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बैतूल में ,भाजपा की मजबूत इमारत  दावे खोखले ! संगठन की अंदरूनी हकीकत उजागर

By,वामन पोटे

बैतूल में ,भाजपा की मजबूत इमारत  दावे खोखले !
संगठन की अंदरूनी हकीकत उजागर
बैतूल (वामन पोटे)_
कहावत है—जो किला बाहर से मजबूत दिखे, वही सबसे पहले भीतर से ढहता है। बैतूल जिले में भाजपा की हालत भी कुछ ऐसी ही होती जा रही है। सत्ता, संसाधन और संगठनात्मक ढांचे के बावजूद पार्टी आज जमीन पर कमजोर, दिशाहीन और नेतृत्वहीन नजर आ रही है। मजबूत संगठन के दावे अब खोखले नारों में तब्दील होते दिख रहे हैं।
भाजपा के पितृपुरुष स्वर्गीय सांसद बाबूजी विजयकुमार खंडेलवाल ने जिस संगठन की नींव मजबूत विचारधारा, कार्यकर्ता संस्कृति और अनुशासन पर रखी थी, वही संगठन आज अंदरूनी गुटबाजी, सत्ता केंद्रित राजनीति और रबर स्टैंप नेतृत्व का शिकार होता जा रहा है। पार्टी का भवन भले ही मजबूत खड़ा हो, लेकिन उसके भीतर आत्मा कमजोर होती नजर आ रही है।
नेतृत्व पर सबसे बड़ा सवाल
भाजपा जिला अध्यक्ष सुधाकर पवार को लेकर पार्टी के भीतर ही गंभीर असंतोष उभर चुका है। कार्यकर्ता हों या पदाधिकारी, कोई भी उन्हें प्रभावी नेतृत्वकर्ता मानने को तैयार नहीं दिखता। सत्ता पक्ष का अध्यक्ष होने के कारण प्रशासनिक औपचारिक सम्मान तो मिलता है, लेकिन राजनीतिक वजन और दबदबा लगभग नदारद है। यही कारण है कि अधिकारी भी उन्हें गंभीरता से नहीं लेते।
पार्टी के अंदर यह चर्चा आम है कि जिला संगठन अब “निर्णय लेने वाली इकाई” नहीं बल्कि “निर्देश मानने वाला कार्यालय” बन चुका है। स्थानीय नेतृत्व सिर्फ दस्तखत करने और औपचारिक बैठकों तक सीमित रह गया है। ऐसे में संगठन की कमान ऐसे हाथों में है, जिनमें न तो दिशा देने की क्षमता दिखती है और न ही संघर्ष की इच्छाशक्ति।
बरगद के नीचे संगठन बौना !
बैतूल भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और विधायक हेमंत खंडेलवाल का गृह जिला है। राजनीतिक हलकों में यह माना जा रहा है कि जब जिला शीर्ष सत्ता केंद्र का घर बन जाता है, तो स्थानीय संगठन स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है। “बरगद के नीचे घास नहीं उगती” की कहावत यहां पूरी तरह चरितार्थ होती दिख रही है।
जिले में अब नेतृत्व की सबसे बड़ी योग्यता संघर्ष नहीं बल्कि आज्ञाकारिता बन चुकी है। जो जितना चुप, उतना सुरक्षित। जो जितना मुखर, उतना हाशिये पर। कुछ पूर्व जिलाध्यक्ष जरूर इसके अपवाद रहे, जिन्होंने संगठन को स्वतंत्र पहचान दी, लेकिन मौजूदा दौर में संगठन का चेहरा केवल छाया मात्र बनकर रह गया है।
आदिवासी इलाकों में भाजपा की पकड़ ढीली
भाजपा की जमीनी साख सबसे ज्यादा आदिवासी विकासखंडों में गिरती नजर आ रही है। आरोप है कि जिला पंचायत से जुड़े कई जनप्रतिनिधि मंडल से जुड़े नेतानुमा जनसेवक की बजाय ठेकेदार की भूमिका में उतर आए हैं, जबकि ग्राम पंचायतों के आदिवासी प्रतिनिधि खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं।
योजनाएं कागजों में चमकती हैं, जमीन पर दम तोड़ती हैं।
यही कारण है कि भाजपा का पारंपरिक वोट बैंक रहे आदिवासी अंचल में अब असंतोष खुलकर उभरने लगा है। यदि समय रहते संगठनात्मक सुधार नहीं हुआ, तो यह असंतोष आगामी चुनावों में बड़ा राजनीतिक झटका बन सकता है।
200 से ज्यादा अवैध कॉलोनियां — सत्ता की असफलता का प्रमाण
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और बैतूल विधायक के विधानसभा क्षेत्र में 200 से अधिक अवैध कॉलोनियों का अस्तित्व अपने आप में सत्ता और प्रशासनिक नियंत्रण की पोल खोलता है। इन कॉलोनियों को बनाने वालों ने आज तक वैधता नहीं ली, नतीजतन हजारों परिवार आज भी बिजली, पानी, सड़क और सीवरेज जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं।
सत्ता में रहते हुए भी इन समस्याओं का समाधान न हो पाना भाजपा के सुशासन के दावे पर सीधा सवाल खड़ा करता है। जनता पूछ रही है—अगर सरकार अपने ही विधायक क्षेत्र की अव्यवस्थाएं नहीं सुधार सकती, तो पूरे जिले की तस्वीर कैसी होगी?
जिला अध्यक्ष भी बेबस ?
भाजपा जिला अध्यक्ष सुधाकर पवार को लेकर पार्टी के भीतर यह धारणा गहराती जा रही है कि वे संगठन को न दिशा दे पा रहे हैं, न संघर्ष की अगुवाई कर पा रहे हैं। न प्रशासन पर दबाव बन पा रहा है, न कार्यकर्ताओं में जोश भर पा रहे हैं। परिणामस्वरूप संगठन भीतर ही भीतर बिखरता नजर आ रहा है।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि भाजपा अब कैडर आधारित पार्टी से ज्यादा सत्ता आधारित संरचना बनती जा रही है, जहां जमीन से जुड़े कार्यकर्ता खुद को अनसुना और उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
मजबूत इमारत, खोखला आधार
बैतूल में भाजपा के पास सत्ता है, संसाधन हैं, संगठनात्मक ढांचा है—लेकिन नेतृत्व की कमजोरी, निर्णय प्रक्रिया का केंद्रीकरण और जमीनी समस्याओं से कटाव ने पार्टी के मजबूत होने के दावों को खोखला बना दिया है। बाहर से यह संगठन भले ही मजबूत नजर आए, लेकिन भीतर से दरकती दीवारें साफ दिखाई देने लगी हैं।
अब सवाल यह नहीं है कि भाजपा कितनी मजबूत है, सवाल यह है कि क्या भाजपा अपनी कमजोरियों को स्वीकार कर आत्ममंथन करेगी—या फिर यह मजबूत दिखने वाला किला अंदर से ढहने तक का इंतजार करता रहेगा।

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