जनसुनवाई में भरोसे की बाढ़: नए कलेक्टर की सक्रियता से कलेक्ट्रेट बना उम्मीद का केंद्र
बैतूल, 29 अप्रैल।।बैतूल
जिला मुख्यालय स्थित कलेक्ट्रेट में मंगलवार को आयोजित जनसुनवाई इस बार महज एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं रही, बल्कि यह आम लोगों के बढ़ते भरोसे और उम्मीदों का प्रतीक बनकर सामने आई। नवागत कलेक्टर डॉ. सौरभ सोनवणे के पदभार संभालने के महज तीन सप्ताह के भीतर ही प्रशासनिक कार्यशैली में आए बदलाव का असर साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। यही वजह है कि इस बार जनसुनवाई में फरियादियों का अभूतपूर्व हुजूम उमड़ पड़ा।
सुबह से ही कलेक्ट्रेट परिसर में लोगों की लंबी कतारें लगना शुरू हो गई थीं। स्थिति यह रही कि सभा कक्ष के भीतर ही नहीं, बल्कि बाहर तक लोगों की भीड़ दिखाई दी। हर व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत समस्या लेकर पहुंचा था, जो इस बात का संकेत है कि लोग अब सीधे कलेक्टर तक अपनी बात पहुंचाने को अधिक प्रभावी मानने लगे हैं। कई बुजुर्गों ने भी स्वीकार किया कि वर्षों से जनसुनवाई होती आ रही है, लेकिन इस तरह का व्यक्तिगत स्तर पर उमड़ा जनसैलाब उन्होंने पहली बार देखा।
भीड़ को संभालने के लिए प्रशासन को अतिरिक्त व्यवस्थाएं करनी पड़ीं। जहां पहले एक ही काउंटर पर आवेदन लिए जाते थे, वहीं इस बार तीन काउंटर संचालित करने पड़े। इसके बावजूद आवेदकों की संख्या कम होने का नाम नहीं ले रही थी। तय समय दोपहर 1 बजे के बाद भी लोग अपनी बारी का इंतजार करते नजर आए। करीब डेढ़ बजे जब कलेक्टर सभाकक्ष से बाहर निकले, तब भी बड़ी संख्या में लोग आवेदन लिए खड़े थे।
लोगों के इस उत्साह और विश्वास के पीछे कलेक्टर की कार्यशैली को प्रमुख कारण माना जा रहा है। जनसुनवाई में पहुंचे कई आवेदकों ने बताया कि कलेक्टर पहले उन्हें सम्मानपूर्वक बैठाते हैं, फिर धैर्यपूर्वक पूरी समस्या सुनते हैं और मौके पर ही संबंधित अधिकारियों को समाधान के निर्देश देते हैं। इस तरह की संवेदनशीलता और तत्परता ने आमजन के मन में प्रशासन के प्रति नई उम्मीद जगा दी है।
हालांकि, इस बढ़ती भीड़ का एक दूसरा पहलू भी सामने आता है। यह स्थिति ब्लॉक स्तर पर जनसुनवाई की कमजोर व्यवस्था की ओर इशारा करती है। कलेक्टर द्वारा लगातार ब्लॉक स्तर पर जनसुनवाई को प्रभावी बनाने के निर्देश दिए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। लोगों का कहना है कि ब्लॉक स्तर पर न तो अधिकारी नियमित रूप से उपलब्ध रहते हैं और न ही शिकायतों के समाधान में अपेक्षित गंभीरता दिखाई जाती है। यही कारण है कि लोग छोटी-छोटी समस्याओं के लिए भी जिला मुख्यालय का रुख कर रहे हैं।
ग्रामीणों को कलेक्ट्रेट तक पहुंचने में समय और आर्थिक संसाधनों की भी खपत होती है, फिर भी वे ब्लॉक स्तर की व्यवस्था पर भरोसा करने के बजाय यहां आना अधिक सुरक्षित और प्रभावी समझ रहे हैं। यह स्थिति प्रशासन के लिए एक चुनौती भी है, क्योंकि अधिकांश शिकायतों का निराकरण अंततः ब्लॉक स्तर पर ही होना होता है।
जनसुनवाई में आए मामलों पर नजर डालें तो यह स्पष्ट होता है कि समस्याएं विविध प्रकार की हैं—भूमि पट्टा, नक्शा सुधार, पेयजल संकट, ऋण पुस्तिका, निर्माण कार्यों की जांच और रास्ते के विवाद जैसी समस्याएं प्रमुख रहीं। कलेक्टर ने सभी मामलों में संबंधित अधिकारियों को समयबद्ध निराकरण के निर्देश दिए, जिससे आवेदकों में संतोष का भाव नजर आया।
अब देखना यह होगा कि कलेक्टर की यह सक्रियता और सख्ती ब्लॉक स्तर तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंच पाती है। यदि ब्लॉक स्तर पर भी इसी प्रकार की संवेदनशील और जवाबदेह व्यवस्था विकसित हो जाती है, तो न केवल कलेक्ट्रेट पर बढ़ता दबाव कम होगा, बल्कि आमजन को भी स्थानीय स्तर पर ही त्वरित समाधान मिल सकेगा।

फिलहाल, जनसुनवाई में उमड़ी भीड़ यह साफ संकेत दे रही है कि प्रशासनिक कार्यशैली में बदलाव से जनता का भरोसा तेजी से लौट रहा है। यह भरोसा कायम रखना और उसे निचले स्तर तक पहुंचाना ही अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ी कसौटी है।