157 करोड़ की स्वीकृति भी बेअसर: बैतूल रिंग रोड फाइलों में दफन, ट्रैफिक से शहर कराह रहा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष तक चुप, तीन साल बाद भी जमीन पर नहीं उतरा प्रोजेक्ट
By,वामन पोटे
157 करोड़ की स्वीकृति भी बेअसर: बैतूल रिंग रोड फाइलों में दफन, ट्रैफिक से शहर कराह रहा
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष तक चुप, तीन साल बाद भी जमीन पर नहीं उतरा प्रोजेक्ट
बैतूल 9 फरवरी ।।
जिस रिंग रोड को बैतूल की ट्रैफिक समस्या का स्थायी इलाज बताया गया था, वही परियोजना आज सरकारी फाइलों में दम तोड़ती नजर आ रही है। तीन साल पहले न केवल इस रिंग रोड को मंजूरी मिली थी, बल्कि बजट में पूरे 157 करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया गया था। बावजूद इसके, न टेंडर निकले, न भूमि अधिग्रहण हुआ और न ही निर्माण की शुरुआत। नतीजा यह कि शहर आज भी भारी वाहनों की चपेट में है और जनता रोज हादसों के डर में सड़क पार करने को मजबूर है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस समय यह परियोजना मंजूर हुई थी, तब श्रेय लेने की होड़ मची हुई थी, लेकिन अब वही जनप्रतिनिधि इस मुद्दे पर मौन साधे बैठे हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और बैतूल विधायक की चुप्पी पर भी सवाल उठने लगे हैं। शहर पूछ रहा है—जब 157 करोड़ की मंजूरी के बाद भी सड़क नहीं बनी, तो फिर विकास के दावे किस काम के?
शहर के बीच से गुजरता हाईवे, हादसों की खुली छूट
आज बैतूल की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है शहर के बीच से गुजरता भारी ट्रैफिक। नागपुर–भोपाल नेशनल हाईवे और परासिया स्टेट हाईवे को जोड़ने के लिए फिलहाल कोई बायपास नहीं है। नतीजा यह कि ट्रक, डंपर और बसें सीधे रिहायशी इलाकों से होकर गुजरती हैं। स्कूल जाने वाले बच्चे हों या बाजार जाने वाले बुजुर्ग—हर कोई खतरे के साए में है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि आए दिन होने वाले सड़क हादसों में कई निर्दोष जानें जा चुकी हैं, लेकिन प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की संवेदनशीलता अब तक नहीं जागी। जिस रिंग रोड को इन हादसों पर ब्रेक लगाने के लिए मंजूर किया गया था, वही आज खुद सिस्टम की लापरवाही की भेंट चढ़ गया है।
21 किलोमीटर का सपना, कागजों में सिमटा सच
स्वीकृत योजना के अनुसार रिंग रोड सोनाघाटी से मिलानपुर तक बनना था। यह नागपुर–भोपाल हाईवे से शुरू होकर बैतूल–परासिया स्टेट हाईवे को जोड़ते हुए फिर हाईवे में मिल जाता। कुल लंबाई करीब 21 किलोमीटर तय की गई थी। इसके बनने से न केवल शहर का गैरजरूरी ट्रैफिक बाहर निकल जाता, बल्कि आमला रोड, परासिया रोड और आसपास के ग्रामीण इलाकों को भी सीधा फायदा मिलता।
लेकिन आज हकीकत यह है कि न इस रूट पर कोई सर्वे दिखता है, न निर्माण की तैयारी और न ही विभागीय स्तर पर कोई हलचल। जो परियोजना बैतूल के विकास की रीढ़ बनने वाली थी, वह आज फाइलों की कब्रगाह में दफन पड़ी है।
157 करोड़ का बजट… फिर भी जमीन पर शून्य
तीन साल पहले राज्य बजट में इस रिंग रोड के लिए पूरे 157 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए थे। आमतौर पर इतनी बड़ी राशि मंजूर होने के बाद परियोजना तेजी से आगे बढ़ती है, लेकिन बैतूल में उल्टा हुआ। न काम शुरू हुआ और न ही जनता को यह बताया गया कि देरी क्यों हो रही है।
सूत्रों का कहना है कि अब वह राशि भी संभवतः लैप्स हो चुकी होगी, यानी बैतूल के हिस्से की विकास निधि चुपचाप कहीं और खर्च हो गई। सवाल यह है कि जब पैसा था, मंजूरी थी और जरूरत भी थी—तो फिर काम क्यों नहीं हुआ?
श्रेय की राजनीति, जिम्मेदारी से पलायन
जब यह परियोजना मंजूर हुई थी, तब कई जनप्रतिनिधि इसके श्रेय का दावा करने में आगे-आगे थे। पोस्टर छपे, बधाइयां बांटी गईं और विकास की बड़ी-बड़ी बातें की गईं। लेकिन आज वही नेता इस मुद्दे पर खामोश हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि जिन नेताओं ने कभी इस सड़क के लिए धरना नहीं दिया, ज्ञापन नहीं सौंपा, वे भी खुद को इसका श्रेय लेने से नहीं चूके। लेकिन अब जब जनता जवाब मांग रही है, तो वही चेहरे नदारद हैं। न कोई प्रेस बयान, न कोई आंदोलन और न ही सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष भी मौन, शहर में बढ़ता आक्रोश
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब भाजपा प्रदेश अध्यक्ष खुद बैतूल से विधायक हैं, तब भी यह परियोजना अधर में क्यों है? लोग पूछ रहे हैं कि अगर जिले का प्रतिनिधि ही सरकार से अपने शहर के लिए मंजूर काम नहीं करा पा रहा, तो फिर आम नागरिक किससे उम्मीद करे?
शहर में अब यह चर्चा आम है कि बैतूल को विकास के मामले में लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। प्रदेश के दूसरे जिलों में एक के बाद एक सड़क, पुल और फ्लाईओवर की सौगातें मिल रही हैं, जबकि बैतूल में पहले से स्वीकृत परियोजनाएं भी धरातल पर नहीं उतर पा रहीं।
शहर ही नहीं, गांव भी भुगत रहे कीमत
यह रिंग रोड सिर्फ शहर के लिए नहीं, बल्कि आसपास के गांवों के लिए भी जीवनरेखा साबित होती। किसान अपनी उपज सीधे मंडियों तक पहुंचा पाते, एंबुलेंस और आपात सेवाएं तेज होतीं और ग्रामीण इलाकों का सीधा संपर्क हाईवे से बनता। लेकिन परियोजना के ठंडे बस्ते में जाने से यह पूरा क्षेत्र विकास की दौड़ में पीछे छूट गया है।
ग्रामीणों का कहना है कि सरकारें बदलती रहीं, नेता आते-जाते रहे, लेकिन बैतूल की किस्मत नहीं बदली। आज भी वही जाम, वही हादसे और वही टूटी सड़कें लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बनी हुई हैं।
जनता का सवाल: क्या रिंग रोड सिर्फ चुनावी जुमला था?
अब शहरवासी खुलकर पूछ रहे हैं—क्या बैतूल रिंग रोड सिर्फ चुनावी वादा था? क्या 157 करोड़ की मंजूरी सिर्फ कागजी खानापूर्ति थी? और क्या जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी सिर्फ उद्घाटन और श्रेय लेने तक ही सीमित है?
स्थानीय सामाजिक संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द ही इस परियोजना को दोबारा शुरू नहीं किया गया, तो जनता आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होगी। उनका कहना है कि बैतूल अब और इंतजार नहीं कर सकता, क्योंकि हर दिन की देरी किसी न किसी की जान पर भारी पड़ सकती है।
अब भी मौका है, लेकिन इच्छाशक्ति चाहिए
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार और जनप्रतिनिधि गंभीर हों, तो इस परियोजना को दोबारा जीवित किया जा सकता है। नई स्वीकृति, नए टेंडर और तेज़ कार्यवाही के जरिए बैतूल को वह रिंग रोड मिल सकती है, जिसकी उसे वर्षों से जरूरत है।
लेकिन सवाल यही है—क्या सत्ता में बैठे लोग जनता की परेशानी सुनेंगे, या फिर यह परियोजना यूं ही फाइलों में सड़ती रहेगी?
फिलहाल बैतूल की सड़कों पर जाम है, लोगों की आंखों में सवाल हैं और नेताओं की जुबान पर चुप्पी। 157 करोड़ की स्वीकृति के बावजूद अगर सड़क नहीं बनी, तो यह सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि जनता के भरोसे के साथ खुला धोखा
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