एक तरफ PM मोदी का जन्मदिन जश्न – दूसरी तरफ आदिवासी बच्चों की भूख-प्यास की चीख , शाहपुर का एकलव्य विद्यालय भ्रष्टाचार का अड्डा !
By,वामन पोटे
एक तरफ PM मोदी का जन्मदिन जश्न – दूसरी तरफ आदिवासी बच्चों की भूख-प्यास की चीख
मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट पर दाग – जनजाति मंत्री का गृह ज़िला, BJP प्रदेश अध्यक्ष का गढ़, फिर भी शाहपुर का एकलव्य विद्यालय भ्रष्टाचार का अड्डा!

बैतूल, 17 सितंबर ।।
एक तरफ PM मोदी का जन्मदिन जश्न – दूसरी तरफ आदिवासी बच्चों की भूख-प्यास की चीख
मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन मनाने के लिए भाजपा की रैली का शोर गूंज रहा है, लेकिन उसी वक्त मोदी के ही ड्रीम प्रोजेक्ट एकलव्य आवासीय विद्यालय के छात्र-छात्राएं व्यवस्था की बदहाली से त्रस्त होकर सड़क पर उतर आए।
खानपान ठेकेदार का घटिया खाना – बच्चे मजबूर
हॉस्टल में परोसा जा रहा घटिया और गंदा खाना महीनों से बच्चों को बीमार कर रहा है। ठेकेदार की मनमानी और प्रशासन की चुप्पी से तंग आकर छात्र-छात्राओं ने बुधवार को भोपाल–नागपुर हाइवे पर बरेठा तक 5 किलोमीटर पैदल मार्च किया।
कलेक्टर से मिलने निकले, रास्ते में रोका गया
कलेक्टर से अपनी पीड़ा बताने के लिए निकले इन बच्चों का गुस्सा साफ झलक रहा था। मगर प्रशासन ने रास्ते में रोकने की कोशिश की, फिर भी छात्र बरेठा तक पैदल पहुंचने में कामयाब रहे।
प्रधानमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट, लेकिन हकीकत चुभती
जनजातीय छात्रों के लिए मोदी के सपनों का एकलव्य विद्यालय आज बदइंतजामी का शिकार है। कलेक्टर खुद इस हॉस्टल समिति के अध्यक्ष हैं, फिर भी ठेकेदार पर कोई कार्रवाई नहीं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का गृह ज़िला होने के बावजूद हालात जस के तस।
आदिवासी बच्चों की सिसकियों में डूबा जश्न
जब सत्ता के गलियारों में जश्न का शोर गूंज रहा था, उसी वक्त मासूम आदिवासी छात्र सड़क पर न्याय की गुहार लगा रहे थे। अब सवाल उठता है कि क्या प्रधानमंत्री के सपनों का यह प्रोजेक्ट केवल कागजों पर ही चमकता रहेगा?
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट—एकलव्य आवासीय विद्यालय पर बैतूल ज़िले के शाहपुर में बड़ा दाग लग गया है। यह वही ज़िला है जो केंद्रीय जनजाति कार्य मंत्री डीडी उइके का गृह ज़िला है और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का गढ़ भी। बावजूद इसके, यहाँ आदिवासी छात्र-छात्राओं को घटिया खाना, गंदगी और अव्यवस्थाओं के बीच जीने को मजबूर किया जा रहा है।
तय ब्रांड का राशन पास हुआ, मगर ठेकेदार ने सरकारी दुकान का सड़ा-गला चावल और घटिया सामग्री सप्लाई की। और सबसे बड़ा सवाल—जब इस विद्यालय समिति का अध्यक्ष खुद बैतूल कलेक्टर है, तो निगरानी कौन कर रहा था?
बुधवार को 500 से अधिक आदिवासी छात्र-छात्राएं पैदल ही कलेक्टर से मिलने निकल पड़े। बच्चों ने खुलकर बताया कि प्राचार्य, नर्स और काउंसलर लगातार मानसिक प्रताड़ना दे रहे हैं, और भोजन की गुणवत्ता व साफ-सफाई की हालत बदतर है।
कलेक्टर नरेन्द्र कुमार सूर्यवंशी, जो स्वयं इस विद्यालय की प्रबंधन समिति के अध्यक्ष हैं, छात्रों की चीख सुनते ही मौके पर पहुंचे। उन्होंने नेशनल एजुकेशन सोसायटी फॉर ट्राइबल स्टूडेंट्स के कमिश्नर को फोन कर प्राचार्य, नर्स और काउंसलर को निलंबित करने का निर्देश दिया।
लेकिन यह कार्रवाई केवल आग बुझाने का तात्कालिक उपाय लगती है। असली सवाल तो यही है—
महीनों से घटिया खाना बच्चों को कौन परोस रहा था और प्रशासन हाथ पर हाथ रखे क्यों बैठा था?
कलेक्टर और जिला प्रशासन की निगरानी में ही यह सब कैसे चलता रहा?
जनजाति कार्य मंत्री के अपने गृह ज़िले में और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के गढ़ में मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट की यह दुर्दशा आखिर किसकी नाकामी है?
केंद्रीय मंत्री दुर्गादास उइके मौके पर पहुंचे और बच्चों की शिकायतें सुनीं, कलेक्टर ने छात्रों के साथ बैठकर भोजन भी किया। मगर आदिवासी बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करने वाला यह घोटाला केवल कुछ अफसरों के निलंबन से दबाया नहीं जा सकता।
यह मामला अब सिर्फ शाहपुर का नहीं रहा—यह प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट की साख पर सीधा प्रहार है।
👉 क्या प्रदेश सरकार और भाजपा नेतृत्व अपने ही गढ़ में ऐसी शर्मनाक लापरवाही पर चुप बैठे रहेंगे?
👉 क्या जनजाति कार्य मंत्री और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष इस पर जवाब देंगे?
आदिवासी बच्चों के हक़ पर डाका डालने वालों पर सिर्फ़ औपचारिक कार्रवाई नहीं, ऊपर तक जवाबदेही तय करने की माँग अब ज़ोर पकड़ रही है।
Comments are closed.