नई बोतल में पुरानी शराब! बैतूल भाजपा में नेतृत्व संकट, कार्यकर्ता उबाल पर
विश्व की सबसे बड़ी पार्टी जिले में नए मंडल अध्यक्ष तक नहीं ढूंढ पाई, संगठन सत्ता-सिंडिकेट में तब्दील?
जिन परिवारों ने कुशाभाऊ ठाकरे से आंख में आंख डालकर सवाल किए थे, वे आज निर्णय प्रक्रिया से बाहर कर दिए गए हैं।
बैतूल 30 जनवरी(वामन पोटे)
भारतीय जनता पार्टी खुद को दुनिया की सबसे बड़ी, सबसे अनुशासित और सबसे कैडर आधारित पार्टी बताती है। लेकिन बैतूल जिले में वही पार्टी आज अपने ही दावों की खुली धज्जियां उड़ाती नजर आ रही है। जिस जिले की विधानसभा से भाजपा प्रदेश अध्यक्ष आते हैं, वहां संगठन नए मंडल अध्यक्ष और जिला पदाधिकारी तक पैदा नहीं कर सका। मजबूरी में वही पुराने चेहरे दोबारा थोप दिए गए। यह सिर्फ संगठनात्मक विफलता नहीं — यह राजनीतिक दिवालियापन है।
भाजपा के अपने बायलॉज तीन साल में पद परिवर्तन की बात करते हैं। लेकिन बैतूल में पहले पांच साल और अब फिर वही चेहरे। सवाल सीधा है — क्या बैतूल भाजपा में अब नया नेतृत्व गढ़ने की क्षमता खत्म हो चुकी है? या फिर संगठन जानबूझकर कुछ खास चेहरों की जागीर बनाकर रखा जा रहा है? अगर यह अक्षमता है तो शर्मनाक है, और अगर रणनीति है तो उससे भी ज्यादा खतरनाक।
शहर के दोनों मंडलों में एक बार फिर वही विक्रम वैद्य और विकास मिश्रा बैठा दिए गए। कार्यकर्ता पूछ रहे हैं — क्या पांच वर्षों में भाजपा एक भी नया चेहरा तैयार नहीं कर सकी? क्या संगठन का दरवाजा अब सिर्फ सत्ता-समीकरण वालों के लिए खुलता है, और जमीन पर पसीना बहाने वालों के लिए बंद? यही वजह है कि बूथ स्तर से लेकर मंडल तक कार्यकर्ता खुले तौर पर कह रहे हैं — “यह पार्टी अब संगठन नहीं, सत्ता का गिरोह बन चुकी है।”
सबसे ज्यादा नाराजगी जिला अध्यक्ष सुधाकर पवार को लेकर नहीं, बल्कि इस बात को लेकर है कि जिला अध्यक्ष होते हुए भी संगठन की कमान उनके हाथ में नहीं दिखती। वे सीधे हैं, शालीन हैं, सभ्य हैं — लेकिन राजनीति में केवल सीधापन काफी नहीं होता। संगठन चलाने के लिए रीढ़ चाहिए, और बैतूल भाजपा की रीढ़ फिलहाल मंडल अध्यक्षों और महामंत्रियों के हाथों गिरवी पड़ी नजर आ रही है। आज पार्टी में फैसले नहीं लिए जाते — फरमान जारी किए जाते हैं। सवाल उठता है — क्या जिला अध्यक्ष वास्तव में जिला अध्यक्ष हैं, या सिर्फ नामपट्टिका?
लेकिन असली विस्फोटक मामला जिले के उस आदिवासी विकासखंड से सामने आ रहा है, जो महाराष्ट्र सीमा से लगा है। वहां भाजपा के एक महामंत्री की “नेतागिरी” अब संगठन तक सीमित नहीं रही, बल्कि पंचायत से लेकर जनपद तक सरकारी कामकाज में खुला हस्तक्षेप बन चुकी है। हालात यह हैं कि सरपंच, जनपद सदस्य और आदिवासी जनप्रतिनिधि खुद को असहज महसूस कर रहे हैं। आरोप है कि बिना उनकी सहमति कोई काम आगे नहीं बढ़ने दिया जाता — चाहे वह सड़क निर्माण हो, पेयजल योजना हो या आवास स्वीकृति।
आदिवासी प्रतिनिधि सवाल पूछ रहे हैं — “हम निर्वाचित हैं या किसी महामंत्री के मातहत कर्मचारी?” क्या भाजपा अब लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान छोड़कर संगठन पदाधिकारियों को सुपर-पावर देना चाहती है? क्या ग्राम सभा, जनपद पंचायत और पंचायत समिति अब सिर्फ औपचारिक ढांचा रह गई हैं, जबकि असली सत्ता पार्टी कार्यालय से चल रही है? यह सवाल सिर्फ राजनीति का नहीं — यह लोकतंत्र के अपमान का है।
स्थिति यह है कि आदिवासी अंचल में भाजपा की वैचारिक पकड़ कमजोर नहीं हुई थी, लेकिन संगठनात्मक दादागिरी ने माहौल जहरीला बना दिया है। स्थानीय जनप्रतिनिधि खुलकर कह रहे हैं कि हर सरकारी काम में फोन कॉल, दबाव और “ऊपर से आदेश” की संस्कृति हावी हो चुकी है। यह वही भाजपा है जो कभी पंचायती राज और स्थानीय स्वशासन की दुहाई देती थी। आज वही पार्टी अपने ही निर्वाचित प्रतिनिधियों को हाशिये पर धकेल रही है।
जिले भर में कार्यकर्ताओं का गुस्सा अब सोशल मीडिया से लेकर चाय की दुकानों तक उबाल पर है। बूथ कार्यकर्ता पूछ रहे हैं — जब सालों मेहनत के बाद भी मौका उन्हीं चेहरों को मिलता है जो पहले से सत्ता के गलियारों में स्थापित हैं, तो जमीन पर काम करने वालों का मनोबल कैसे बचेगा? यही नहीं, कई पुराने कार्यकर्ता तो यहां तक कह रहे हैं कि भाजपा अपने ही वोट बैंक को नाराज करने की सुनियोजित रणनीति पर चल पड़ी है।
घोड़ाडोंगरी विधानसभा, जो कभी भाजपा की वैचारिक प्रयोगशाला मानी जाती थी, आज संगठनात्मक निर्वासन शिविर में बदल चुकी है। जिन परिवारों ने स्वः कुशाभाऊ ठाकरे से आंख में आंख डालकर सवाल किए थे, वे आज निर्णय प्रक्रिया से बाहर कर दिए गए हैं। भाजपा ने जिन लोगों के कंधों पर खड़े होकर सत्ता हासिल की, आज उन्हीं कंधों को कुर्सी से नीचे धकेल दिया गया है। सवाल उठता है — क्या भाजपा को अब वैचारिक कार्यकर्ता नहीं, सिर्फ आज्ञाकारी चेहरा चाहिए?
आमला, सारणी और पाथाखेड़ा क्षेत्रों में भी कहानी अलग नहीं है। वहां संगठन विचारधारा से नहीं, समीकरणों से चल रहा है। मंडल से जिला तक गुटों का साम्राज्य खड़ा हो चुका है। कार्यकर्ता नहीं पूछे जाते, गुटों की गणित पूछी जाती है। भाजपा, जो कभी कार्यकर्ताओं की पार्टी कहलाती थी, अब गुटों की कंपनी बनती जा रही है — जहां सम्मान भी लॉयल्टी कार्ड से नहीं, सत्ता कार्ड से मिलता है।
इस संगठनात्मक सड़ांध का असर अब जनप्रतिनिधियों पर भी साफ दिख रहा है। कार्यकर्ता अपने ही विधायकों से नाराज हैं। उनका आरोप है कि चुनाव के समय जिनके पैरों में धूल लगी थी, सत्ता मिलने के बाद वही चेहरे पहचान से बाहर कर दिए जाते हैं। योजनाएं आती हैं, घोषणाएं होती हैं, लेकिन जमीन पर संगठन गायब रहता है — क्योंकि संगठन अब जनता से नहीं, सत्ता से संवाद करता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है — क्या भाजपा सच में युवा नेतृत्व चाहती है, या यह सिर्फ भाषणों की सजावट है? जब मोदी-शाह की जोड़ी राष्ट्रीय स्तर पर नया नेतृत्व आगे बढ़ाने की बात करती है, तब बैतूल में 70 प्रतिशत पुराने पदाधिकारियों को दोबारा नवाजना किस विचारधारा का प्रतीक है? क्या यह संदेश नहीं जाता कि पार्टी अब जोखिम नहीं लेना चाहती, बल्कि जमी-जमाई कुर्सियों से ही चिपकी रहना चाहती है?
आज बैतूल भाजपा में जिला अध्यक्ष सीधा है, लेकिन मंडल अध्यक्ष और महामंत्री तीरंदाज बन चुके हैं। संगठन अब विचारधारा नहीं, निशानेबाजी से चल रहा है। आदिवासी विकासखंड से उठ रही नाराजगी सिर्फ स्थानीय असंतोष नहीं — यह उस विस्फोट का संकेत है, जहां संगठन पदाधिकारी खुद को निर्वाचित प्रतिनिधियों से ऊपर समझने लगते हैं। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक और पार्टी के लिए आत्मघाती स्थिति है।
सवाल सीधा है — क्या भाजपा बैतूल में संगठन चला रही है या सत्ता का सिंडिकेट? क्या जिला अध्यक्ष वास्तव में संगठन प्रमुख हैं या सिर्फ एक औपचारिक चेहरा? क्या आदिवासी अंचलों में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का सम्मान बचेगा या वे पार्टी पदाधिकारियों के मातहत बनकर रह जाएंगे? और सबसे बड़ा सवाल — क्या भाजपा अपने सबसे मजबूत हथियार, अपने कार्यकर्ता, को खुद ही कुंद कर रही है?
क्योंकि इतिहास गवाह है — जब संगठन अंदर से सड़ता है, तो बाहर से मजबूत दिखने वाली दीवारें भी अचानक ढह जाती हैं। बैतूल आज उसी मोड़ पर खड़ा है। अब भी वक्त है कि भाजपा सिर्फ चेहरे नहीं, सोच बदले। वरना यह संकट संगठनात्मक नहीं रहेगा — यह राजनीतिक विस्फोट बनेगा। और तब पार्टी यह नहीं कह पाएगी कि चेतावनी नहीं मिली थी।
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