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90 की उम्र में अक्षर ज्ञान की मिसाल: शिक्षकों के प्रयास से बुजुर्गों ने दी साक्षरता परीक्षा

By,वामन पोटे

90 की उम्र में अक्षर ज्ञान की मिसाल: शिक्षकों के प्रयास से बुजुर्गों ने दी साक्षरता परीक्षा
बैतूल 16 मार्च ।। मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में शिक्षा के प्रति जागरूकता और सामाजिक जिम्मेदारी की एक प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है। यहां उल्लास नवभारत साक्षरता कार्यक्रम के तहत आयोजित परीक्षा में ग्रामीण बुजुर्गों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। खास बात यह रही कि कई बुजुर्ग शुरुआत में परीक्षा देने से हिचक रहे थे, लेकिन शिक्षकों की मेहनत, समझाइश और सहयोग के कारण वे परीक्षा केंद्र तक पहुंचे और आत्मविश्वास के साथ परीक्षा दी।
यह परीक्षा शनिवार को बैतूल जिले के ढोडवाड़ा स्कूल में आयोजित की गई थी। कार्यक्रम का उद्देश्य गांव के निरक्षर वयस्कों और बुजुर्गों को अक्षर ज्ञान से जोड़ना और उन्हें पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित करना था। परीक्षा में शामिल होने के लिए गांव के कई बुजुर्गों को शिक्षकों ने व्यक्तिगत रूप से प्रेरित किया।
जानकारी के अनुसार, कई बुजुर्गों ने शुरुआत में परीक्षा में शामिल होने में संकोच जताया। जैसे ही इसकी जानकारी शिक्षकों को मिली, उन्होंने इसे चुनौती के रूप में लिया और सुबह से ही गांव में घर-घर जाकर बुजुर्गों और उनके परिजनों को साक्षरता का महत्व समझाया। तेज धूप के बावजूद शिक्षक गांव के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचे और लोगों को शिक्षा के प्रति प्रेरित किया।
शिक्षक मदनलाल डढोरे, राजू गंगारे, राजेंद्र कुमार बेले और अक्षर साथी बद्रीप्रसाद पवार ने इस पहल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने न केवल बुजुर्गों को समझाया बल्कि कई ऐसे लोगों तक भी पहुंचे जो खेतों में बने मकानों में रहते हैं। कुछ बुजुर्गों को शिक्षकों ने अपनी गाड़ी से परीक्षा केंद्र तक लाकर परीक्षा दिलाई। परीक्षा समाप्त होने के बाद उन्हें सम्मानपूर्वक वापस उनके घर भी छोड़ा गया।
इस साक्षरता परीक्षा की सबसे भावुक और प्रेरणादायक तस्वीर 90 वर्षीय ईठा बाई पंडाग्रे की रही। इतनी अधिक उम्र होने के बावजूद उन्होंने साक्षर बनने की इच्छा जाहिर की और परीक्षा में भाग लिया। उनकी सीखने की लगन देखकर शिक्षक भी भावुक हो गए। परीक्षा के दौरान उनसे अक्षर ज्ञान और चित्र पहचान से जुड़े सरल प्रश्न पूछे गए, जिनका उन्होंने आत्मविश्वास के साथ सही उत्तर दिया।
अन्य बुजुर्ग परीक्षार्थियों ने भी इस पहल की सराहना की। उनका कहना था कि सरकार द्वारा चलाया जा रहा यह साक्षरता अभियान उनके जैसे लोगों के लिए नई उम्मीद लेकर आया है। कई बुजुर्गों ने कहा कि वे अब अपना नाम लिखना और किताब पढ़ना सीखना चाहते हैं, जो अब तक उनके लिए एक अधूरा सपना था।
शिक्षक मदनलाल डढोरे ने बताया कि बच्चों को पढ़ाना उनका कर्तव्य है, लेकिन जब बुजुर्ग भी अक्षर ज्ञान हासिल करने की इच्छा दिखाते हैं तो शिक्षक होने का वास्तविक उद्देश्य पूरा होता हुआ महसूस होता है। उन्होंने कहा कि बुजुर्गों की सीखने की ललक शिक्षकों के लिए भी प्रेरणा का काम करती है।
इस पहल की ग्रामीणों, पालक-शिक्षक संघ के सदस्यों और अन्य शिक्षकों ने भी सराहना की। उनका मानना है कि यदि इसी तरह सामूहिक प्रयास जारी रहे तो गांवों से निरक्षरता को समाप्त करना संभव हो सकेगा। कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण और शिक्षक उपस्थित रहे और सभी ने इस पहल को समाज के लिए सकारात्मक कदम

 

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