खेड़ीरामोसी सीमांकन विवाद: आदिवासी असंतोष के बीच सियासी समीकरणों की बिसात बिछी, जयस की चुप्पी पर उठे सवाल ?
By,वामन पोटे
खेड़ीरामोसी सीमांकन विवाद: आदिवासी असंतोष के बीच सियासी समीकरणों की बिसात बिछी, जयस की चुप्पी पर उठे सवाल ?
बैतूल 28 मार्च।। मुलताई क्षेत्र के ग्राम खेड़ीरामोसी में जमीन सीमांकन को लेकर शुरू हुआ विवाद अब महज प्रशासनिक मुद्दा न रहकर राजनीतिक रंग लेता जा रहा है। भाजपा युवा मोर्चा अध्यक्ष भास्कर मगरदे से जुड़े इस प्रकरण में 34 आदिवासियों पर दर्ज एफआईआर ने पूरे मामले को संवेदनशील बना दिया है। आदिवासी समाज में बढ़ते असंतोष के बीच कांग्रेस, भाजपा और जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) की रणनीतियां चर्चा के केंद्र में हैं, वहीं इस घटनाक्रम के चुनावी असर को लेकर भी अटकलें तेज हो गई हैं।
घटना के बाद से जहां कांग्रेस ने आक्रामक रुख अपनाते हुए पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपकर एफआईआर रद्द करने की मांग की है, वहीं भाजपा फिलहाल सतर्क और संयमित रणनीति पर चलती नजर आ रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा इस मामले में खुलकर पक्ष लेने से बच रही है, ताकि आदिवासी वर्ग में नकारात्मक संदेश न जाए। वहीं कांग्रेस इस मुद्दे को आदिवासी अस्मिता और अधिकारों से जोड़कर सरकार को घेरने की कोशिश में जुटी है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) की चुप्पी ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं। 34 आदिवासियों पर एफआईआर दर्ज होने के पांच दिन बाद भी संगठन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसे लेकर आदिवासी समाज के भीतर असंतोष उभर रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि आदिवासी अधिकारों की लड़ाई का दावा करने वाला संगठन ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर मौन क्यों है। कुछ लोग इसे संगठन की रणनीतिक चुप्पी बता रहे हैं, तो कुछ इसे नेतृत्व की कमजोरी के रूप में देख रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, जयस की यह चुप्पी दो तरह से देखी जा रही है। एक, संगठन स्थिति को भांपकर सही समय का इंतजार कर रहा है, ताकि वह अधिक प्रभावी तरीके से हस्तक्षेप कर सके। दूसरा, यह भी संभावना जताई जा रही है कि संगठन आंतरिक रणनीतिक उलझनों या राजनीतिक दबाव के चलते खुलकर सामने नहीं आ पा रहा है। हालांकि, यदि यह चुप्पी लंबी खिंचती है, तो इसका सीधा असर संगठन की विश्वसनीयता पर पड़ सकता है।
इधर प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में है। सीमांकन के दौरान पर्याप्त तैयारी के बिना जेसीबी मशीन के साथ मौके पर पहुंचना और हालात बिगड़ने की आशंका को नजरअंदाज करना अब चर्चा का विषय बन गया है। सूत्रों के अनुसार, पुलिस अब “दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है” वाली रणनीति पर काम कर रही है और आगे की कार्रवाई में अतिरिक्त सतर्कता बरत रही है। प्रशासनिक स्तर पर यह भी माना जा रहा है कि शुरुआती चूक ने स्थिति को अनावश्यक रूप से संवेदनशील बना दिया।
सत्ता संगठन और संघ से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक स्तर पर भी गहन मंथन चल रहा है। भाजपा के लिए चुनौती यह है कि वह अपने स्थानीय नेतृत्व का समर्थन बनाए रखते हुए आदिवासी वर्ग की नाराजगी को भी संतुलित करे। वहीं कांग्रेस इस अवसर को आदिवासी हितों के मुद्दे पर जनसमर्थन जुटाने के रूप में देख रही है।
जहां तक चुनावी असर का सवाल है, विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह मुद्दा लंबा खिंचता है और आदिवासी समाज में असंतोष गहराता है, तो यह आगामी चुनावों में एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। बैतूल जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्र में इस तरह के घटनाक्रम अक्सर राजनीतिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में सभी दलों की नजर इस बात पर है कि जनता का मूड किस दिशा में जाता है।
फिलहाल स्थिति यह है कि तीनों प्रमुख पक्ष—कांग्रेस, भाजपा और जयस—अपने-अपने तरीके से स्थिति का आकलन कर रहे हैं। कांग्रेस खुलकर मैदान में है, भाजपा रणनीतिक चुप्पी के साथ हालात पर नजर बनाए हुए है, जबकि जयस की खामोशी सबसे बड़ा सवाल बनी हुई है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विवाद सिर्फ प्रशासनिक समाधान तक सीमित रहता है या फिर आदिवासी अस्मिता और राजनीतिक ध्रुवीकरण का बड़ा मुद्दा बनकर उभरता है। फिलहाल, यह मामला सचमुच “भविष्य के गर्भ” में है, लेकिन इसके राजनीतिक निहितार्थ दूरगामी हो सकते हैं।
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