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“राजनीतिक संरक्षण टूटा ? लापरवाह ठेकेदार बाहर: 457 करोड़ की मेंढा-वर्धा जल योजनाओं के टेंडर निरस्त” तीन बड़े डेम घुघरी ,गढ़ा,मेंढ़ा भी अधूरे विभाग का दावा जून 2026 तक पूर्ण होगे ?

By,वामन पोटे

“राजनीतिक संरक्षण टूटा ?
लापरवाह ठेकेदार बाहर: 457 करोड़ की मेंढा-वर्धा जल योजनाओं के टेंडर निरस्त”
तीन बड़े डेम घुघरी ,गढ़ा,मेंढ़ा भी अधूरे
विभाग का दावा जून 2026 तक पूर्ण होगे ?

बैतूल 30 दिसंबर ।।ठेकेदार की लापरवाही और विभागीय ढिलाई ने बैतूल जिले की दो बहुप्रतीक्षित पेयजल योजनाओं को अधर में लाकर खड़ा कर दिया है। मेंढा और वर्धा जलाशय आधारित नल-जल योजनाओं के टेंडर आखिरकार निरस्त कर दिए गए हैं। इन योजनाओं पर कुल 457.57 करोड़ रुपये की लागत प्रस्तावित थी, जिनसे जिले के सात विकासखंडों के 332 गांवों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया जाना था। योजनाएं रद्द होने से हजारों ग्रामीण परिवारों का नल से पानी पाने का सपना एक बार फिर टल गया है।
मध्यप्रदेश जल निगम द्वारा संचालित इन योजनाओं का कार्य मेसर्स एलएन मालवीय इंफ्रा प्रोजेक्ट प्राइवेट लिमिटेड को सौंपा गया था। कंपनी को 14 मार्च 2023 को वर्क ऑर्डर जारी किया गया था और मार्च 2026 तक कार्य पूर्ण करने की समयसीमा तय थी। हालांकि लगभग दो वर्ष बीत जाने के बाद भी काम केवल 30 से 40 प्रतिशत तक ही हो सका। निर्माण की बेहद धीमी प्रगति, बार-बार चेतावनी के बावजूद सुधार न होने और तय लक्ष्य से काफी पीछे रहने के कारण जल निगम को टेंडर निरस्त करने का कठोर निर्णय लेना पड़ा।
वर्धा जलाशय परियोजना के तहत आमला, मुलताई और प्रभात पट्टन विकासखंडों के 91 गांवों में पेयजल आपूर्ति प्रस्तावित थी। इस योजना पर 134.59 करोड़ रुपये की लागत आनी थी। इन गांवों के ग्रामीण लंबे समय से पानी की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। गर्मी के महीनों में हालात और बदतर हो जाते हैं, जब कई बस्तियों में एक-एक टैंकर पर सैकड़ों लोगों की निर्भरता रहती है। वर्धा परियोजना से इन क्षेत्रों को स्थायी राहत मिलने की उम्मीद थी, लेकिन ठेकेदार की सुस्ती ने ग्रामीणों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
मेंढा जलाशय परियोजना जिले की सबसे बड़ी ग्रामीण आबादी से जुड़ी योजना थी। इसके तहत बैतूल, आमला, आठनेर और भैंसदेही विधानसभा क्षेत्रों के 241 गांवों को नल से जल आपूर्ति मिलनी थी। 323.98 करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना को जिले की जीवनरेखा माना जा रहा था। काम अधूरा रहने के कारण इन गांवों में आज भी कुएं, हैंडपंप, टैंकर और अस्थायी जल स्रोत ही सहारा बने हुए हैं। कई स्थानों पर भूजल स्तर गिरने से हालात और गंभीर हो चुके हैं।
जल निगम अधिकारियों का कहना है कि समयसीमा के अनुरूप कार्य न होने और अनुबंध की शर्तों के उल्लंघन के कारण टेंडर और अनुबंध निरस्त किए गए हैं। विभाग के अनुसार रिटेंडरिंग की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है और नए सिरे से ठेका जारी किया जाएगा। हालांकि नए ठेकेदार के चयन, कार्य प्रारंभ होने और परियोजना के पूर्ण होने में कम से कम डेढ़ वर्ष का समय और लग सकता है। ऐसे में 332 गांवों के लोगों को अभी लंबा इंतजार करना पड़ेगा।
इस पूरे मामले में विभागीय निगरानी पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। दो वर्षों तक कार्य की जमीनी हकीकत पर पर्याप्त नजर क्यों नहीं रखी गई, यह सवाल अब सार्वजनिक चर्चा में है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि ठेकेदार को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था, जिसके चलते वह न तो समयसीमा का पालन कर रहा था और न ही जनप्रतिनिधियों की बात सुन रहा था। शिकायतों के बावजूद लंबे समय तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
बताया जाता है कि पूर्व में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और बैतूल विधायक हेमंत खंडेलवाल द्वारा पीएचई मंत्री से इस मुद्दे पर मुलाकात की गई थी। इसके बाद भोपाल में पीएचई और जल निगम के अधिकारियों की उच्च स्तरीय बैठक भी हुई, जिसमें जिले के सभी विधायक शामिल हुए थे। बैठक में जमीनी स्थिति सामने आने के बाद विभाग पर कार्रवाई का दबाव बढ़ा। हेमंत खंडेलवाल के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद राजनीतिक स्तर पर नाराजगी खुलकर सामने आई, जिसके चलते आखिरकार कंपनी के दोनों बड़े टेंडर निरस्त किए गए।
ग्रामीणों का कहना है कि टेंडर निरस्त होना समस्या का समाधान नहीं है। जब तक घरों में नल से पानी नहीं पहुंचेगा, तब तक सख्ती का कोई मतलब नहीं है। जनहित से जुड़ी इतनी बड़ी योजनाओं में देरी ने प्रशासनिक जवाबदेही, निगरानी व्यवस्था और कार्यान्वयन प्रणाली की कमजोरियों को उजागर कर दिया है।
इस संबंध में जल निगम के महाप्रबंधक अविनाश दिवाकर ने कहा कि समयसीमा के अनुसार कार्य नहीं होने पर टेंडर और अनुबंध निरस्त किए गए हैं। रिटेंडरिंग की प्रक्रिया जारी है और प्रयास रहेगा कि परियोजनाओं को जल्द पूरा कर सभी गांवों तक पेयजल पहुंचाया जाए। हालांकि जमीनी सच्चाई यह है कि बैतूल के सैकड़ों गांवों में नल से पानी पहुंचने का इंतजार अभी खत्म होता नजर नहीं आ रहा है।इधर सूत्र बताते हैं कि इस कंपनी के गढ़ा जलाशय की समूह योजना का कार्य भी बेहद धीमी गति से चल रहा हैं।विभागीय सूत्रों ने बताया कि वर्धा समूह नल जल योजना का काम 25 प्रतिशत ही हुआ है वहीं मेढा समूह नल जल योजना का काम तो 15 प्रतिशत ही हुआ है जबकि ये दोनों योजनाएं मार्च 2026 में पूरी होनी थी।इधर जानकार बताते हैं कि जलसंसाधन विभाग के घुघरी , गढ़ा और मेंढ़ा जलाशय के कामों की रफ्तार भी बेहद धीमी है जिसके चलते भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने नाराजगी जताई थी बाद में भोपाल में सभी विधायकों की बैठक जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट के साथ। हुई थी ।बताया जाता है कि डेम निर्माण में लगी कंपनियों को भी राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है जिससे जिले की इन बड़ी और किसानों के बहुउपयोगी परियोजना अभी भी अधूरी वही विभाग इन परियोजनाओं को जून महीने तक पूरा होने का दावा कर रहा हैं।

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