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आमला सिविल अस्पताल में 43 भर्तियों पर घोटाले की बू: क्या नौकरी बन गई ‘नीलामी’, किसके संरक्षण में चल रहा खेल ?

By, वामन पोटे

आमला सिविल अस्पताल में 43 भर्तियों पर घोटाले की बू: क्या नौकरी बन गई ‘नीलामी’, किसके संरक्षण में चल रहा खेल ?
बैतूल/आमला 19 फरवरी // आमला के सिविल अस्पताल में हाल ही में की गई 43 आउटसोर्सिंग भर्तियों ने पूरे जिले में सवालों का तूफान खड़ा कर दिया है। भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की जगह कथित तौर पर पैसों का खेल, नियमों की अनदेखी और ठेका कंपनी को फायदा पहुंचाने के गंभीर आरोप सामने आए हैं। इस मामले ने न केवल स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी संकेत दिया है कि कहीं सरकारी अस्पतालों में रोजगार भी अब बोली लगाकर तो नहीं दिए जा रहे?
किसान संघर्ष समिति आमला के ब्लॉक अध्यक्ष दिनेश यदुवंशी ने इस पूरे मामले को लेकर अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) को लिखित शिकायत सौंपकर भर्ती प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने, ठेका कंपनी की जांच कराने और पिछले पांच वर्षों में रोगी कल्याण समिति के खर्च का उच्च स्तरीय ऑडिट कराने की मांग की है।
भर्ती प्रक्रिया पर गंभीर आरोप: क्या योग्य उम्मीदवारों को जानबूझकर किया गया बाहर?
शिकायत में कहा गया है कि सिविल अस्पताल में 43 पदों पर आउटसोर्सिंग के माध्यम से की गई भर्ती में योग्यता और अनुभव जैसे मूलभूत मानकों की अनदेखी की गई। आरोप है कि चयन प्रक्रिया में अपात्र और संदिग्ध उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी गई, जबकि योग्य और स्थानीय बेरोजगार युवाओं को दरकिनार कर दिया गया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी थी, तो चयन सूची सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? क्या मेरिट लिस्ट तैयार हुई थी? क्या इंटरव्यू या दस्तावेज सत्यापन की कोई वैध प्रक्रिया अपनाई गई? इन सवालों के जवाब फिलहाल जिम्मेदार अधिकारियों के पास नहीं हैं।
स्थानीय सूत्रों का दावा है कि भर्ती प्रक्रिया के दौरान आर्थिक लेन-देन हुआ और नौकरी के बदले मोटी रकम वसूली गई। यदि यह सच है, तो यह केवल अनियमितता नहीं बल्कि बेरोजगार युवाओं के अधिकारों के साथ खुला धोखा है।
ठेका कंपनी का चयन भी सवालों के घेरे में: क्या टेंडर प्रक्रिया सिर्फ औपचारिकता थी?
भर्ती के साथ-साथ आउटसोर्सिंग का ठेका जिस कंपनी को दिया गया, उसकी चयन प्रक्रिया भी विवादों में है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि निविदा प्रक्रिया का सही तरीके से पालन नहीं किया गया और पारदर्शिता का पूरी तरह अभाव रहा।
सवाल यह उठता है कि क्या टेंडर की सूचना व्यापक रूप से प्रकाशित की गई थी? कितनी कंपनियों ने आवेदन किया और किस आधार पर इस कंपनी को चुना गया? क्या टेंडर प्रक्रिया पहले से तय थी और सिर्फ कागजी औपचारिकता निभाई गई?
यदि टेंडर प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो यह सरकारी धन और व्यवस्था दोनों के साथ गंभीर खिलवाड़ है।
रोगी कल्याण समिति के खर्च पर भी उठे सवाल: पांच साल में कितना खर्च, कहां गया पैसा?
मामला केवल भर्ती तक सीमित नहीं है। शिकायत में सिविल अस्पताल की रोगी कल्याण समिति द्वारा पिछले पांच वर्षों में किए गए खर्च पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि खरीदी गई सामग्री की गुणवत्ता और बाजार मूल्य में भारी अंतर है, जिससे वित्तीय अनियमितता और संभावित गबन की आशंका जताई गई है।
क्या खरीदी गई सामग्री वास्तव में अस्पताल में मौजूद है? क्या उनका भौतिक सत्यापन हुआ? क्या भुगतान से पहले गुणवत्ता की जांच की गई? यदि नहीं, तो यह सरकारी धन की खुली लूट का मामला हो सकता है।
स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर सवाल: क्या जिम्मेदार अधिकारी मौन क्यों हैं?
पूरे मामले में सबसे ज्यादा सवाल स्वास्थ्य विभाग और जिले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी की भूमिका को लेकर उठ रहे हैं। आखिर इतनी बड़ी संख्या में भर्तियां और करोड़ों रुपये के खर्च बिना उच्च अधिकारियों की जानकारी के कैसे हो सकते हैं?
बैतूल जिले में यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि विभाग के कुछ अधिकारी राजनीतिक संरक्षण में काम कर रहे हैं। स्थानीय स्तर पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि मुख्य चिकित्सा अधिकारी कथित तौर पर हेमंत खंडेलवाल के करीबी हैं, जिससे जांच प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यह सवाल जरूर उठता है कि यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है, तो अधिकारी खुलकर सामने क्यों नहीं आ रहे?
जनता का सवाल: क्या अस्पताल बना रोजगार और खरीद घोटाले का अड्डा?
सिविल अस्पताल जैसे संवेदनशील संस्थान में इस तरह के आरोप बेहद गंभीर हैं। यह वही अस्पताल है जहां आम नागरिक अपनी जान बचाने की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। लेकिन यदि अस्पताल प्रशासन ही भ्रष्टाचार के आरोपों में घिर जाए, तो आम जनता का भरोसा किस पर रहेगा?
क्या स्वास्थ्य विभाग इस मामले में निष्पक्ष जांच करेगा? क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी या मामला दबा दिया जाएगा? क्या बेरोजगार युवाओं को न्याय मिलेगा?
जांच और कार्रवाई की मांग: अब निगाहें प्रशासन पर
शिकायतकर्ता ने मांग की है कि
43 पदों की भर्ती प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाई जाए,
ठेका कंपनी के चयन और टेंडर दस्तावेजों की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए,
रोगी कल्याण समिति के पांच वर्षों के खर्च का ऑडिट और भौतिक सत्यापन किया जाए,
दोषी अधिकारियों और एजेंसी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन इस मामले में निष्पक्ष और पारदर्शी जांच करेगा या फिर यह मामला भी अन्य घोटालों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।
आमला के इस सिविल अस्पताल में उठे सवाल केवल 43 नौकरियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र की विश्वसनीयता और पारदर्शिता की परीक्षा है। यदि समय रहते सच्चाई सामने नहीं आई, तो यह मामला जिले के सबसे बड़े भर्ती और वित्तीय घोटालों में से एक साबित हो सकता

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