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बालाघाट में बच्चों की मौत पर दिपके का सियासी तंज, खुद को मुख्यमंत्री बताकर दिया इस्तीफा;

By, वामन पोटे

बालाघाट में बच्चों की मौत पर दिपके का सियासी तंज, खुद को मुख्यमंत्री बताकर दिया इस्तीफा; भाजपा विधायक ने कहा- दिमाग का इलाज कराएं
बैतूल, 13 सितंबर।। मध्य प्रदेश के बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत का मामला अब तीखी राजनीतिक बयानबाजी में बदलता जा रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने प्रभावित गांवों का दौरा करने के बाद सोशल मीडिया पर ऐसा पत्र जारी किया, जिसमें उन्होंने खुद को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बताते हुए तत्काल प्रभाव से मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने की घोषणा की। दिपके ने इस पूरे घटनाक्रम के लिए सरकार की स्वास्थ्य, पेयजल और शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित करते हुए कटाक्ष किया कि उन्हें मध्य प्रदेश की जनता की सेवा का मौका देने के लिए धन्यवाद, लेकिन वह इस जिम्मेदारी में विफल रहे।
दिपके शनिवार को बालाघाट के उन गांवों में पहुंचे, जहां उनके अनुसार पिछले करीब दो महीनों में 30 से ज्यादा आदिवासी बच्चों की मौत हुई है। उन्होंने कुंडेकसा, बोंदारी, कोरका, कोडबीरकोना और घाघाटोला गांवों में लोगों से मुलाकात कर बच्चों की बीमारी, स्वास्थ्य सुविधाओं और मौतों के कारणों की जानकारी लेने का दावा किया। उन्होंने सरकार से इस मामले में जवाबदेही तय करने की मांग की।
‘मुख्यमंत्री के रूप में नाकाम रहा, इसलिए इस्तीफा देता हूं’
दिपके ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर अंग्रेजी में पोस्ट करते हुए लिखा कि वह तत्काल प्रभाव से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे रहे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टैग करते हुए कहा कि उन्हें मध्य प्रदेश की जनता की सेवा का अवसर देने के लिए धन्यवाद, लेकिन वह इस अवसर में स्पष्ट रूप से विफल रहे।
इसके साथ साझा किए गए पत्र में दिपके ने लिखा कि बालाघाट में 30 से अधिक आदिवासी बच्चों की मौत के बाद उनकी अंतरात्मा उन्हें इस पद पर बने रहने की अनुमति नहीं देती। उन्होंने खुद को मुख्यमंत्री बताते हुए कहा कि बच्चों को समय पर आवश्यक चिकित्सा सुविधा और मदद उपलब्ध नहीं करा पाने की जिम्मेदारी वह लेते हैं।
दिपके ने यह भी कहा कि इनमें से कई बच्चों की जान संभवत: बचाई जा सकती थी और वह इस विफलता की जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। उन्होंने सरकार की संवेदनशीलता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि बच्चों की मौत के बाद की प्रतिक्रिया भी उतनी ही शर्मनाक है।
मुआवजे पर सरकार को घेरा
दिपके ने बच्चों की मौत के बाद घोषित मुआवजे को भी अपने पत्र का प्रमुख मुद्दा बनाया। उन्होंने दावा किया कि शुरुआत में प्रत्येक बच्चे के लिए दो लाख रुपये के मुआवजे की घोषणा की गई थी, जिसे आदिवासी समुदाय के विरोध के बाद बढ़ाकर चार लाख रुपये किया गया।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि मरने वाले बच्चे किसी मंत्री या विधायक के होते तो क्या चार लाख रुपये का मुआवजा पर्याप्त माना जाता? दिपके ने कहा कि इस तरह की प्रतिक्रिया से यह सवाल उठता है कि सरकार आदिवासी बच्चों के जीवन को कितनी गंभीरता से ले रही है।
हालांकि, मुआवजे और बच्चों की मौत से जुड़े प्रशासनिक तथ्यों पर सरकार का आधिकारिक पक्ष इस पोस्ट में शामिल नहीं है। ऐसे में दिपके के आरोपों को उनके राजनीतिक बयान के तौर पर ही देखा जा रहा है।
नल-जल योजना पर भी साधा निशाना
दिपके ने पेयजल व्यवस्था को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा हर घर नल योजना की सफलता का दावा किए जाने के बावजूद बालाघाट के कुछ आदिवासी इलाकों में परिवार अब भी पीने के पानी के लिए नदी पर निर्भर हैं।
उनका कहना है कि दूषित या असुरक्षित पानी का इस्तेमाल ग्रामीणों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। दिपके ने इसे सिर्फ स्वास्थ्य व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी से जुड़ा बड़ा सवाल बताया।
स्कूलों की हालत पर भी उठाए सवाल
CJP संस्थापक ने शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी सरकार को घेरा। उन्होंने दावा किया कि कई गांवों में स्कूलों की स्थिति बेहद खराब है और एक गांव में आंगनवाड़ी से लेकर कक्षा पांचवीं तक के करीब 75 बच्चे एक ही कमरे में पढ़ रहे हैं।
दिपके ने कहा कि स्थानीय आदिवासी समुदाय की ओर से बार-बार अनुरोध किए जाने के बावजूद बच्चों के लिए उचित स्कूल भवन उपलब्ध नहीं कराया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।
‘21 साल की भाजपा सरकार के बाद भी बुनियादी सुविधाएं नहीं’
दिपके ने अपने पत्र में मध्य प्रदेश में लंबे समय से भाजपा की सरकार होने का उल्लेख करते हुए कहा कि करीब 21 वर्षों के बाद भी अनेक आदिवासी परिवारों को साफ पेयजल, बेहतर स्वास्थ्य सुविधा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पाई हैं।
उन्होंने सरकार के आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि मध्य प्रदेश में 55,795 आदिवासी परिवार अब भी बिजली से वंचित हैं। साथ ही उन्होंने एनसीआरबी के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ दर्ज अपराधों में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 32 प्रतिशत है।
दिपके ने यह भी दावा किया कि राज्य में 5.41 लाख से अधिक बच्चे यानी करीब 8.60 प्रतिशत बच्चे कम वजन की श्रेणी में हैं। विधानसभा में सरकार द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने 1.36 लाख से अधिक बच्चों के कुपोषित के तौर पर पंजीकृत होने की बात कही।
सोशल मीडिया पत्रकारों ने घेरा, सवालों से असहज दिखे दिपके
बालाघाट दौरे के दौरान दिपके को कुछ सोशल मीडिया पत्रकारों के सवालों का भी सामना करना पड़ा। उनकी कार को घेरकर पत्रकारों ने पूछा कि बच्चों की मौत जैसे संवेदनशील मुद्दे पर वह राजनीति करने क्यों पहुंचे हैं और घटना के इतने समय बाद गांवों में क्यों आए।
एक महिला पत्रकार ने उनसे सवाल किया कि अब उन्हें इस घटना की सुध आई है और क्या वह यहां केवल सामग्री जुटाने के लिए आए हैं। एक अन्य पत्रकार ने भी उनके दौरे के उद्देश्य पर सवाल उठाया।
दिपके ने जवाब में कहा कि वह पहले नहीं आ पाने के लिए माफी मांगते हैं। इसके बाद एक अन्य सवाल पर उन्होंने ‘अच्छा-अच्छा’ कहते हुए अपनी गाड़ी आगे बढ़ा दी। इस घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में है।
भाजपा विधायक का पलटवार
दिपके के इस्तीफे वाले पोस्ट पर भोपाल दक्षिण-पश्चिम विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक भगवान दास सबनानी ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि दिपके को अपने दिमाग का इलाज कराना चाहिए।
सबनानी ने कहा कि मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार आपराधिक मामलों में दृढ़ता से कार्रवाई कर रही है और सागर हो या बालाघाट, सरकार गंभीर मामलों में कार्रवाई कर रही है। उन्होंने दिपके को यह भी याद दिलाया कि वह किसी सदन के सदस्य नहीं हैं और मध्य प्रदेश कोई ऐसा स्थान नहीं है जहां इस तरह के कृत्य को बर्दाश्त किया जाए।
असली सवाल अब भी बच्चों की मौत पर
बालाघाट में दिपके का ‘मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा’ वाला पत्र भले ही राजनीतिक व्यंग्य और कटाक्ष के तौर पर सामने आया हो, लेकिन इसके पीछे उठाए गए सवालों ने बच्चों की मौत, आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं, पेयजल और शिक्षा व्यवस्था को लेकर बहस तेज कर दी है।
दिपके का कहना है कि आदिवासी बच्चों की लगातार हो रही मौतें सरकारी व्यवस्था की अनदेखी का परिणाम हैं और इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। वहीं भाजपा की ओर से उनके बयान को राजनीतिक नौटंकी और गैर-जिम्मेदाराना कृत्य बताया गया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि बालाघाट में जिन बच्चों की मौत हुई, उनके वास्तविक चिकित्सकीय कारण क्या थे, प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य और पेयजल की स्थिति कितनी जिम्मेदार थी और प्रशासन ने समय रहते क्या कदम उठाए। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच इन सवालों के स्पष्ट और आधिकारिक जवाब ही पूरे मामले की गंभीरता सामने ला सकते हैं।

 

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