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रियायती दर पर एथेनॉल के लिए आवंटित फोर्टिफाइड चावल खुले बाजार में बेचने के आरोप; राइस मिल, डिस्टिलरी और एफसीआई अधिकारियों की कथित मिलीभगत पर जांच तेज

By, वामन पोटे

रियायती दर पर एथेनॉल के लिए आवंटित फोर्टिफाइड चावल खुले बाजार में बेचने के आरोप; राइस मिल, डिस्टिलरी और एफसीआई अधिकारियों की कथित मिलीभगत पर जांच तेज
एथेनॉल की आड़ में फोर्टिफाइड चावल का खेल! 1160 करोड़ के कथित घोटाले ने खड़े किए बड़े सवाल
बैतूल, 9 जुलाई ।।
एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी नीति अब एक बड़े कथित घोटाले के आरोपों के कारण सवालों के घेरे में आ गई है। आरोप है कि एथेनॉल निर्माण के लिए रियायती दर पर उपलब्ध कराए जाने वाले सरकारी चावल का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया जा रहा है। सबसे गंभीर आरोप यह है कि नियमानुसार एथेनॉल संयंत्रों को पुराने अथवा सामान्य चावल की आपूर्ति किए जाने के बजाय उन्हें नया फोर्टिफाइड चावल उपलब्ध कराया गया और बाद में यही चावल खुले बाजार में ऊंचे दामों पर बेचा गया। इस पूरे कथित खेल से सरकारी खजाने को लगभग 1160 करोड़ रुपये की चपत लगने का अनुमान जताया जा रहा है।
मामले में सामने आए शुरुआती तथ्यों के अनुसार, केंद्र सरकार की ओपन मार्केट सेल स्कीम (ओएमएसएस) के तहत एथेनॉल उत्पादन के लिए डिस्टिलरी संचालकों को 2,320 रुपये प्रति क्विंटल की रियायती दर पर चावल उपलब्ध कराया जाता है। इस योजना का उद्देश्य खाद्यान्न के अधिशेष भंडार का उपयोग कर एथेनॉल उत्पादन बढ़ाना और ऊर्जा क्षेत्र को मजबूती देना था। लेकिन आरोप है कि कई स्थानों पर इस नीति का दुरुपयोग करते हुए चावल को एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल करने के बजाय सीधे खुले बाजार में लगभग 2,800 रुपये प्रति क्विंटल तक बेच दिया गया।
जांच से जुड़े सूत्रों का दावा है कि इस कथित घोटाले की सबसे अहम कड़ी फोर्टिफाइड चावल का आवंटन है। नियमों के अनुसार एथेनॉल उत्पादन के लिए पुराने अथवा साधारण चावल का उपयोग किया जाना था, लेकिन कथित रूप से प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत से नया फोर्टिफाइड चावल आवंटित कर दिया गया। फोर्टिफाइड चावल की बाजार में मांग अधिक होने के कारण इसे आसानी से ऊंचे दामों पर खपाया जा सका।
आरोप है कि एथेनॉल प्लांट संचालक यह चावल सीधे राइस मिलर्स को बेच देते थे। इसके बाद राइस मिलर्स नए बारदाने में इसकी पैकिंग कर इसे कस्टम मिलिंग के चावल के रूप में सरकारी गोदामों में जमा कर देते थे। इस प्रक्रिया में उन्हें मिलिंग शुल्क भी प्राप्त होता था, जबकि दूसरी ओर धान और चावल की खरीद-बिक्री से अलग लाभ कमाया जाता था। इस तरह एक ही सरकारी चावल से कई स्तरों पर मुनाफा अर्जित किए जाने का आरोप सामने आया है।
मामले में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के कुछ अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में बताई जा रही है। आरोप है कि चावल के आवंटन, गुणवत्ता चयन और परिवहन प्रक्रिया में अनियमितताएं हुईं। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि फोर्टिफाइड चावल का आवंटन किस आधार पर किया गया और क्या इसके लिए नियमों को जानबूझकर दरकिनार किया गया।
सूत्रों के अनुसार, पूरे नेटवर्क में दलालों की भी महत्वपूर्ण भूमिका सामने आई है। आरोप है कि चावल आवंटन से जुड़ी गोपनीय जानकारी पहले ही चुनिंदा कारोबारियों और मिलर्स तक पहुंचा दी जाती थी, जिससे वे पहले से पूरी तैयारी कर लेते थे। इसके बाद कागजी प्रक्रिया पूरी कर सरकारी रिकॉर्ड में सब कुछ वैध दिखाया जाता था, जबकि वास्तविक चावल का उपयोग किसी और उद्देश्य से किया जाता था।
इस कथित घोटाले की गूंज अब कई राज्यों तक पहुंच गई है। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में एथेनॉल प्लांट और राइस मिल के बीच चावल की आवाजाही को लेकर विवाद सामने आने के बाद मामला चर्चा में आया। वारासिवनी क्षेत्र में एथेनॉल प्लांट के लिए बताए जा रहे चावल से भरा ट्रक एक राइस मिल में पकड़ा गया, जिसके बाद संबंधित मामले में एफआईआर दर्ज की गई। स्थानीय स्तर पर इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच और पूरे नेटवर्क का खुलासा करने की मांग लगातार उठ रही है।
उधर उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में भी सरकारी चावल की कथित कालाबाजारी का मामला सामने आया। प्रशासनिक जांच के दौरान सरकारी चावल से भरे दो ट्रकों को पकड़ा गया, जिनके बारे में बताया गया कि वे हरियाणा भेजे जा रहे थे। प्रारंभिक जांच में यह जानकारी सामने आने के बाद विशेष जांच समिति गठित कर पूरे प्रकरण की जांच शुरू की गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल आर्थिक अनियमितता का मामला नहीं होगा, बल्कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली और पोषण योजनाओं पर भी इसका गंभीर असर पड़ेगा। फोर्टिफाइड चावल विशेष रूप से पोषण संबंधी कार्यक्रमों और जरूरतमंद वर्गों के लिए तैयार किया जाता है। यदि ऐसा चावल एथेनॉल के नाम पर उठाकर खुले बाजार में बेचा गया है तो इससे सरकार की पोषण नीति की भी गंभीर क्षति हुई है।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि एथेनॉल के लिए सामान्य या पुराना चावल पर्याप्त था तो फिर नया फोर्टिफाइड चावल क्यों आवंटित किया गया? क्या यह केवल प्रशासनिक चूक थी या फिर सुनियोजित तरीके से लाभ पहुंचाने के लिए नियमों की अनदेखी की गई? जांच एजेंसियां अब इसी पहलू पर विशेष ध्यान केंद्रित कर रही हैं।
जांच से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि इस कथित नेटवर्क में केवल डिस्टिलरी संचालक ही नहीं, बल्कि परिवहन से जुड़े लोग, राइस मिलर्स, गोदाम प्रबंधन और कुछ सरकारी अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं। कई जिलों में रिकॉर्ड, परिवहन दस्तावेज और स्टॉक रजिस्टर की जांच की जा रही है। यह भी देखा जा रहा है कि जिन डिस्टिलरी को चावल आवंटित हुआ, उन्होंने वास्तव में कितना एथेनॉल तैयार किया और आवंटित चावल का पूरा हिसाब उपलब्ध है या नहीं।
सूत्रों का कहना है कि जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, कई नए नाम सामने आने की संभावना है। जांच एजेंसियां चावल के आवंटन से लेकर अंतिम उपयोग तक की पूरी श्रृंखला को खंगाल रही हैं। यदि दस्तावेजों और वास्तविक स्टॉक में अंतर मिलता है तो संबंधित लोगों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई भी हो सकती है।
हालांकि इस पूरे मामले में संबंधित विभागों की ओर से अभी अंतिम जांच रिपोर्ट जारी नहीं की गई है और कई आरोपों की आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है। लेकिन मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में सामने आए मामलों ने एथेनॉल नीति के क्रियान्वयन, सरकारी खाद्यान्न की निगरानी व्यवस्था और फोर्टिफाइड चावल के उपयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में जांच की दिशा और उसके निष्कर्ष तय करेंगे कि यह मामला केवल कुछ जिलों तक सीमित है या फिर देशव्यापी नेटवर्क का हिस्सा।
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