशी परिवार में जन्मे संत भूरा भगत ने इस पर्वत पर भगवान शिव की कठोर साधना की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान महादेव ने उन्हें दर्शन दिए थे। संत भूरा भगत को कतिया और आदिवासी समाज के कुल देवता के रूप में पूजा जाता है।
आज भी श्रद्धालु चौरागढ़ की चढ़ाई शुरू करने से पहले भूरा भगत की तपोस्थली पर दर्शन करते हैं। मान्यता है कि उनके दर्शन के बिना चौरागढ़ की यात्रा अधूरी मानी जाती है।
पौराणिक कथाओं से जुड़ा है चौरागढ़ का महत्व
चौरागढ़ मंदिर से कई पौराणिक कथाएं भी जुड़ी हुई हैं। एक मान्यता के अनुसार, जब भस्मासुर को भगवान शिव से वरदान मिला और उसने शिवजी को ही भस्म करने का प्रयास किया, तब भगवान शिव ने पचमढ़ी की गुफाओं में शरण ली थी। इसके अलावा यह भी माना जाता है कि चौरा बाबा ने इस पर्वत पर कठोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और यह स्थान चौरागढ़ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
प्रशासन ने किए व्यापक इंतजाम
महाशिवरात्रि मेले को लेकर प्रशासन ने व्यापक तैयारियां की हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा के लिए 1500 से अधिक पुलिसकर्मियों और सरकारी कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई है। पूरे मार्ग में सुरक्षा, चिकित्सा, पेयजल और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं।
चौरागढ़ के अलावा पचमढ़ी के प्रसिद्ध बड़ा महादेव और जटाशंकर मंदिरों में भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिल रही है। हर ओर शिवभक्ति का माहौल है और भक्त पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ भगवान महादेव की आराधना कर रहे हैं।
महाशिवरात्रि के इस पावन अवसर पर चौरागढ़ मंदिर एक बार फिर आस्था, विश्वास और भक्ति का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है, जहां हजारों श्रद्धालु कठिन चढ़ाई पार कर भगवान शिव के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित कर रहे हैं।

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