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—”हमें अब भाषण नहीं, बदलाव चाहिए।” वादों की धुंध में खोया कुकरू: तीन मुख्यमंत्री आए, सपने जगाए… अब गांव पूछ रहा है—क्या इस बार बदलेगी तकदीर?

By, वामन पोटे

—”हमें अब भाषण नहीं, बदलाव चाहिए।”
वादों की धुंध में खोया कुकरू: तीन मुख्यमंत्री आए, सपने जगाए… अब गांव पूछ रहा है—क्या इस बार बदलेगी तकदीर?

बैतूल, 30 जून (वामन पोटे)। सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच बसा कुकरू हर बार किसी मुख्यमंत्री के आगमन पर उम्मीदों से भर उठता है। गांव की पगडंडियां सजती हैं, मंच तैयार होते हैं, विकास के नए सपने दिखाए जाते हैं और ग्रामीणों को भरोसा दिलाया जाता है कि अब उनका इलाका मध्यप्रदेश के पर्यटन मानचित्र पर नई पहचान बनाएगा। लेकिन जैसे ही सरकारी काफिले लौटते हैं, कुकरू फिर उसी खामोशी में डूब जाता है, जहां पिछले दो दशकों से एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या विकास सिर्फ घोषणाओं तक ही सीमित रहेगा ?
करीब 20 वर्षों में प्रदेश के तीन मुख्यमंत्री कुकरू पहुंच चुके हैं। हर बार पर्यटन, सड़क, रोजगार, कॉफी उत्पादन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के वादे किए गए। कभी इसे प्रदेश का प्रमुख हिल स्टेशन बनाने की बात हुई तो कभी महाराष्ट्र के चिखलदरा, मेलघाट और मुक्तागिरी से जोड़कर एकीकृत पर्यटन सर्किट विकसित करने की घोषणा की गई। लेकिन गांव के बुजुर्ग आज भी कहते हैं, “नेता बदले, सरकारें नहीं बदलीं, लेकिन कुकरू की किस्मत भी नहीं बदली।”
कुकरू को पर्यटन की पहचान दिलाने की शुरुआत तत्कालीन सांसद स्वर्गीय विजय कुमार खंडेलवाल के प्रयासों से हुई थी। उनके आग्रह पर तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर यहां पहुंचे। उस समय कसई गांव में वन विभाग की वैकल्पिक ऊर्जा गैसीफायर परियोजना शुरू हुई, जिसने पूरे प्रदेश का ध्यान आकर्षित किया। माना गया कि यह क्षेत्र पर्यावरण और पर्यटन विकास का नया मॉडल बनेगा। लेकिन शुरुआती उत्साह धीरे-धीरे सरकारी फाइलों तक सीमित होकर रह गया।
इसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी पत्नी साधना सिंह के साथ कुकरू पहुंचे। उन्होंने ग्रामीण महिलाओं के साथ पारंपरिक भट्टी पर मावा बनाया, स्थानीय लोगों से आत्मीय संवाद किया और पर्यटन विकास की संभावनाओं की खुलकर चर्चा की। ग्रामीण बताते हैं कि उस दौर में कुकरू का मावा भोपाल तक अपनी पहचान बना चुका था और त्योहारों के दौरान इसकी मांग बढ़ जाती थी। इससे स्थानीय दुग्ध उत्पादकों को कुछ आर्थिक लाभ भी मिला, लेकिन पर्यटन के लिए जरूरी सड़क, आवास, होटल और अन्य बुनियादी सुविधाओं का सपना अधूरा ही रहा।
अब एक बार फिर कुकरू चर्चा में है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हाल के दौरे में इसे प्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में विकसित करने का रोडमैप प्रस्तुत किया है। उन्होंने कुकरू को मुक्तागिरी, चिखलदरा और मेलघाट से जोड़कर पर्यटन सर्किट बनाने, कॉफी उत्पादन बढ़ाने, स्थानीय मावा को ब्रांड पहचान दिलाने और महिला स्व-सहायता समूहों को पर्यटन से जोड़कर रोजगार बढ़ाने की घोषणा की है। मुख्यमंत्री ने सिपना सनसेट पॉइंट का भ्रमण किया और अधिकारियों को प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण के साथ पर्यटन सुविधाओं का विस्तार करने के निर्देश भी दिए।
हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि वे अब घोषणाओं से ज्यादा जमीन पर काम देखना चाहते हैं। उनका दर्द केवल पर्यटन तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि कुकरू की पहाड़ियों पर निजी कंपनियों को विंड पावर परियोजनाओं के लिए जमीन दी गई। आज वहां विशाल पवन चक्कियां घूम रही हैं और बिजली उत्पादन हो रहा है, लेकिन स्थानीय युवाओं को रोजगार नहीं मिला। एक किसान की बात इस पीड़ा को बयां करती है—”हमारी जमीन से बिजली पूरे प्रदेश को मिली, लेकिन हमारे घरों में रोजगार की रोशनी नहीं आई।”
कुकरू की पहचान कभी वन विभाग के कॉफी बागान से भी रही है। वर्षों तक इसके विस्तार और उन्नयन की योजनाएं बनती रहीं, लेकिन ग्रामीणों का दावा है कि हर बार उन्नयन के नाम पर कॉफी बागान का रकबा घटता गया। उनका मानना है कि यदि कॉफी उत्पादन को वैज्ञानिक तरीके से बढ़ाकर किसानों को इससे जोड़ा जाता तो आज कुकरू मध्यप्रदेश का प्रमुख कॉफी उत्पादक क्षेत्र बन सकता था।
ग्रामीणों का मानना है कि पर्यटन तभी सफल होगा जब उसका सीधा लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचे। गांव की महिलाएं आज भी स्व-सहायता समूहों के माध्यम से मावा, रबड़ी और अन्य दुग्ध उत्पाद तैयार कर रही हैं, लेकिन उन्हें बड़े बाजार और प्रभावी ब्रांडिंग का इंतजार है। वहीं युवा चाहते हैं कि पर्यटन परियोजनाओं में उन्हें प्राथमिकता के आधार पर रोजगार मिले, ताकि पलायन रुक सके।
विशेषज्ञ भी मानते हैं कि कुकरू में अपार संभावनाएं हैं। घने जंगल, कॉफी बागान, ठंडी जलवायु, प्राकृतिक झरने और महाराष्ट्र की सीमा से निकटता इसे ईको-टूरिज्म के लिए आदर्श बनाती है। यदि यहां होम-स्टे, स्थानीय हस्तशिल्प, कॉफी प्रोसेसिंग, ग्रामीण पर्यटन और कृषि आधारित उद्यमों को एक साथ विकसित किया जाए तो यह क्षेत्र हजारों लोगों की आजीविका का मजबूत आधार बन सकता है।
फिलहाल कुकरू एक बार फिर उम्मीद और इंतजार के बीच खड़ा है। ग्रामीणों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इस बार घोषणाएं फाइलों से निकलकर जमीन तक पहुंचती हैं या नहीं। गांव के एक बुजुर्ग की बात पूरे क्षेत्र की भावना को शब्द देती है—”हमें अब भाषण नहीं, बदलाव चाहिए।”
अब देखना यह है कि क्या इस बार कुकरू वास्तव में मध्यप्रदेश के पर्यटन मानचित्र पर नई पहचान बना पाएगा या फिर दो दशकों से चली आ रही वादों की कहानी में एक और अध्याय जुड़ जाएगा। कुकरू की पहाड़ियां आज भी उसी जवाब का इंतजार कर रही हैं।

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