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जन्म से मृत्यु तक हर रस्म में शराब, रिश्तों के सख्त नियम और सामुदायिक न्याय व्यवस्था

By,वामन पोटे

परंपराओं का संसार: कोया जनजाति में जन्म से मृत्यु तक हर रस्म में शराब, रिश्तों के सख्त नियम और सामुदायिक न्याय व्यवस्था

मलकानगिरी (ओडिशा), 29 अप्रैल ।।
ओडिशा के मलकानगिरी जिले से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित राखेलगुड़ा गांव में रहने वाली कोया जनजाति आज भी अपनी विशिष्ट परंपराओं और रीति-रिवाजों को पूरी तरह निभा रही है। यहां जीवन के हर पड़ाव—जन्म, विवाह और मृत्यु—से जुड़ी रस्मों में महुआ से बनी शराब का विशेष महत्व है।
शाम के समय गांव में एक विवाह समारोह के दौरान अनोखा दृश्य देखने को मिलता है। रंग-बिरंगी रोशनी से सजा घर, ढोल की थाप और आंगन में पंक्तिबद्ध बैठी महिलाएं—जिनके सामने पत्तों के दोने रखे होते हैं। एक महिला सिर पर मटका रखकर आती है, जिसमें महुआ की शराब भरी होती है। वह सभी महिलाओं को शराब परोसती है, जबकि दूसरी महिला भुनी सोयाबीन बांटती है। गीतों के बीच महिलाएं सामूहिक रूप से शराब पीते हुए जश्न मनाती हैं। इस दौरान पुरुषों की मौजूदगी नहीं होती।
कोया समुदाय में विवाह के नियम भी बेहद सख्त हैं। यहां परंपरा के अनुसार युवक का विवाह उसकी सगी बुआ की बेटी से कराया जाता है। यदि ऐसा संभव न हो, तो परिवार की किसी अन्य नजदीकी रिश्तेदारी में ही विवाह किया जाता है। समुदाय के बुजुर्गों के अनुसार, इस परंपरा का उद्देश्य परिवार के भीतर विश्वास और सामाजिक संरचना को बनाए रखना है।
समाज के नियमों का उल्लंघन करने वालों के लिए कठोर दंड का प्रावधान है। यदि कोई युवक या युवती समुदाय के बाहर विवाह करता है, तो उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है। इतना ही नहीं, ऐसे व्यक्ति का जीवित रहते हुए ही ‘पिंडदान’ कर दिया जाता है, जो सामाजिक रूप से मृत घोषित किए जाने के समान माना जाता है।

विवाह की रस्मों में पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है। पुरोहित दूल्हे की कलाई में घास की गांठ बांधता है और मंत्रोच्चार के बीच दूल्हा-दुल्हन का हाथ मिलवाता है। रस्म पूरी होने के बाद महिलाएं फिर से नाच-गाना और शराब पीने में जुट जाती हैं।
कोया समाज में सामुदायिक सहयोग की परंपरा भी मजबूत है। विवाह जैसे आयोजनों में पूरे गांव के लोग योगदान देते हैं।

कोई महुआ लाता है, तो कोई मुर्गी, बकरी या मछली। कई दिनों तक महिलाएं जंगल से महुआ एकत्र कर शराब तैयार करती हैं।
गांव के घर भले ही मिट्टी के बने हों, लेकिन साफ-सफाई और सादगी उनकी खास पहचान है। बांस के बाड़े, ताड़ के पत्तों की छत और सीमित संसाधनों के बावजूद व्यवस्थित जीवनशैली यहां देखने को मिलती है।

कोया जनजाति में बच्चों के नामकरण की परंपरा भी अलग है। बच्चों का नाम उनके जन्म के दिन के आधार पर रखा जाता है, जैसे शुक्रवार को जन्मे बच्चे का नाम ‘शुक्री’ और गुरुवार को जन्मे का ‘गुरु’।
समुदाय अपने विवादों का समाधान भी स्वयं करता है। किसी भी प्रकार के झगड़े या विवाद को पुलिस या अदालत तक नहीं ले जाया जाता। इसके बजाय, समुदाय के एक सम्मानित बुजुर्ग—जिसे ‘पेद्दा’ कहा जाता है—को निर्णय लेने की जिम्मेदारी दी जाती है। वही जुर्माना तय करता है और सभी को उसका पालन करना होता है।
कोया जनजाति मुख्य रूप से ओडिशा, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ में निवास करती है। इनकी कुल आबादी करीब 9 लाख बताई जाती है, जिनमें से लगभग डेढ़ लाख लोग मलकानगिरी जिले में रहते हैं।
इस प्रकार, आधुनिकता के प्रभाव के बावजूद कोया समाज अपनी परंपराओं, सामाजिक नियमों और सांस्कृतिक पहचान को मजबूती से संजोए हुए है, जो उन्हें अन्य समुदायों से अलग बनाती है। साभार

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