बैतूल जिला अस्पताल में आग: लाखों खर्च के बाद भी फेल हुआ ऑटोमैटिक फायर सिस्टम, लापरवाही आखिर किसकी ?
By,वामन पोटे
बैतूल जिला अस्पताल में आग: लाखों खर्च के बाद भी फेल हुआ ऑटोमैटिक फायर सिस्टम, लापरवाही आखिर किसकी ?
बैतूल 24 नवंबर ।।
जिला अस्पताल में रविवार सुबह लगी आग ने न सिर्फ पूरे परिसर में अफरा-तफरी मचा दी, बल्कि अस्पताल में स्थापित किए गए लाखों के ऑटोमैटिक फायर सिस्टम की असलियत भी सामने ला दी। आगजनी के दौरान पूरे अस्पताल परिसर में धुआं फैल चुका था, लेकिन वह सिस्टम, जो आग लगते ही अलार्म बजाने और पानी छोड़ने का दावा करता था, पूरी तरह फेल साबित हुआ। बाद में पता चला कि सिस्टम लगाने वाला ठेकेदार एक साल पहले ही काम अधूरा छोड़कर चला गया, और किसी ने अब तक इस पर ध्यान ही नहीं दिया।
कहाँ लगी आग?
ग्राउंड फ्लोर पर रैम्प के नीचे स्थित स्टोर रूम में सुबह करीब 9:10 बजे आग लगी। यहां इंदौर की कामथेन कंपनी का हाउसकीपिंग स्टोर था, जिसमें वाइपर, झाड़ू, मशीनें, फिनाइल और केमिकल रखे हुए थे। केमिकल की वजह से आग तेजी से फैल गई और धुआं पूरे अस्पताल के वार्डों में घुस गया।
धुआं फैलते ही मची अफरा-तफरी
मेल और फीमेल मेडिकल वार्ड में धुआं पहुंचते ही नर्सिंग स्टाफ ने मरीजों को बाहर निकालना शुरू किया। गंभीर मरीजों को ट्रामा सेंटर में शिफ्ट किया गया। कुल 13 मरीजों को अलग-अलग वार्डों से सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया।
फायर सिस्टम पूरी तरह फेल, लाखों पानी में
अस्पताल में लगभग एक साल पहले ऑटोमैटिक फायर सिस्टम लगाने का काम शुरू हुआ था। छत पर लाल पाइप और ऑटोमेटिक नोजल लगाए गए थे। दावा किया गया था कि आग लगते ही अलार्म बजेगा और पानी अपने आप बहेगा।
लेकिन रविवार को—
न अलार्म बजे,
न पानी निकला,
न सिस्टम ने कोई प्रतिक्रिया दी।
आरएमओ डॉ. रानू वर्मा ने बताया कि ठेकेदार एक साल पहले ही काम अधूरा छोड़कर चला गया, और तब से यह सिस्टम केवल “शोपीस” बनकर रह गया था।
अब सवाल उठता है—ठेकेदार भाग गया, लेकिन विभागीय अधिकारियों ने एक साल तक इसकी जांच क्यों नहीं की?
पुराने मैनुअल सिस्टम से बुझाई आग
अस्पतालकर्मियों ने पुराने मैनुअल फायर सिस्टम से 10 मिनट में आग पर काबू पाया। बाद में नगर पालिका की फायर ब्रिगेड पहुंची और पूरी तरह से आग बुझाई गई।
यह समय रहते नहीं होता तो नुकसान कई गुना अधिक हो सकता था।
किचन में थे 6 गैस सिलेंडर—टल गया बड़ा हादसा
स्टोर रूम के ठीक बगल में अस्पताल का किचन है, जहां 6 भरे हुए कमर्शियल गैस सिलेंडर रखे थे। यदि आग कुछ ही मिनट और अनियंत्रित रहती या किचन तक पहुंच जाती, तो जिला अस्पताल में बड़ा विस्फोट हो सकता था।
यानी अस्पताल की सुरक्षा पूरी तरह भगवान भरोसे थी।
अधिकारियों ने किया निरीक्षण—अब होगी जांच
घटना की जानकारी मिलते ही प्रभारी कलेक्टर अक्षत जैन, एडीएम वंदना जाट, सीएमएचओ और अन्य अधिकारी मौके पर पहुंचे।
कलेक्टर ने—
स्टोर में रखे सामान जब्त करने
आगजनी की विस्तृत जांच
और ऑटोमैटिक फायर सिस्टम फेल होने की जिम्मेदारी तय करने के निर्देश दिए हैं।
लापरवाही किसकी?
यह आगजनी केवल एक हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर उदाहरण है:
ठेकेदार काम अधूरा छोड़ गया—उस पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
फायर सिस्टम एक साल से बंद था—अस्पताल प्रबंधन को इसकी जानकारी क्यों नहीं थी?
नियमित सुरक्षा ऑडिट क्यों नहीं किया गया?
अस्पताल में रखे गए गैस सिलेंडरों की सुरक्षा मानक कौन जांचता है?
निष्कर्ष—सिस्टम नहीं, लापरवाही ने किया अस्पताल को असुरक्षित
जिला अस्पताल का ऑटोमैटिक फायर सिस्टम एक साल से अधूरा था, पर किसी अधिकारी ने इसकी समीक्षा तक नहीं की। लाखों रुपए खर्च करने के बाद भी अस्पताल भगवान भरोसे चल रहा था।
यह घटना इस बात का संकेत है कि यदि समय रहते मैनुअल सिस्टम न चलता तो किसी बड़े हादसे से इनकार नहीं किया जा सकता था।
अभी भी समय है—जिम्मेदारों की पहचान कर कड़ी कार्रवाई की जाए, ताकि आने वाले समय में मरीजों की जान सिर्फ “अधूरे सिस्टम” के भरोसे न रहे।
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