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लिव-इन संबंधों में सहमति के बाद रेप का आरोप टिकाऊ नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने व्यापारी को दी राहत

By,वामन पोटे

लिव-इन संबंधों में सहमति के बाद रेप का आरोप टिकाऊ नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने व्यापारी को दी राहत
जबलपुर, 20 मार्च ।।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप और सहमति से बने शारीरिक संबंधों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कटनी के एक कपड़ा व्यापारी के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म सहित अन्य धाराओं की एफआईआर को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि जब दो वयस्क अपनी मर्जी से साथ रहते हैं और आपसी सहमति से संबंध बनाते हैं, तो बाद में विवाद होने पर लगाए गए दुष्कर्म के आरोप स्वतः स्वीकार्य नहीं होते।
यह फैसला 17 मार्च को न्यायमूर्ति बी.पी. शर्मा की एकलपीठ ने सुनाया। मामला कटनी निवासी कपड़ा व्यवसायी मुकेश ठाकुरानी से जुड़ा है, जिन पर एक महिला ने शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने, धमकी देने और अप्राकृतिक कृत्य करने जैसे गंभीर आरोप लगाए थे।
अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि दोनों पक्षों के बीच संबंध लंबे समय तक आपसी सहमति से बने रहे थे। ऐसे में बाद में उत्पन्न हुए विवाद के आधार पर दुष्कर्म का मामला दर्ज करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
प्रकरण के अनुसार, वर्ष 2003 में मुकेश ठाकुरानी का विवाह हुआ था और उनके दो बच्चे हैं। मई 2019 में पत्नी से विवाद के बाद उनकी पत्नी बच्चों को लेकर मायके चली गई और उनके खिलाफ दहेज प्रताड़ना व भरण-पोषण का मामला दर्ज कराया। इसी दौरान 10 मई 2019 को कोर्ट परिसर में उनकी मुलाकात एक 24 वर्षीय महिला से हुई, जो अपने पति के खिलाफ चल रहे मामले के सिलसिले में वहां आती थी।
धीरे-धीरे दोनों के बीच बातचीत बढ़ी और उन्होंने एक-दूसरे की पारिवारिक परिस्थितियों को साझा किया। महिला ने स्वयं को पति से प्रताड़ित बताया, जबकि मुकेश ने अपने वैवाहिक विवाद की जानकारी दी। इसी क्रम में दोनों के बीच निकटता बढ़ी और महिला ने लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का प्रस्ताव रखा। उसने यह भी कहा कि भविष्य में दोनों अपने-अपने जीवनसाथियों से तलाक लेकर विवाह कर सकते हैं।
इसके बाद सितंबर 2019 में महिला अपनी मां और दो वर्षीय बेटी के साथ मुकेश के घर रहने आ गई। प्रारंभिक दिनों में संबंध सामान्य रहे, लेकिन समय के साथ दोनों के बीच विवाद शुरू हो गया। याचिकाकर्ता के अनुसार, इस दौरान घर से नकदी और जेवरात गायब होने लगे, जिसे लेकर दोनों के बीच तनाव बढ़ गया। आरोप है कि करीब 15 लाख रुपये नकद और सोना घर से गायब हो गया।
मार्च 2020 में महिला घर छोड़कर चली गई और कथित रूप से मुकेश को जेल भिजवाने की धमकी दी। इसके बाद 25 जुलाई 2020 को कटनी के महिला थाने में महिला ने भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(n), 377, 294 और 506 के तहत एफआईआर दर्ज कराई। महिला ने आरोप लगाया कि मुकेश ने शादी का झांसा देकर उसके साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए, आपत्तिजनक वीडियो बनाकर ब्लैकमेल किया और उसकी बेटी को नुकसान पहुंचाने की धमकी देकर जबरन संबंध बनाए।
एफआईआर दर्ज होने के अगले दिन पुलिस ने मुकेश को गिरफ्तार कर लिया और अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया। करीब 25 दिनों तक जेल में रहने के बाद 20 अगस्त 2020 को उन्हें हाईकोर्ट से जमानत मिली।
मामले को चुनौती देते हुए मुकेश ठाकुरानी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की और कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए सभी आरोप निराधार हैं। उन्होंने दावा किया कि संबंध पूरी तरह सहमति से बने थे और बाद में व्यक्तिगत विवाद के चलते झूठा मामला दर्ज कराया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष दत्त ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि महिला स्वयं विवाहित थी और उसका एक बच्चा भी है। वह इस तथ्य से भली-भांति अवगत थी कि अपने पति से विधिवत तलाक लिए बिना वह दूसरा विवाह नहीं कर सकती। ऐसे में विवाह का आश्वासन देने का आरोप अव्यावहारिक और असत्य है।
उन्होंने यह भी कहा कि महिला और मुकेश के बीच लगभग डेढ़ वर्ष तक सहमति से संबंध रहे। पुलिस जांच में भी यह स्पष्ट हुआ कि आरोपी के मोबाइल फोन में कोई आपत्तिजनक वीडियो नहीं मिला। साइबर सेल को भी ब्लैकमेलिंग के आरोपों के समर्थन में कोई साक्ष्य नहीं मिला। साथ ही तलाशी के दौरान कथित रूप से इस्तेमाल की गई तलवार भी बरामद नहीं हुई।
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि महिला ने अपने पति के साथ दोबारा रहने के बाद सामाजिक प्रतिष्ठा बनाए रखने के उद्देश्य से झूठी एफआईआर दर्ज कराई। इस संबंध में प्रस्तुत दस्तावेजों और बयानों के आधार पर यह स्पष्ट हुआ कि दोनों पक्षों के बीच संबंध स्वेच्छा से स्थापित हुए थे और समय के साथ उनमें दरार आ गई।
अदालत ने सभी तथ्यों, साक्ष्यों और परिस्थितियों का परीक्षण करने के बाद पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया विश्वसनीय नहीं हैं। अदालत ने कहा कि यदि कोई महिला अपनी मर्जी से किसी पुरुष के साथ लिव-इन में रहती है और लंबे समय तक सहमति से संबंध बनाए रखती है, तो बाद में उत्पन्न विवाद के आधार पर दुष्कर्म का मामला दर्ज करना कानून की मंशा के अनुरूप नहीं है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर मामला अपने तथ्यों पर निर्भर करता है और जहां वास्तविक धोखाधड़ी या जबरदस्ती के प्रमाण हों, वहां कानून सख्ती से लागू होगा। लेकिन इस मामले में उपलब्ध साक्ष्य ऐसे नहीं थे जो दुष्कर्म या आपराधिक धमकी के आरोपों को सिद्ध कर सकें।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने कटनी के महिला थाने में दर्ज एफआईआर को रद्द करते हुए मुकेश ठाकुरानी को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। अदालत के इस फैसले को लिव-इन रिलेशनशिप और सहमति से बने संबंधों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण दृष्टांत के रूप में देखा जा रहा है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय इस बात को रेखांकित करता है कि सहमति और आपसी समझ के आधार पर बने संबंधों को बाद में आपराधिक विवाद का रूप देने से पहले ठोस साक्ष्यों की आवश्यकता होती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य निर्दोष व्यक्तियों को झूठे आरोपों से बचाना भी है, साथ ही वास्तविक पीड़ितों को न्याय दिलाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इस फैसले के साथ ही एक बार फिर यह सवाल सामने आया है कि लिव-इन रिलेशनशिप जैसे निजी संबंधों में उत्पन्न विवादों को किस प्रकार कानूनी कसौटी पर परखा जाए। अदालत ने अपने निर्णय में संतुलन बनाते हुए यह संदेश दिया है कि सहमति, परिस्थितियां और साक्ष्य—तीनों ही किसी भी आपराधिक मामले में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

 

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