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2 करोड़ की पार्किंग, सिर्फ 90 बाइक: गांधी चौक पर नपा का ‘महंगा प्रयोग’, इतिहास और रोज़गार पर संकट

By,वामन पोटे

2 करोड़ की पार्किंग, सिर्फ 90 बाइक: गांधी चौक पर नपा का ‘महंगा प्रयोग’, इतिहास और रोज़गार पर संकट

बैतूल, 19 फरवरी। शहर के ऐतिहासिक गांधी चौक पर नगर पालिका द्वारा बनाई जा रही अंडरग्राउंड पार्किंग अब शहर में बड़े विवाद का कारण बन गई है। करीब दो करोड़ रुपए की लागत से सिर्फ 80 से 90 दोपहिया वाहनों की क्षमता वाली पार्किंग बनाने के फैसले पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। शहरवासियों और व्यापारियों का कहना है कि यह योजना न केवल आर्थिक रूप से अव्यवहारिक है, बल्कि इससे शहर की ऐतिहासिक पहचान और छोटे दुकानदारों के रोजगार पर भी खतरा मंडरा रहा है।
प्रति बाइक 2.22 लाख खर्च, चौपहिया के लिए जगह नहीं
नगर पालिका द्वारा गांधी चौक में लगभग 4200 वर्गफीट क्षेत्र में अंडरग्राउंड पार्किंग बनाई जा रही है। इसमें अधिकतम 90 बाइक ही पार्क हो सकेंगी। इस हिसाब से प्रति बाइक पार्किंग पर करीब 2 लाख 22 हजार रुपए खर्च किए जा रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इस पार्किंग में एक भी चौपहिया वाहन के लिए जगह नहीं रखी गई है, जबकि कोठीबाजार क्षेत्र में सबसे अधिक समस्या कार पार्किंग की ही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी राशि खर्च करने के बावजूद शहर की वास्तविक पार्किंग समस्या का समाधान नहीं हो पाएगा। ऐसे में नगर पालिका की योजना को लेकर पारदर्शिता और प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
बीच बाजार में पार्किंग, पहुंचना ही होगा मुश्किल
सामान्यतः पार्किंग स्थल बाजार के बाहर बनाए जाते हैं ताकि यातायात का दबाव कम हो और लोग आसानी से वाहन पार्क कर खरीदारी कर सकें। लेकिन बैतूल नगर पालिका ने पार्किंग के लिए शहर के सबसे व्यस्त और भीड़भाड़ वाले स्थान गांधी चौक का चयन किया है।
गांधी चौक के एक ओर थाना रोड पर साप्ताहिक बाजार लगता है, जबकि दूसरी ओर मुख्य सीमेंट रोड है, जहां हमेशा भारी भीड़ रहती है। त्योहारों और बाजार के दिनों में यहां पैदल चलना भी मुश्किल होता है। ऐसे में पार्किंग तक वाहन पहुंचाना ही बड़ी चुनौती बन सकता है। गुरुवार और रविवार को लगने वाले साप्ताहिक बाजार के दौरान तो यह व्यवस्था पूरी तरह विफल हो सकती है।
40 साल पुराने दुकानदारों पर बेदखली की मार
इस परियोजना के कारण गांधी चौक पर पिछले 30 से 40 वर्षों से दुकानें लगाकर परिवार चलाने वाले छोटे दुकानदारों को हटाया जा रहा है। इनमें चूना, अनाज, सब्जी, फल, पूजन सामग्री और अन्य दैनिक उपयोग की वस्तुएं बेचने वाले व्यापारी शामिल हैं।
दुकानदारों का कहना है कि नगर पालिका ने उन्हें पार्किंग की छत पर शेड बनाकर दुकान देने का मौखिक आश्वासन दिया है, लेकिन कोई लिखित गारंटी नहीं दी गई है। ऐसे में उन्हें डर है कि निर्माण के बाद उन्हें स्थायी रूप से विस्थापित कर दिया जाएगा। कई दुकानदारों की दो से तीन पीढ़ियां इसी स्थान पर व्यापार कर परिवार का भरण-पोषण कर रही हैं।
ऐतिहासिक महत्व पर भी उठे सवाल
गांधी चौक शहर का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा है। वर्ष 1930 में यहां महात्मा गांधी की आमसभा हुई थी। वहीं 1947 में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने यहां अशोक स्तंभ स्थापित कर ध्वजारोहण किया था। आज भी यहां स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के समारोह आयोजित होते हैं।
पार्किंग निर्माण के दौरान अशोक स्तंभ को हटाने की कोशिश पर शहर में भारी विरोध हुआ। कांग्रेस कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों ने प्रदर्शन और चक्काजाम किया, जिसके बाद नगर पालिका को काम रोकना पड़ा और अशोक स्तंभ को पुनः स्थापित करना पड़ा।
वैकल्पिक स्थानों की अनदेखी
शहरवासियों का कहना है कि यदि पार्किंग बनानी ही थी तो जिला जेल के प्रस्तावित स्थानांतरण के बाद उपलब्ध होने वाली जमीन पर बनाई जा सकती थी। वहां दोपहिया और चौपहिया दोनों वाहनों के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध हो सकता था। इसके अलावा लल्ली चौक से गणेश मंदिर चौक तक अतिक्रमण हटाकर भी बेहतर पार्किंग विकसित की जा सकती थी।
नगर पालिका का पक्ष
नगर पालिका के सब इंजीनियर नागेंद्र वागद्रे ने बताया कि परिषद की स्वीकृति के बाद गांधी चौक में अंडरग्राउंड पार्किंग का टेंडर जारी किया गया है। सिंगरौली की राजेंद्र सिंह कंस्ट्रक्शन कंपनी को निर्माण कार्य सौंपा गया है। पार्किंग की छत पर अस्थायी दुकानदारों के लिए शेड बनाए जाएंगे और गांधी जी की प्रतिमा तथा अशोक स्तंभ को यथावत रखा जाएगा।
जनता के बीच बढ़ता असंतोष
शहरवासियों का कहना है कि दो करोड़ रुपए खर्च करने के बावजूद पार्किंग की क्षमता बेहद सीमित है और इससे यातायात समस्या का समाधान नहीं होगा। लोगों का मानना है कि नगर पालिका को पहले चौपहिया वाहनों की पार्किंग की व्यवस्था करनी चाहिए थी, क्योंकि सबसे अधिक समस्या कार पार्किंग की ही है।
नगर पालिका की इस योजना ने अब शहर में विकास बनाम जनभावना की बहस छेड़ दी है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह परियोजना वास्तव में जनता की सुविधा के लिए है या फिर यह संसाधनों के दुरुपयोग का एक और उदाहरण बनकर रह

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