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राज्यसभा रण में बड़ा उलटफेर: मीनाक्षी का पर्चा खारिज, कांग्रेस बोली- लोकतंत्र की हत्या, भाजपा ने कहा- सत्य की जीत

By, वामन पोटे

राज्यसभा रण में बड़ा उलटफेर: मीनाक्षी का पर्चा खारिज, कांग्रेस बोली- लोकतंत्र की हत्या, भाजपा ने कहा- सत्य की जीत

भोपाल/नई दिल्ली, 10 जून । मध्य प्रदेश के राज्यसभा चुनाव में मंगलवार को उस समय बड़ा राजनीतिक भूचाल आ गया जब कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र निर्वाचन अधिकारी ने निरस्त कर दिया। इस फैसले ने राज्यसभा चुनाव को लेकर चल रही राजनीतिक लड़ाई को सीधे चुनावी और संवैधानिक विवाद में बदल दिया है। भाजपा ने इसे “सत्य की जीत” करार दिया है, जबकि कांग्रेस ने इसे “लोकतंत्र की हत्या” और “सीट चोरी की साजिश” बताते हुए चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
नामांकन निरस्त होने के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश, भूपेश बघेल, सचिन पायलट और केसी वेणुगोपाल नई दिल्ली स्थित चुनाव आयोग कार्यालय पहुंचे और फैसले के विरोध में धरने पर बैठ गए। कांग्रेस नेताओं का आरोप था कि आयोग ने उनकी बात सुनने के बजाय राजनीतिक दबाव में कार्रवाई की है।
विवाद की शुरुआत भाजपा द्वारा दर्ज कराई गई उस आपत्ति से हुई जिसमें दावा किया गया था कि मीनाक्षी नटराजन ने हैदराबाद की एक अदालत में लंबित निजी आपराधिक परिवाद की जानकारी अपने शपथपत्र (फॉर्म-26) में छिपाई है। भाजपा का कहना था कि उम्मीदवार को अपने खिलाफ लंबित मामलों की पूरी जानकारी देना अनिवार्य है और ऐसा न करना निर्वाचन नियमों का उल्लंघन है।
मामले की सुनवाई के बाद रिटर्निंग अधिकारी अरविंद शर्मा ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध दस्तावेजों से यह स्पष्ट हुआ है कि संबंधित न्यायालय मामले का संज्ञान ले चुका है, नटराजन को समन जारी किए जा चुके हैं तथा उन्होंने स्वयं उस प्रकरण में जवाब भी प्रस्तुत किया है। ऐसे में फॉर्म-26 में उक्त मामले का उल्लेख न करना तथ्यों को छिपाने के समान है। अधिकारी ने इसे अपूर्ण और भ्रामक शपथपत्र मानते हुए नामांकन निरस्त कर दिया।
निर्णय सामने आते ही भाजपा ने इसे अपनी बड़ी राजनीतिक जीत के रूप में पेश किया। मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री राकेश सिंह ने कहा कि कानून सभी के लिए समान है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस उम्मीदवार ने महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई और निर्वाचन प्रक्रिया को भ्रमित करने का प्रयास किया। उनके अनुसार निर्वाचन अधिकारी ने तथ्यों और नियमों के आधार पर पूरी तरह उचित फैसला दिया है।
दूसरी ओर कांग्रेस ने फैसले पर तीखा हमला बोला है। पार्टी के वरिष्ठ नेता विवेक तन्खा ने कहा कि मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है और न ही किसी प्रकार की एफआईआर हुई है। उन्होंने कहा कि केवल एक नोटिस जारी होने को लंबित आपराधिक प्रकरण नहीं माना जा सकता। कांग्रेस के कानूनी सलाहकार अजय गुप्ता ने भी दावा किया कि जिस नोटिस का हवाला दिया जा रहा है वह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 223(1) के तहत जारी किया गया था, जो केवल प्रस्तावित आरोपी को सुनवाई का अवसर देने की प्रक्रिया है। उनके अनुसार अदालत ने अभी विधिवत संज्ञान नहीं लिया था, इसलिए उसका उल्लेख करना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं था।
स्वयं मीनाक्षी नटराजन ने फैसले को लोकतंत्र पर हमला बताते हुए कहा कि भाजपा ने तब तीसरा उम्मीदवार उतारा जब उसके पास पर्याप्त वोट नहीं थे। उन्होंने आरोप लगाया कि जब भाजपा को एहसास हुआ कि कांग्रेस विधायक एकजुट हैं और उसकी रणनीति सफल नहीं होगी, तब एक नोटिस को आधार बनाकर उनकी उम्मीदवारी समाप्त कराई गई। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ उनका मामला नहीं बल्कि देश के लोकतंत्र की परीक्षा है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भी फैसले को राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित बताया। उनका कहना था कि कांग्रेस के कानूनी तर्कों को नजरअंदाज कर एक पूर्व निर्धारित निर्णय लागू किया गया है। पार्टी इस मामले को चुनाव आयोग और न्यायालय दोनों के समक्ष पूरी ताकत से उठाएगी।
राजनीतिक दृष्टि से यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि मध्य प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए चुनाव होना है। विधानसभा में भाजपा के पास 164 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस की प्रभावी संख्या करीब 62 मानी जा रही है। गणित के हिसाब से भाजपा दो और कांग्रेस एक सीट जीतने की स्थिति में थी। लेकिन भाजपा द्वारा तीसरे उम्मीदवार महेश केवट को मैदान में उतारने के बाद मुकाबला दिलचस्प हो गया था।
कांग्रेस को आशंका थी कि भाजपा क्रॉस वोटिंग या राजनीतिक प्रबंधन के जरिए तीसरी सीट भी हासिल करने की कोशिश कर सकती है। इसी कारण कांग्रेस अपने विधायकों को बेंगलुरु भेजने की तैयारी कर चुकी थी। अब मीनाक्षी नटराजन का नामांकन खारिज होने के बाद पूरी चुनावी तस्वीर बदल गई है।
संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि कांग्रेस के पास नामांकन वापसी की अंतिम तिथि तक चुनाव आयोग या न्यायालय में राहत मांगने का अवसर है। यदि इस दौरान किसी सक्षम प्राधिकरण ने हस्तक्षेप नहीं किया तो भाजपा के तीनों उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो सकते हैं।
फिलहाल राज्यसभा चुनाव का यह विवाद मध्य प्रदेश की राजनीति में नया तूफान लेकर आया है। एक ओर भाजपा इसे पारदर्शिता और कानून की जीत बता रही है, वहीं कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं के दुरुपयोग का उदाहरण बता रही है। आने वाले दिनों में यह लड़ाई अदालत, चुनाव आयोग और राजनीतिक मंचों पर और तेज होने के संकेत दे रही है।

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