“भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के गृह जिले में ‘कन्यादान’ बना तमाशा: दूल्हा-दुल्हन जमीन पर, अफसर-नेता कुर्सियों पर”
By,वामन पोटे
“भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के गृह जिले में ‘कन्यादान’ बना तमाशा: दूल्हा-दुल्हन जमीन पर, अफसर-नेता कुर्सियों पर”
बैतूल, 30 अप्रैल।
मध्यप्रदेश सरकार की बहुचर्चित मुख्यमंत्री कन्यादान विवाह योजना, जो गरीब बेटियों को सम्मानजनक विवाह का सपना दिखाती है, बैतूल जिले में बदइंतजामी और संवेदनहीनता की मिसाल बनकर उभरी है। खास बात यह है कि यह पूरा घटनाक्रम उस जिले में सामने आया है, जो भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का गृह जिला है। इसके बावजूद जनपद पंचायत और नगर पंचायत के जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों की लापरवाही ने न केवल योजना की साख पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि सरकार की छवि को भी कठघरे में ला खड़ा किया है।
भीमपुर ब्लॉक में 29 अप्रैल को आयोजित सामूहिक विवाह सम्मेलन में जो तस्वीरें सामने आईं, वे किसी भी संवेदनशील समाज के लिए असहज करने वाली हैं। जहां एक ओर मंच पर नेताओं की भीड़, फोटो सेशन और प्रचार की होड़ दिखी, वहीं दूसरी ओर दूल्हा-दुल्हन—जिन्हें इस आयोजन का केंद्र होना चाहिए था—उपेक्षा और अव्यवस्था के बीच जूझते नजर आए।
तेज धूप, भीषण गर्मी और पीने के पानी तक की समुचित व्यवस्था नहीं—यह हालात किसी आपदा जैसे थे। ग्रामीणों का आरोप है कि ठंडे पानी की व्यवस्था तक नहीं की गई, और जो पानी उपलब्ध था, वह टैंकर में गर्म हो चुका था। शादी जैसे पवित्र आयोजन में मेहमानों और नवविवाहित जोड़ों को इस तरह की मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखना प्रशासन की गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।
सबसे ज्यादा आक्रोश उस समय देखने को मिला जब दूल्हा-दुल्हन को भोजन के लिए लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ा। कई घंटों के इंतजार के बाद जब भोजन मिला, तो बैठने के लिए न कुर्सी थी, न टेबल और न ही चटाई। नवविवाहित जोड़े खुले मैदान में जमीन पर बैठकर भोजन करने को मजबूर हुए। यह दृश्य न केवल अपमानजनक था, बल्कि उस सम्मान के भी विपरीत था, जिसका दावा इस योजना के तहत किया जाता है।
विडंबना यह रही कि जहां दूल्हा-दुल्हन जमीन पर बैठकर भोजन कर रहे थे, वहीं अधिकारी और जनप्रतिनिधि आराम से कुर्सी-टेबल पर बैठकर भोजन का आनंद लेते नजर आए। यह दोहरी व्यवस्था प्रशासनिक संवेदनहीनता और सामाजिक असमानता की स्पष्ट तस्वीर पेश करती है।
ग्रामीणों ने नाराजगी जताते हुए कहा कि “कन्यादान के नाम पर यह सिर्फ दिखावा हो रहा है। नेताओं को अपनी फोटो और प्रचार से मतलब है, जबकि गरीबों के सम्मान की किसी को चिंता नहीं।” कई ग्रामीणों ने यह भी कहा कि यदि यही हाल रहा, तो लोग इस योजना से दूरी बनाना ही बेहतर समझेंगे।
दूल्हा-दुल्हन भी इस अव्यवस्था से खासे नाराज दिखे। जीवन के सबसे महत्वपूर्ण दिन पर जिस गरिमा और सम्मान की उम्मीद होती है, वह पूरी तरह नदारद रही। कई नवविवाहितों ने इसे “अपमानजनक अनुभव” बताते हुए कहा कि “हमने सोचा था कि सरकार हमें सम्मान देगी, लेकिन यहां तो हमें सामान्य मेहमान जैसा व्यवहार भी नहीं मिला।”
आरोप यह भी लग रहे हैं कि योजना के लिए आवंटित संसाधनों और बजट का सही उपयोग नहीं किया गया। जनपद पंचायत और नगर पंचायत के अधिकारियों-कर्मचारियों की उदासीनता और लापरवाही ने पूरे आयोजन को मजाक बना दिया। सवाल यह उठ रहा है कि जब इतने बड़े स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किया जाता है, तो क्या न्यूनतम व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी तय नहीं होती?
यह पूरा मामला अब “जग हंसाई” का कारण बन चुका है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरें और वीडियो न केवल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं, बल्कि सरकार की योजनाओं की जमीनी हकीकत भी उजागर कर रहे हैं।
जिले के जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी भी कई सवाल खड़े कर रही है। क्या यह सब उनकी जानकारी में नहीं था, या फिर जानबूझकर अनदेखी की गई? कलेक्टर और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से अब यह अपेक्षा की जा रही है कि वे इस मामले में सख्त रुख अपनाएं और जिम्मेदारों पर कार्रवाई करें।
घोड़ाडोंगरी में होने वाले आगामी सामूहिक विवाह समारोह को लेकर अब प्रशासन की अग्निपरीक्षा होगी। यदि इस बार भी व्यवस्थाएं नहीं सुधरीं, तो यह साफ हो जाएगा कि प्रशासन ने पिछली गलतियों से कोई सबक नहीं लिया।
कन्यादान जैसी संवेदनशील योजना, जिसका उद्देश्य गरीब परिवारों को सम्मान देना है, यदि इस तरह अव्यवस्था और दिखावे की भेंट चढ़ती रही, तो यह केवल सरकारी योजनाओं पर अविश्वास ही बढ़ाएगी। जरूरत इस बात की है कि योजनाओं को कागजों से निकालकर जमीनी हकीकत में सम्मान और संवेदनशीलता के साथ लागू किया जाए—वरना “कन्यादान” जैसे पवित्र शब्द भी केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगे।