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बेटियों ने निभाया बेटे का फर्ज़, मां को दी मुखाग्नि – पिता के साथ बेटियों के साहस की मिसाल, समाज में नई सोच को दी उड़ान

By,वामन पोटे

बेटियों ने निभाया बेटे का फर्ज़, मां को दी मुखाग्नि – पिता के साथ बेटियों के साहस की मिसाल, समाज में नई सोच को दी उड़ान
बैतूल, 15 सितम्बर ।।
मां का साया सिर से उठना किसी भी परिवार के लिए असहनीय क्षण होता है। मगर बैतूल जिले के आठनेर नगर में प्रतिष्ठित सोनी परिवार ने इस ग़म को साहस में बदलकर समाज को नई दिशा दिखाई। शनिवार को संतोष सोनी की पत्नी अनीता सोनी का हृदयगति रुकने से अचानक निधन हो गया। परिवार में बेटा नहीं है। ऐसे में पिता संतोष सोनी के साथ उनकी तीनों बेटियां—स्वाति, शीतल और भूमिका—ने मिलकर अंतिम संस्कार की पूरी ज़िम्मेदारी निभाई और उस परंपरा को चुनौती दी, जिसे सदियों से केवल बेटों का धर्म माना जाता रहा है।
अनीता सोनी के निधन की खबर फैलते ही नगर में शोक की लहर दौड़ गई। सुबह से ही रिश्तेदारों, मित्रों और नगरवासियों का परिवार के घर पर तांता लग गया। संतोष सोनी अपनी जीवनसंगिनी के अचानक बिछड़ने से गहरे सदमे में थे, फिर भी उन्होंने बेटियों को हिम्मत दी और अंतिम संस्कार की सारी तैयारियों में उनके साथ खड़े रहे।
बड़ी बेटी स्वाति, जिनका विवाह मासोद गांव में हुआ है, सूचना मिलते ही तुरंत आठनेर पहुंचीं। वहीं शीतल और भूमिका, जो अभी पढ़ाई कर रही हैं, ने भी अदम्य साहस दिखाया। तीनों बहनों ने पिता के साथ मिलकर मां की अर्थी को कंधा दिया। संतोष सोनी ने भी परंपरा से हटकर बेटियों को मुखाग्नि देने के लिए प्रोत्साहित किया।
जब श्मशान घाट पर तीनों बहनों ने अपने पिता की उपस्थिति में मां को मुखाग्नि दी, तो वहां मौजूद हर आंख नम हो उठी। नगर के सैकड़ों लोग इस दृश्य के गवाह बने और बेटियों के साहस व पिता की प्रगतिशील सोच की प्रशंसा करते रहे। हर कोई कह रहा था कि यह सिर्फ एक अंतिम संस्कार नहीं, बल्कि पीढ़ियों के लिए एक संदेश है कि संतान का कर्तव्य लिंग से बंधा नहीं है।
अर्थी को कंधा देने से लेकर सभी धार्मिक कर्मकांड तक, बेटियों ने पिता का साथ देकर समाज में यह संदेश दिया कि बेटियां किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं हैं। संतोष सोनी की ओर से बेटियों को मुखाग्नि देने की अनुमति और हौसला एक ऐसी मिसाल है, जो आने वाले समय में कई परिवारों को नई सोच अपनाने के लिए प्रेरित करेगी।
अंतिम यात्रा के दौरान नगर के कोने-कोने से लोग शामिल हुए। हर गली और हर मोहल्ले में यही चर्चा रही कि जिस तरह बेटियों ने अपने पिता का संबल बनकर मां को अंतिम विदाई दी, वह परंपरा तोड़ने वाला और प्रेरणादायक कदम है।
आठनेर में अनीता सोनी के निधन का ग़म तो गहरा है, पर संतोष सोनी और उनकी तीनों बेटियों ने अपने साहस और एकजुटता से पूरे समाज को यह अमूल्य संदेश दिया है—अंतिम संस्कार का अधिकार और कर्तव्य सिर्फ बेटों का नहीं, बल्कि हर संतान का होता है।

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