दल-बदल पर 10 साल की पाबंदी की मांग, कपिल सिब्बल के प्रस्ताव को CJP का समर्थन
नई दिल्ली 14 सितंबर।। पैसे या दबाव के चलते राजनीतिक पार्टी बदलने वाले सांसदों और विधायकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग तेज होती दिख रही है। वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने ऐसे जनप्रतिनिधियों पर 10 साल तक चुनाव लड़ने और सार्वजनिक पद संभालने से रोक लगाने का प्रस्ताव रखा है। सिब्बल के इस सुझाव का ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) ने समर्थन किया है। संगठन ने इसे दल-बदल की राजनीति पर अंकुश लगाने की दिशा में जरूरी कदम बताया है।
सिब्बल ने केरल के कोच्चि में ‘हॉर्स ट्रेडिंग और लोकतंत्र’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम में राजनीतिक दलों के टूटने और विधायकों के सामूहिक दल-बदल से जुड़े मौजूदा कानूनी प्रावधानों पर सवाल उठाए। उन्होंने संविधान की दसवीं अनुसूची में बदलाव की जरूरत बताई। उनका कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में कानून की एक ऐसी खामी है, जिसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर राजनीतिक दल बदलने के लिए किया जा सकता है।
दो-तिहाई सदस्यों के जाने पर नहीं लगता दल-बदल कानून
दल-बदल विरोधी कानून संविधान की दसवीं अनुसूची में शामिल है। इसके तहत किसी राजनीतिक दल के विधायक या सांसद के दूसरी पार्टी में जाने पर उसकी सदस्यता समाप्त हो सकती है। हालांकि, मौजूदा प्रावधान में एक महत्वपूर्ण अपवाद है। यदि किसी विधायी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य दूसरी पार्टी के साथ चले जाते हैं, तो इसे विलय माना जाता है और दल-बदल के आधार पर उनकी सदस्यता समाप्त नहीं होती।
सिब्बल ने इसी प्रावधान में बदलाव की वकालत की है। उनका तर्क है कि ‘विलय’ का अर्थ राजनीतिक दलों का वास्तविक विलय होना चाहिए, न कि विधायकों का सामूहिक रूप से एक दल छोड़कर दूसरे दल में चले जाना।
उनके अनुसार, कानून में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे राजनीतिक दलों को तोड़ने के लिए विधायकों की संख्या के आधार पर सामूहिक दल-बदल को कानूनी संरक्षण न मिल सके।
CJP ने बताया समय की जरूरत
सिब्बल के प्रस्ताव का CJP ने समर्थन किया है। संगठन के सह-संयोजक सौरव दास ने कहा कि पार्टी बदलने वाले निर्वाचित प्रतिनिधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई का प्रस्ताव उनके संगठन की पहले जारी मांगों के अनुरूप है।
दास के मुताबिक, यदि कोई सांसद या विधायक किसी राजनीतिक दल के चुनाव चिह्न पर चुनाव जीतता है और बाद में पैसे या दबाव के कारण दूसरी पार्टी में शामिल हो जाता है, तो ऐसे व्यक्ति के खिलाफ सख्त प्रतिबंध होना चाहिए। उन्होंने सिब्बल के 10 साल के प्रतिबंध के सुझाव का स्वागत किया।
CJP का कहना है कि निर्वाचित प्रतिनिधि को मतदाताओं ने जिस राजनीतिक दल और चुनाव चिह्न के आधार पर चुना है, उसके बाद निजी राजनीतिक लाभ के लिए दल बदलना मतदाताओं के जनादेश पर सवाल खड़ा करता है।
CJP ने 20 साल के प्रतिबंध का भी रखा था प्रस्ताव
सौरव दास ने बताया कि CJP की ओर से जारी किए गए पहले मांग-पत्र में दल-बदल करने वाले नेताओं के खिलाफ इससे भी कड़ा प्रावधान सुझाया गया था। संगठन के मांग-पत्र के पांचवें बिंदु में ऐसे लोगों को 20 साल तक किसी भी सार्वजनिक पद पर रहने और चुनाव लड़ने से रोकने की मांग की गई थी।
CJP का तर्क है कि केवल विधानसभा या संसद की सदस्यता समाप्त कर देना दल-बदल की समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। यदि कोई निर्वाचित प्रतिनिधि पैसे या दबाव के कारण पार्टी बदलता है और कुछ समय बाद फिर चुनाव लड़कर सत्ता में लौट आता है, तो इससे दल-बदल की प्रवृत्ति पर प्रभावी रोक नहीं लगती।
‘सरकार गिराने के लिए विधायकों की खरीद लोकतंत्र से धोखा’
दास ने राजनीतिक दलों में तोड़फोड़ और सरकारों को गिराने के लिए विधायकों की कथित खरीद-फरोख्त को लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि कई बार राजनीतिक दलों को तोड़ने और सरकारें गिराने के लिए बड़े पैमाने पर धन के इस्तेमाल के आरोप सामने आते रहे हैं।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों को तोड़ना, सांसदों को कथित तौर पर 50 से 100 करोड़ रुपये तक की रिश्वत देना और सरकारें गिराना देश के साथ धोखा है। उनका कहना है कि ऐसी राजनीतिक गतिविधियों को किसी भी स्थिति में सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं माना जाना चाहिए।
CJP ने मौजूदा दल-बदल विरोधी कानून को भी पुराना बताया है। संगठन का आरोप है कि सत्ता में बने रहने की राजनीतिक लालसा के कारण इस कानून का इस्तेमाल कई बार राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार किया गया है।
दसवीं अनुसूची में बदलाव पर फिर बहस
कपिल सिब्बल के बयान के बाद दल-बदल विरोधी कानून और संविधान की दसवीं अनुसूची में बदलाव की जरूरत को लेकर बहस एक बार फिर सामने आई है। दसवीं अनुसूची का उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों के राजनीतिक दल बदलने पर रोक लगाना था, लेकिन समय के साथ इसके प्रावधानों और अपवादों को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
सिब्बल का प्रस्ताव इस बहस को एक कदम आगे ले जाता है। इसमें केवल सदस्यता बचाने या खोने के सवाल के बजाय दल बदलने वाले जनप्रतिनिधियों के भविष्य के राजनीतिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है।
फिलहाल यह एक प्रस्ताव और राजनीतिक मांग के स्तर पर है। इसे लागू करने के लिए संबंधित संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों में बदलाव की आवश्यकता होगी। यदि ऐसी व्यवस्था पर आगे गंभीरता से विचार होता है, तो इससे दल-बदल, विधायकों की खरीद-फरोख्त और सरकारों की स्थिरता से जुड़े राजनीतिक विवादों पर व्यापक असर पड़ सकता है।
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