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भाजपा का नया अध्यक्ष अपनी पहचान बना पाएगा, या फिर “भूतों के ढेरे” में उसकी आवाज भी कहीं गुम होकर रह जाएगी ? मजाक में नहीं, बैतूल भाजपा को दर्द के साथ “भूतों का ढेरा” कहने लगे

By,वामन पोटे

भाजपा का नया अध्यक्ष अपनी पहचान बना पाएगा, या फिर “भूतों के ढेरे” में उसकी आवाज भी कहीं गुम होकर रह जाएगी ?

मजाक में नहीं, बैतूल भाजपा को दर्द के साथ
“भूतों का ढेरा” कहने लगे
संगठन संकट
बैतूल।।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के गृह जिले बैतूल में इन दिनों राजनीति सिर्फ मंचों पर नहीं, बल्कि पार्टी कार्यालय के गलियारों और चाय की दुकानों तक में सरगर्म है। वजह साफ है — संगठन में नया अध्यक्ष तो आ गया, लेकिन सत्ता की असली चाबी अब भी पुराने हाथों में घूमती नजर आ रही है। जिला अध्यक्ष सुधाकर पवार, जिन्हें गांव-गांव भाजपा से जुड़े कार्यकर्ता स्नेह से “सीधा पवार” कहते हैं, इन दिनों अपने ही संगठन में खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। चेहरे पर मुस्कान जरूर है, लेकिन भीतर की बेचैनी साफ झलक रही है।
भाजपा कार्यालय की हालत कुछ ऐसी हो गई है कि वहां नए पोस्टर तो लग रहे हैं, दीवारों पर रंगरोगन भी हो रहा है, लेकिन फैसलों पर अब भी वही पुराने चेहरे छाए हुए हैं। कार्यकर्ता इसे मजाक में नहीं, बल्कि दर्द के साथ “भूतों का ढेरा” कहने लगे हैं। यहां ‘भूत’ से मतलब उन पूर्व पदाधिकारियों से है, जो औपचारिक रूप से पद पर नहीं हैं, फिर भी हर बैठक, हर निर्णय और हर नियुक्ति में उनकी मौजूदगी सबसे भारी पड़ रही है।
सूत्र बताते हैं कि सुधाकर पवार जब जिला अध्यक्ष बने, तो संगठन में नई ऊर्जा भरने का सपना लेकर आए थे। गांव-गांव घूमकर कार्यकर्ताओं से मिले, नई टीम बनाने के संकेत दिए और जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने की बात कही। लेकिन हर कोशिश पर जैसे अदृश्य दीवार खड़ी हो गई। ब्लॉक से लेकर मंडल स्तर तक वही पुराने नाम, वही पुराने चेहरे, वही पुराने समीकरण। नए लोगों को मौका मिलने की उम्मीद लगाए बैठे कार्यकर्ता धीरे-धीरे हताश होते जा रहे हैं।
इस पूरे राजनीतिक ड्रामे के केंद्र में हैं भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष ? पार्टी में उनकी मजबूत पकड़ किसी से छिपी नहीं है। कहा जा रहा है कि अपनी राजनीतिक पहुंच और पुराने नेटवर्क के दम पर उन्होंने जिला संगठन से लेकर मंडल संगठन तक अपनी पसंद के लोगों को ही आगे बढ़ाया है। नतीजा यह हुआ कि नया अध्यक्ष होते हुए भी सुधाकर पवार अपनी ही टीम चुनने में खुद को असमर्थ  रहे हैं। संगठन में यह चर्चा आम हो गई है कि अध्यक्ष तो नया है, लेकिन सत्ता की पटकथा अब भी पुरानी ही चल रही है।
हालात इतने तल्ख हो चुके हैं कि सुधाकर पवार ने अपनी पीड़ा कुछ स्थानीय और प्रदेश के अखबारो दफ्तरों तक भी पहुंचाई। सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने निजी बातचीत में संगठन के भीतर चल रही खींचतान और अपनी मजबूरी साझा की, लेकिन राजनीतिक दबाव और परिस्थितियों के चलते किसी ने भी खुलकर इसे छापने का साहस नहीं किया। अब वही बातें गुपचुप चौक-चौराहों, पान ठेलों और चाय दुकानों पर चटकारे लेकर सुनाई जा रही हैं। लोग कहते हैं — “पवार अच्छे आदमी हैं, पर संगठन में अकेले पड़ गए हैं।”
पार्टी कार्यालय में बैठकों का माहौल भी बदला-बदला सा है। कई बार ऐसा होता है कि नए अध्यक्ष मौजूद रहते हैं, लेकिन चर्चा और फैसलों की दिशा पुराने नेता तय करते हैं। नए पदाधिकारी खुद को हाशिये पर महसूस करते हैं और पुराने चेहरे बिना किसी औपचारिक जिम्मेदारी के भी पूरे आत्मविश्वास के साथ बैठकें संचालित करते नजर आते हैं। इससे कार्यकर्ताओं में यह संदेश जा रहा है कि नेतृत्व बदला जरूर है, लेकिन व्यवस्था वही पुरानी है।
दिलचस्प बात यह है कि सुधाकर पवार भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के बेहद करीबी और विश्वासपात्र माने जाते हैं। यही वजह है कि कार्यकर्ताओं को उनसे बड़ी उम्मीदें थीं। माना जा रहा था कि प्रदेश नेतृत्व का भरोसा उन्हें संगठन में मजबूती देगा, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। पुराने समीकरण इतने मजबूत हैं कि नए अध्यक्ष की राह में हर कदम पर रोड़े अटक रहे हैं।
प्रदेश अध्यक्ष के गृह जिले में इस तरह की स्थिति बनना पार्टी के लिए भी शुभ संकेत नहीं माना जा रहा। आमतौर पर यह जिला संगठनात्मक अनुशासन और मजबूती का उदाहरण माना जाता रहा है, लेकिन अब यहां अंदरूनी कलह खुलकर सामने आ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि नए नेतृत्व को खुलकर काम करने का मौका नहीं मिला, तो इसका असर आगामी चुनावी तैयारियों पर भी पड़ सकता है। कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटना किसी भी पार्टी के लिए सबसे बड़ा खतरा होता है।
भाजपा कार्यालय में इन दिनों रंगरोगन हो रहा है, नई कुर्सियां लग रही हैं, पोस्टरों पर नए चेहरे चमक रहे हैं, लेकिन अंदरूनी व्यवस्था में बदलाव की चमक अब तक दिखाई नहीं दे रही। सुधाकर पवार की हालत उस कप्तान जैसी बताई जा रही है, जिसके हाथ में टीम की जिम्मेदारी तो है, लेकिन खिलाड़ी चुनने का अधिकार किसी और के पास है। यही वजह है कि वे कई बार मुस्कराते हुए भी भीतर से टूटे हुए नजर आते हैं।
अब सवाल यह है कि क्या सुधाकर पवार इस राजनीतिक भूलभुलैया से निकलकर संगठन को नई दिशा दे पाएंगे, या फिर वे भी पुराने ढांचे के भीतर ही सीमित होकर रह जाएंगे? क्या प्रदेश नेतृत्व इस स्थिति में हस्तक्षेप करेगा, या फिर बैतूल भाजपा की यह अंदरूनी लड़ाई यूं ही कार्यकर्ताओं के मनोबल को कमजोर करती रहेगी?
फिलहाल तो स्थिति यही है कि भाजपा कार्यालय में हलचल तो बहुत है, लेकिन बदलाव की आहट अब तक दूर-दूर तक सुनाई नहीं दे रही। संगठन के गलियारों में एक ही सवाल गूंज रहा है — क्या नया अध्यक्ष अपनी पहचान बना पाएगा, या फिर “भूतों के ढेरे” में उसकी आवाज भी कहीं गुम होकर रह जाएगी?

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