बैतूल में अवैध कोयला खनन का फैलता साम्राज्य, कार्रवाई के बावजूद शाहपुर-डुल्हारा-चोपना बना हॉटस्पॉट
By,वामन पोटे
बैतूल में अवैध कोयला खनन का फैलता साम्राज्य, कार्रवाई के बावजूद शाहपुर-डुल्हारा-चोपना बना हॉटस्पॉट

बैतूल 3 अप्रैल ।। मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में अवैध कोयला खनन का जाल लगातार फैलता जा रहा है। प्रशासनिक सख्ती और समय-समय पर होने वाली कार्रवाई के बावजूद शाहपुर, डुल्हारा और चोपना पुनर्वास क्षेत्र अवैध खनन के प्रमुख केंद्र बनते जा रहे हैं। हालात यह हैं कि तवा नदी के किनारों से शुरू हुआ यह अवैध कारोबार अब निजी खेतों और शासकीय जमीनों तक पहुंच चुका है।
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, खनन माफिया द्वारा सैकड़ों की संख्या में गहरे गड्ढे खोदे गए हैं, जो देखने में कुओं जैसे लगते हैं। इन गड्ढों के जरिए भूमिगत कोयले तक पहुंच बनाई जाती है और फिर क्रेन, विंच मशीनों और अन्य उपकरणों की मदद से कोयला निकाला जाता है। इसके बाद इस अवैध कोयले को ट्रैक्टर-ट्रॉलियों और अन्य माध्यमों से जिले के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी सप्लाई किया जा रहा है।
बताया जा रहा है कि शाहपुर, घोड़ाडोंगरी, चिचोली और बैतूल क्षेत्र के ईंट भट्टों में बड़े पैमाने पर इसी अवैध कोयले की खपत हो रही है। दिन-रात चल रहे इस कारोबार ने एक संगठित नेटवर्क का रूप ले लिया है, जिसमें स्थानीय स्तर से लेकर बाहरी तत्वों की भी भूमिका बताई जा रही है।
इधर, घोड़ाडोंगरी तहसील के ग्राम डुल्हारा में तवा नदी किनारे हाल ही में खनिज विभाग द्वारा की गई कार्रवाई ने इस पूरे मामले को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी के निर्देश पर चलाए गए विशेष अभियान के तहत खनिज अमले ने अवैध खनन से बने गड्ढों और सुरंगनुमा संरचनाओं को भरकर बंद किया।
खनिज विभाग को 31 मार्च को सूचना मिली थी कि डुल्हारा क्षेत्र में अवैध उत्खनन हो रहा है। निरीक्षण के दौरान मौके पर कोई व्यक्ति तो नहीं मिला, लेकिन दो स्थानों पर ताजे गड्ढे, कोयले के अवशेष और भंडारण के संकेत मिले। अगले दिन 1 अप्रैल को टीम ने जेसीबी मशीन की मदद से गड्ढों को मिट्टी, मुरूम और बोल्डर से भर दिया, साथ ही सुरंगनुमा ढांचे को भी पूरी तरह बंद कर दिया।
हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह की कार्रवाई केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। खनन माफिया कार्रवाई के बाद कुछ समय के लिए शांत रहते हैं, लेकिन फिर नए स्थानों पर खनन शुरू कर देते हैं। यही वजह है कि वर्षों से यह अवैध कारोबार पूरी तरह खत्म नहीं हो सका है।
गौरतलब है कि पूर्व में जिले के एक कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक स्वयं इन अवैध खदानों में उतरकर निरीक्षण कर चुके हैं। उस दौरान सामने आया था कि छोटे-छोटे मुहानों से शुरू हुई खुदाई अंदर जाकर कई किलोमीटर लंबी सुरंगों में तब्दील हो चुकी है। यह स्थिति न केवल अवैध खनन के बड़े नेटवर्क को दर्शाती है, बल्कि सुरक्षा के लिहाज से भी बेहद खतरनाक है।
सूत्रों के अनुसार, इन अवैध खदानों के संचालन में वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (WCL) की खदानों से रिटायर हो चुके कुछ अनुभवी लोगों की सेवाएं भी ली जा रही हैं। इनके तकनीकी ज्ञान का उपयोग कर माफिया सुरक्षित और गहराई तक खनन करने में सफल हो रहे हैं, जिससे प्रशासन के लिए इस पर पूरी तरह अंकुश लगाना और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है।
अवैध खनन के कारण शासन को भारी राजस्व हानि हो रही है। इसके साथ ही पर्यावरण पर भी गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। तवा नदी के किनारे और आसपास के क्षेत्रों में खुदाई से भू-क्षरण बढ़ रहा है, जल स्रोत प्रभावित हो रहे हैं और प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है। खुले गहरे गड्ढे दुर्घटनाओं को भी न्योता दे रहे हैं, जिससे स्थानीय लोगों और पशुओं के लिए खतरा बना हुआ है।
खनिज विभाग का कहना है कि अवैध खनन पर रोक लगाने के लिए लगातार निगरानी रखी जा रही है और भविष्य में भी सख्त कार्रवाई जारी रहेगी। हालांकि, जमीनी स्थिति को देखते हुए यह साफ है कि केवल छिटपुट कार्रवाई से इस संगठित अवैध कारोबार पर पूरी तरह लगाम लगाना आसान नहीं होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या के समाधान के लिए सतत निगरानी, कड़ी कानूनी कार्रवाई और स्थानीय स्तर पर जनसहभागिता जरूरी है। जब तक प्रशासन, पुलिस और स्थानीय समुदाय मिलकर प्रयास नहीं करेंगे, तब तक बैतूल में अवैध कोयला खनन का यह जाल यूं ही फैलता रहेगा।
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