आदिवासी जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में प्रसूता से दुर्व्यवहार का आरोप, नवजात की मौत; स्वास्थ्य व्यवस्था और जवाबदेही पर बड़े सवाल
By,वामन पोटे
आदिवासी जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में प्रसूता से दुर्व्यवहार का आरोप, नवजात की मौत; स्वास्थ्य व्यवस्था और जवाबदेही पर बड़े सवाल

अस्पताल भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और विधायक हेमंत खंडेलवाल के विधानसभा क्षेत्र

बैतूल 24 फरवरी।।
आदिवासी बहुल बैतूल जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में प्रसव के दौरान कथित लापरवाही और अमानवीय व्यवहार का गंभीर मामला सामने आया है। जिला अस्पताल के प्रसूता वार्ड में एक महिला के नवजात की मौत हो गई। परिजनों का आरोप है कि ड्यूटी पर मौजूद नर्स और स्टाफ ने प्रसव के दौरान महिला के पेट पर जोर से दबाव डाला, समय पर इलाज नहीं दिया और अपमानजनक टिप्पणी की। इस घटना के बाद प्रसूता सदमे में है और उसकी मानसिक स्थिति बिगड़ने की बात सामने आई है। मामले ने जिला अस्पताल की व्यवस्थाओं, जवाबदेही और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह जिला अस्पताल आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्र के लाखों लोगों के लिए एकमात्र भरोसेमंद सरकारी स्वास्थ्य केंद्र माना जाता है। खास बात यह है कि यह अस्पताल भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और विधायक हेमंत खंडेलवाल के विधानसभा क्षेत्र में आता है। इसके बावजूद यहां की व्यवस्थाओं की यह स्थिति स्वास्थ्य तंत्र की गंभीर खामियों को उजागर करती है।
प्रसव पीड़ा से तड़पती रही महिला, स्टाफ पर सोने का आरोप
जानकारी के अनुसार, शाकादेही निवासी योगेश यादव ने अपनी पत्नी को 20 फरवरी को प्रसव पीड़ा होने पर बैतूल जिला अस्पताल में भर्ती कराया था। परिजनों के मुताबिक महिला को भर्ती करने के बाद उसकी हालत लगातार बिगड़ रही थी और उसे तेज प्रसव पीड़ा हो रही थी। आरोप है कि रात करीब ढाई बजे जब महिला दर्द से तड़प रही थी, तब ड्यूटी पर मौजूद नर्स और स्टाफ सो रहे थे।
परिजनों ने बताया कि जब उन्होंने स्टाफ को उठाकर प्रसूता की स्थिति बताई, तो उन्होंने संवेदनशीलता दिखाने के बजाय नाराजगी जताई और प्रसूता से बदसलूकी की। परिजनों का आरोप है कि स्टाफ ने महिला के पेट पर जोर से दबाव डाला और यहां तक कह दिया कि “तुमने कोई पाप किया होगा, इसलिए बच्चा नहीं हो रहा है।” इस कथित अमानवीय व्यवहार के बाद कुछ ही समय में नवजात की मौत हो गई।
नवजात की मौत के बाद सदमे में मां, परिवार में आक्रोश
नवजात की मौत के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। नवजात की मां इस घटना के बाद से गहरे मानसिक आघात में है और उसकी हालत लगातार खराब बताई जा रही है। परिजनों का कहना है कि यह मौत अस्पताल की लापरवाही और असंवेदनशील रवैये का परिणाम है।
नवजात के पिता योगेश यादव ने कहा कि उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चे की जान बचाने की उम्मीद से सरकारी अस्पताल का सहारा लिया था, लेकिन वहां उन्हें लापरवाही और अपमान का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि यदि समय पर सही इलाज और देखभाल मिलती, तो उनके बच्चे की जान बच सकती थी।
परिजनों ने बताया कि वे प्रसूता को निजी अस्पताल में ले जाना चाहते थे, लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने उन्हें आश्वस्त किया और फिलहाल महिला का इलाज जिला अस्पताल में ही जारी है।
आदिवासी जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल
यह घटना सिर्फ एक अस्पताल या एक परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को सामने लाती है। बैतूल एक आदिवासी बहुल जिला है, जहां बड़ी संख्या में लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं और सरकारी अस्पतालों पर ही निर्भर रहते हैं।
ऐसे में जिला अस्पताल में इस तरह की घटनाएं कई गंभीर सवाल खड़े करती हैं—
क्या जिला अस्पताल में रात के समय पर्याप्त डॉक्टर और प्रशिक्षित स्टाफ मौजूद रहते हैं?
क्या प्रसूता वार्ड में निगरानी और जवाबदेही की कोई प्रभावी व्यवस्था है?
क्या ड्यूटी के दौरान स्टाफ की उपस्थिति और कार्यप्रणाली की नियमित निगरानी होती है?
क्या गरीब और आदिवासी मरीजों को सम्मानजनक और संवेदनशील इलाज मिल रहा है?
क्या जिम्मेदार कर्मचारियों पर वास्तव में सख्त कार्रवाई होगी या मामला औपचारिक जांच तक ही सीमित रह जाएगा?
शिकायत के बाद जांच शुरू, स्टाफ को नोटिस
मामले को लेकर पीड़ित परिवार ने कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। शिकायत के बाद जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी अक्षत जैन ने सिविल सर्जन को तत्काल जांच के निर्देश दिए हैं।
जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. जगदीश घोरे ने बताया कि मामले को गंभीरता से लेते हुए ड्यूटी पर मौजूद नर्स और क्लास-IV स्टाफ को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। साथ ही तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की गई है, जिसमें सर्जन डॉ. रंजीत राठौर, शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. आशीष ठाकुर और डॉ. ईशा डेनियल शामिल हैं। समिति को पूरे मामले की जांच कर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं।
हालांकि सिविल सर्जन ने यह भी कहा कि सामान्य प्रसव के दौरान पेट पर नियंत्रित दबाव देना एक चिकित्सीय प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन परिजनों का कहना है कि जिस तरीके से दबाव डाला गया और जिस तरह का व्यवहार किया गया, वह अस्वीकार्य और अमानवीय था।
जिम्मेदारी तय होगी या मामला दब जाएगा?
यह घटना जिला अस्पताल की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। आदिवासी और गरीब वर्ग के लिए जीवनरेखा माने जाने वाले अस्पताल में यदि प्रसूताएं सुरक्षित नहीं हैं, तो यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र के लिए गंभीर चेतावनी है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जांच के बाद दोषियों पर वास्तव में सख्त कार्रवाई होगी या यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा। जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई ही तय करेगी कि पीड़ित परिवार को न्याय मिलेगा या नहीं।
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