बैतूल की बेटी सम्मान मुहिम को मिली वैश्विक पहचान, अमेरिका में बेटी के नाम से स्थापित हुई घर की पहचान
By, वामन पोटे
बैतूल की बेटी सम्मान मुहिम को मिली वैश्विक पहचान, अमेरिका में बेटी के नाम से स्थापित हुई घर की पहचान
बैतूल, 1 जून ।। मध्य प्रदेश के बैतूल जिले से शुरू हुआ बेटियों के सम्मान और सामाजिक पहचान का अनूठा अभियान अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बना रहा है। “बेटी के नाम घर की पहचान” नामक यह सामाजिक मुहिम अब अमेरिका तक पहुंच गई है। एरिजोना राज्य के फीनिक्स शहर में एक परिवार ने अपने घर की पहचान बेटी मिशिका मिश्रा के नाम से स्थापित कर इस अभियान को वैश्विक विस्तार देने का काम किया है। इसे बेटियों को समान सम्मान और सामाजिक पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
जानकारी के अनुसार, अमेरिका के एरिजोना राज्य के फीनिक्स शहर स्थित 1949 डब्ल्यू हॉर्स टेल ट्रेल पते पर मिशिका मिश्रा के नाम की नेम प्लेट लगाई गई है। मिशिका के पिता अंशुमान मिश्रा हैं। परिवार ने बेटी के नाम से घर की पहचान स्थापित किए जाने को सम्मान और गर्व का विषय बताते हुए कहा कि यह कदम केवल एक प्रतीकात्मक पहल नहीं, बल्कि समाज में बेटियों के महत्व को स्वीकार करने और उन्हें समान स्थान देने का संदेश है।
मिशिका के नाम की यह नेम प्लेट उनके दादा राकेश मिश्रा द्वारा विशेष रूप से भेजी गई थी। इस कार्य को सफल बनाने में सामाजिक कार्यकर्ता दिलीप लाड़ का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहा। परिवार के सदस्यों ने कहा कि जब घर की पहचान बेटी के नाम से होती है तो यह पूरे समाज को एक सकारात्मक संदेश देता है कि बेटियां परिवार की जिम्मेदारी नहीं बल्कि उसकी पहचान और गौरव होती हैं।
लाडो फाउंडेशन के संस्थापक अनिल यादव ने बताया कि “बेटी के नाम घर की पहचान” अभियान पिछले एक दशक से लगातार चलाया जा रहा है। इस अभियान का उद्देश्य समाज में बेटियों के प्रति सम्मान और सकारात्मक सोच विकसित करना है। उन्होंने कहा कि वर्षों से घरों की पहचान प्रायः परिवार के पुरुष सदस्यों के नाम से की जाती रही है, लेकिन इस अभियान के माध्यम से बेटियों को भी परिवार की पहचान का आधार बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
यादव ने बताया कि अभियान के तहत देशभर में हजारों घरों पर बेटियों के नाम की नेम प्लेट लगाई जा चुकी हैं। इससे परिवारों में बेटियों के प्रति सम्मान बढ़ा है और समाज में यह संदेश गया है कि बेटियां भी परिवार की बराबर की भागीदार हैं। उन्होंने कहा कि यह पहल केवल नाम पट्टिका लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक मानसिकता में बदलाव लाने का अभियान है।
उन्होंने बताया कि यह मुहिम देश के 28 राज्यों में पहुंच चुकी है और अब विदेशों में भी इसकी चर्चा हो रही है। अमेरिका के फीनिक्स शहर में मिशिका मिश्रा के नाम से घर की पहचान स्थापित होना इस बात का प्रमाण है कि बेटियों के सम्मान का संदेश सीमाओं और देशों की दूरी से परे जाकर लोगों को प्रेरित कर रहा है। यह उपलब्धि बैतूल सहित पूरे देश के लिए गौरव का विषय है।
अनिल यादव का कहना है कि समाज में लैंगिक समानता स्थापित करने के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सामाजिक व्यवहार और सोच में बदलाव भी जरूरी है। जब परिवार स्वयं बेटियों को सम्मान देते हैं और उन्हें घर की पहचान से जोड़ते हैं, तब समाज में सकारात्मक परिवर्तन की मजबूत नींव तैयार होती है।
उन्होंने कहा कि जहां घर की पहचान बेटी के नाम से होती है, वहां दहेज प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या और लैंगिक भेदभाव जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ स्वतः एक मजबूत संदेश जाता है। ऐसे परिवार समाज के लिए प्रेरणा बनते हैं और अन्य लोगों को भी बेटियों को सम्मान देने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
लाडो फाउंडेशन का लक्ष्य आने वाले वर्षों में इस अभियान को और व्यापक बनाना है, ताकि देश और विदेश में अधिक से अधिक परिवार बेटियों के नाम से घर की पहचान स्थापित करें। बैतूल से शुरू हुई यह मुहिम अब वैश्विक स्तर पर बेटियों के सम्मान, समानता और सशक्तिकरण की नई मिसाल बनकर उभर रही है।
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