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भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के गृह जिले में आदिवासी विकासखंडों की ITI निजी हाथों में देने की तैयारी, तकनीकी शिक्षा के निजीकरण पर उठे सवाल

By, वामन पोटे

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के गृह जिले में आदिवासी विकासखंडों की ITI निजी हाथों में देने की तैयारी, तकनीकी शिक्षा के निजीकरण पर उठे सवाल
घोड़ाडोंगरी के बाद भीमपुर और शाहपुर ITI भी परम फाउंडेशन को सौंपने की तैयारी, गरीब-आदिवासी विद्यार्थियों के सामने बढ़ेगा आर्थिक बोझ; आदिवासी संगठन ने सरकार पर लगाया शिक्षा के निजीकरण का आरोप
बैतूल, 17 अगस्त। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष एवं बैतूल विधायक हेमंत खंडेलवाल के गृह जिले बैतूल में आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं को सस्ती एवं रोजगारपरक तकनीकी शिक्षा उपलब्ध कराने वाली सरकारी औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थाओं (आईटीआई) के भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। घोड़ाडोंगरी आईटीआई को निजी संस्था परम फाउंडेशन को सौंपे जाने के बाद अब आदिवासी विकासखंड भीमपुर और शाहपुर की सरकारी आईटीआई को भी निजी हाथों में देने की तैयारी ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में बहस छेड़ दी है। आरोप है कि सरकार गरीब और आदिवासी विद्यार्थियों के लिए बनाए गए करोड़ों रुपये के भवन और संसाधन निजी संस्था को सौंपकर तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण को बढ़ावा दे रही है।
आदिवासी संगठन से जुड़े जितेंद्र इवने ने सरकार के इस फैसले का कड़ा विरोध करते हुए इसे आदिवासी क्षेत्रों के विद्यार्थियों के हितों के खिलाफ बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार सोची-समझी रणनीति के तहत शिक्षा का निजीकरण कर रही है और सरकारी आईटीआई को बंद कर उनके भवन एवं संसाधन परम फाउंडेशन को दिए जा रहे हैं। उनका कहना है कि जिन संस्थानों को गरीब और आदिवासी परिवारों के बच्चों को कम खर्च में तकनीकी प्रशिक्षण देने के लिए खड़ा किया गया था, उन्हीं संस्थानों को निजी संस्था के हवाले किया जाना सीधे तौर पर गरीब विद्यार्थियों के हितों पर चोट है।
घोड़ाडोंगरी के बाद अब भीमपुर-शाहपुर की बारी
जिले में सरकारी आईटीआई को निजी संस्था को सौंपने का मामला नया नहीं है। वर्ष 2023 में घोड़ाडोंगरी की सरकारी आईटीआई को परम फाउंडेशन को सौंपा जा चुका है। उस समय संस्थान में प्रशिक्षण ले रहे विद्यार्थियों, कर्मचारियों और उपकरणों को अन्यत्र स्थानांतरित किया गया था। वर्तमान में वहां निजी संस्था द्वारा नर्सिंग से जुड़े पाठ्यक्रम संचालित किए जाने की जानकारी है।
अब भीमपुर और शाहपुर आईटीआई को भी परम फाउंडेशन को सौंपने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। कौशल विकास संचालनालय, मध्यप्रदेश के अतिरिक्त संचालक धनसिंह ठाकुर द्वारा 29 जुलाई को सभी संयुक्त संचालकों को जारी पत्र में संबंधित आईटीआई में अध्ययनरत प्रशिक्षणार्थियों, मशीनरी, औजार, उपकरण, फर्नीचर और अन्य सामग्री के स्थानांतरण एवं पुनर्व्यवस्था की कार्यवाही सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए थे। क्षेत्रीय कार्यालयों से 31 जुलाई तक विस्तृत कार्ययोजना भी मांगी गई थी।
निर्देशों में वर्ष 2025 में दो वर्षीय पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों के दूसरे वर्ष का प्रशिक्षण एवं परीक्षा निकटवर्ती सरकारी आईटीआई में कराने, वर्ष 2026 में प्रवेशित विद्यार्थियों के प्रशिक्षण की वैकल्पिक व्यवस्था करने तथा पदस्थ अधिकारियों-कर्मचारियों को अन्य आईटीआई में समायोजित करने की बात कही गई थी। इससे संकेत मिलते हैं कि दोनों संस्थानों को इसी शैक्षणिक सत्र में निजी संस्था को सौंपने की तैयारी की जा रही है।
सात ट्रेड वाली भीमपुर आईटीआई पर भी संकट
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन सरकारी आईटीआई को निजी हाथों में देने की तैयारी है, वहां विद्यार्थियों का नामांकन और ट्रेड की स्थिति क्या है। भीमपुर आईटीआई में इलेक्ट्रॉनिक्स, फिटर, सोलर, कॉस्मेटोलॉजी, COPA, मेकाट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिक वाहन जैसे करीब सात ट्रेड संचालित हैं। यहां इस वर्ष लगभग 190 विद्यार्थियों का नामांकन बताया जा रहा है।
इसी तरह शाहपुर आईटीआई में इलेक्ट्रीशियन, COPA, वेल्डर, डीजल मैकेनिक, फिटर और ड्रोन टेक्नीशियन सहित छह ट्रेड संचालित हैं। यहां 176 सीटें हैं और पिछले वर्ष सभी सीटों के भर जाने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में सवाल यह है कि यदि सरकारी आईटीआई को कम नामांकन और सीमित ट्रेड जैसी स्थितियों में सुधार के लिए विशेष रूप से विकसित करने की नीति बनाई गई थी, तो बेहतर नामांकन और अधिक ट्रेड वाली संस्थाओं को बंद करने या निजी हाथों में देने का आधार क्या है?
सरकारी प्रशिक्षण सस्ता, निजी पाठ्यक्रम महंगे
सरकारी आईटीआई बंद होने के बाद विद्यार्थियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक होगी। सरकारी संस्थानों में प्रशिक्षण अपेक्षाकृत कम खर्च में उपलब्ध होता है और विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति सहित विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ भी मिलता है। ग्रामीण और आदिवासी परिवारों के लिए यही व्यवस्था तकनीकी शिक्षा हासिल करने का सबसे सुलभ माध्यम रही है।
इसके विपरीत परम फाउंडेशन द्वारा संचालित किए जाने वाले पाठ्यक्रमों की फीस सरकारी आईटीआई की तुलना में काफी अधिक होने की बात सामने आ रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार कुछ एक वर्षीय पाठ्यक्रमों की फीस करीब 70 से 80 हजार रुपये तक हो सकती है। ऐसे में सवाल यह है कि जिस परिवार के लिए बच्चे को सरकारी आईटीआई तक भेजना मुश्किल नहीं था, क्या वह परिवार निजी संस्था की इतनी फीस वहन कर पाएगा?
फीस के लिए ऋण सुविधा उपलब्ध होने की स्थिति भी गरीब परिवारों के लिए राहत से ज्यादा भविष्य का आर्थिक बोझ बन सकती है। रोजगार मिलने के बाद ऋण चुकाने की व्यवस्था में यदि विद्यार्थी को अपेक्षित रोजगार नहीं मिला तो परिवार पर कर्ज का भार भी पड़ सकता है।
तीन ब्लॉकों के युवाओं के सामने तकनीकी शिक्षा का संकट
घोड़ाडोंगरी में सरकारी आईटीआई पहले ही बंद हो चुकी है। यदि शाहपुर आईटीआई भी निजी संस्था को सौंप दी जाती है तो घोड़ाडोंगरी और शाहपुर दोनों क्षेत्रों में सरकारी आईटीआई की सुविधा समाप्त हो जाएगी। इन दोनों क्षेत्रों में बड़ी ग्रामीण आबादी निवास करती है और बड़ी संख्या में विद्यार्थी तकनीकी शिक्षा के लिए स्थानीय संस्थानों पर निर्भर हैं।
वहीं आदिवासी बहुल भीमपुर में सरकारी आईटीआई के निजी हाथों में जाने का असर दूरदराज के गांवों के विद्यार्थियों पर पड़ सकता है। दूसरे शहरों में जाकर प्रशिक्षण लेने का मतलब विद्यार्थियों के लिए किराया, भोजन, आवास और आवागमन पर अतिरिक्त खर्च होगा। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के अनेक विद्यार्थी इसी कारण तकनीकी शिक्षा छोड़ने के लिए मजबूर हो सकते हैं।
भवन सरकार के, पाठ्यक्रम निजी संस्था के?
इस पूरे मामले का सबसे तीखा सवाल सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर उठ रहा है। जिन भवनों का निर्माण सरकार ने जनता के पैसे से कराया, जिनमें मशीनरी, उपकरण और प्रशिक्षण की सुविधाएं विकसित की गईं, वे अब निजी संस्था के उपयोग में जाने वाले हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकारी संस्थान बंद कर निजी संस्था को वही आधारभूत ढांचा उपलब्ध कराने से वास्तविक लाभ किसे होगा?
आदिवासी संगठन से जुड़े जितेंद्र इवने का आरोप है कि सरकार पहले सरकारी आईटीआई के माध्यम से आदिवासी और गरीब विद्यार्थियों को तकनीकी शिक्षा की सुविधा उपलब्ध करा रही थी और अब उसी व्यवस्था को कमजोर कर निजी संस्था को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार को इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए और आदिवासी क्षेत्रों में सरकारी तकनीकी शिक्षा को मजबूत करना चाहिए।
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर भी सवाल
आईटीआई बंद किए जाने के मुद्दे ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। घोड़ाडोंगरी के बाद अब भीमपुर और शाहपुर जैसे क्षेत्रों में सरकारी तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था कमजोर होने जा रही है, लेकिन इस फैसले के खिलाफ व्यापक राजनीतिक विरोध अब तक दिखाई नहीं दिया है।
खासकर आदिवासी क्षेत्रों के जनप्रतिनिधियों और आदिवासी समाज के हितों के लिए काम करने वाले संगठनों से यह अपेक्षा की जा रही है कि वे विद्यार्थियों के हित में सरकार के सामने मजबूती से पक्ष रखें। स्थानीय लोगों का कहना है कि किसी क्षेत्र से ऐसा संस्थान छीनना, जो युवाओं को रोजगार और स्वरोजगार की राह दिखाता हो, महज एक प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ी के भविष्य से जुड़ा विषय है।
सरकार से निर्णय की समीक्षा की मांग
आईटीआई को निजी संस्था को सौंपने की प्रक्रिया को लेकर अब सरकार से पूरे मामले की समीक्षा की मांग उठ रही है। सवाल यह भी है कि यदि सरकार का उद्देश्य तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता और रोजगार के अवसर बढ़ाना है तो पहले से संचालित और विद्यार्थियों से भरी सरकारी आईटीआई को बंद करने के बजाय इन्हीं संस्थानों में आधुनिक ट्रेड, बेहतर मशीनरी, प्रशिक्षक और प्लेसमेंट की व्यवस्था क्यों नहीं की जाती?
बैतूल जैसे आदिवासी और ग्रामीण बहुल जिले में सरकारी आईटीआई केवल प्रशिक्षण केंद्र नहीं हैं, बल्कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के युवाओं के लिए रोजगार की पहली सीढ़ी हैं। ऐसे में घोड़ाडोंगरी के बाद भीमपुर और शाहपुर आईटीआई को निजी हाथों में सौंपने की प्रक्रिया ने यह बहस तेज कर दी है कि कौशल विकास के नाम पर कहीं सरकारी तकनीकी शिक्षा का आधार ही तो कमजोर नहीं किया जा रहा।
अब निगाह इस बात पर है कि सरकार विद्यार्थियों, अभिभावकों और स्थानीय लोगों की चिंताओं को कितनी गंभीरता से लेती है और क्या इन संस्थानों को निजी हाथों में सौंपने के फैसले की समीक्षा कर आदिवासी क्षेत्रों में सरकारी तकनीकी शिक्षा को बचाने और मजबूत करने की दिशा में कदम उठाती है।

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