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लापरवाही और सिस्टम की विफलता ने ली आठ जिंदगियां,

By वामन पोटे

इंदौर अग्निकांड: देरी, लापरवाही और सिस्टम की विफलता ने ली आठ जिंदगियां

 

वक्त सब कुछ छीन सकता है…मगर हुनर और मेहनत से मिली पहचान कभी नहीं छीन सकता

इंदौर 20 मार्च ।। मध्यप्रदेश के इंदौर में 17 और 18 मार्च की दरमियानी रात हुए भीषण अग्निकांड ने न केवल आठ लोगों की जान ले ली, बल्कि शहर की आपदा प्रबंधन व्यवस्था और फायर सेफ्टी सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना से जुड़ा एक वीडियो सामने आया है, जिसने पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया है।
वायरल वीडियो में एक स्थानीय निवासी फायर ब्रिगेड कर्मचारी को फोन पर घटना की भयावहता बताने की कोशिश करता सुनाई देता है। वह कहता है, “हैलो… आपको ये फूटने की आवाज आ रही है? धमाके सुनिए…” लेकिन उसकी बात पूरी होने से पहले ही फोन काट दिया जाता है। इसके बाद वह हताशा में चिल्लाता है कि कर्मचारी ने 15 मिनट में पहुंचने की बात कहकर फोन रख दिया।
यह घटना स्वर्ण बाग कॉलोनी में रहने वाले कारोबारी मनोज पुगलिया के तीन मंजिला मकान में हुई, जहां आग ने कुछ ही देर में विकराल रूप ले लिया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, घर के भीतर से लगातार धमाकों की आवाजें आ रही थीं और आग तेजी से पूरी इमारत में फैल रही थी। आसपास मौजूद लोग मदद करना चाहते थे, लेकिन बिजली के तारों और ट्रांसफॉर्मर के कारण करंट लगने का खतरा होने से कोई आगे नहीं बढ़ सका।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि फायर ब्रिगेड को सूचना समय पर दे दी गई थी, लेकिन दमकल दल करीब डेढ़ घंटे बाद मौके पर पहुंचा। तब तक आग सब कुछ तबाह कर चुकी थी। यदि समय पर मदद पहुंचती, तो कई जानें बचाई जा सकती थीं।
घटना के बाद जब मुख्यमंत्री मोहन यादव पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे, तो मृतक मनोज पुगलिया के बेटे सौरभ ने प्रशासनिक लापरवाही की पूरी कहानी उनके सामने रखी। सौरभ ने बताया कि आग ईवी कार चार्जिंग से नहीं, बल्कि पास के बिजली के खंभे में हुए शॉर्ट सर्किट से लगी थी, जिससे पहले एक वाहन और फिर पूरा मकान आग की चपेट में आ गया।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जब फायर ब्रिगेड मौके पर पहुंची, तो उनके टैंकरों में पानी तक नहीं था। एक वाहन रास्ता भटक गया और मौके तक नहीं पहुंच सका। इतना ही नहीं, बचाव कार्य के दौरान एक फायरकर्मी ने कथित तौर पर उनसे कहा कि “ज्यादा पता है तो खुद ही आग बुझा लो।”
इस हादसे ने आपदा प्रबंधन की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या बड़े शहरों में तंग गलियों के लिए विशेष रणनीति नहीं है? क्या फायर ब्रिगेड के पास पर्याप्त संसाधन और प्रशिक्षण नहीं है? और सबसे बड़ा सवाल—क्या इस तरह की लापरवाही को केवल ‘दुर्घटना’ कहकर टाला जा सकता है?
घटना के बाद प्रशासन ने जांच के लिए एक कमेटी गठित की है, जो आग लगने के कारणों और जिम्मेदारियों की जांच करेगी। साथ ही भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के उपाय भी सुझाएगी।
इस बीच, एक और भावनात्मक पहलू सामने आया है। मृतक मनोज पुगलिया ने हादसे से कुछ घंटे पहले अपने सोशल मीडिया स्टेटस में लिखा था—“वक्त सब कुछ छीन सकता है… मगर हुनर और मेहनत से मिली पहचान कभी नहीं छीन सकता।” अब यह पंक्तियां उनकी आखिरी याद बनकर रह गई हैं।
इंदौर का यह अग्निकांड केवल एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की उन खामियों का आईना है, जिन्हें समय रहते सुधारना बेहद जरूरी है।

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