गंदगी के ढेर पर ‘गिलहरी’ का जुगाड़: 10 साल से एक ही कंपनी पर भरोसा, बैतूल की सफाई व्यवस्था सवालों में
By ,वामन पोटे
गंदगी के ढेर पर ‘गिलहरी’ का जुगाड़: 10 साल से एक ही कंपनी पर भरोसा, बैतूल की सफाई व्यवस्था सवालों में
बैतूल, 2 अप्रैल वार्ता।। स्वच्छ सर्वेक्षण 2026 की तैयारियों के बीच नगर पालिका ने ‘गिलहरी अभियान’ शुरू कर शहर को साफ-सुथरा बनाने का दावा किया है, लेकिन जमीनी हकीकत इस दावे पर सवाल खड़े कर रही है। शहर में रोजाना 40 से 50 टन कचरा निकल रहा है, फिर भी सड़कों, गलियों और सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी का आलम किसी से छिपा नहीं है।
हनुमान जयंती के अवसर पर शुरू किए गए इस अभियान का उद्देश्य लोगों को गीला और सूखा कचरा अलग-अलग देने के लिए प्रेरित करना है। नगर पालिका प्रशासन का कहना है कि गिलहरी की तरह छोटी-छोटी कोशिशों से बड़ा बदलाव लाने की सोच के साथ यह पहल की गई है। डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण करने वाले कर्मचारी घर-घर जाकर नागरिकों को जागरूक करेंगे।
लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल जागरूकता अभियान से वर्षों से जमी गंदगी की समस्या हल हो पाएगी?
नगरपालिका के आंकड़ों के अनुसार शहर के 33 वार्डों से प्रतिदिन भारी मात्रा में कचरा निकलता है, जिसमें लगभग आधा गीला और शेष सूखा कचरा होता है। इसे 39 कचरा वाहनों और 5 ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के जरिए गौठाना स्थित ट्रेंचिंग ग्राउंड तक पहुंचाया जाता है। बावजूद इसके शहर में कई स्थानों पर कचरे के ढेर आम दृश्य बने हुए हैं, जो कचरा प्रबंधन की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करते हैं।
सबसे बड़ा विवाद डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण के टेंडर को लेकर है। पिछले 10 वर्षों से लगातार एक ही कंपनी—ओम साईं विजन—को यह जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। इस बार भी तीन कंपनियों ने टेंडर प्रक्रिया में हिस्सा लिया, लेकिन शर्तों पर खरी न उतर पाने के कारण दो कंपनियां बाहर हो गईं और ठेका फिर उसी कंपनी को मिल गया।
यह स्थिति कई तरह के सवाल खड़े करती है—क्या टेंडर प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है? क्या नगर पालिका ने वैकल्पिक कंपनियों को मौका देने के लिए पर्याप्त प्रयास किए? और सबसे अहम, जब सफाई व्यवस्था को लेकर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं, तो फिर उसी एजेंसी पर बार-बार भरोसा क्यों?
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि शहर में नियमित कचरा उठाव नहीं हो रहा, कई जगहों पर कचरा दिनों तक पड़ा रहता है और बदबू व बीमारी का खतरा बना रहता है। ऐसे में केवल ‘अभियान’ चलाकर तस्वीर बदलने का दावा करना वास्तविकता से दूर नजर आता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्वच्छता केवल जनजागरूकता से नहीं, बल्कि मजबूत मॉनिटरिंग, जवाबदेही और पारदर्शी सिस्टम से ही संभव है। जब तक कचरा संग्रहण और निस्तारण की व्यवस्था में सुधार नहीं होगा, तब तक ऐसे अभियान महज औपचारिकता बनकर रह जाएंगे।
अब देखना होगा कि ‘गिलहरी अभियान’ वास्तव में शहर की सफाई व्यवस्था में कोई ठोस बदलाव ला पाता है या यह भी पहले की तरह सिर्फ कागजी कवायद बनकर रह जाता है।
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