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टाटा समूह की परोपकारी विरासत बचाने की जरूरत : शरद पवार

By,वामन पोटे

टाटा समूह की परोपकारी विरासत बचाने की जरूरत : शरद पवार
मुंबई, 23 सितंबर। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के प्रमुख और पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने टाटा समूह में नेतृत्व और स्वामित्व को लेकर चल रहे विवाद के बीच टाटा ट्रस्ट के संस्थागत अधिकारों और समूह की परोपकारी विरासत की रक्षा करने की अपील की है। उन्होंने कहा है कि नेतृत्व से जुड़े मुद्दों का समाधान तय प्रक्रिया, कंपनी के अनुच्छेदों और आपसी संवाद के माध्यम से किया जाना चाहिए।
पवार ने मंगलवार को सोशल मीडिया पर जारी एक पत्र में कहा कि टाटा समूह देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाला राष्ट्रीय संस्थान है। इसलिए उसके शासन ढांचे में टाटा ट्रस्ट की संस्थागत भूमिका और अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि समूह का मालिकाना हक किसी एक व्यक्ति के पास केंद्रित करने के बजाय उस व्यवस्था को बनाए रखना चाहिए, जिसकी नींव जमशेदजी टाटा की सोच पर रखी गई थी।
उन्होंने कहा कि जमशेदजी टाटा के बाद सर दोराबजी टाटा और सर रतन टाटा ने इस विचार को आगे बढ़ाया कि कारोबार से पैदा हुई संपत्ति का लाभ समाज को मिलना चाहिए। इसी उद्देश्य से टाटा समूह में बड़ी हिस्सेदारी परोपकारी ट्रस्टों के पास रखी गई। पवार के अनुसार, सर रतन टाटा ट्रस्ट और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट सहित संबद्ध ट्रस्टों के पास टाटा संस की करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था संयोग नहीं, बल्कि सोच-समझकर तैयार किया गया स्वामित्व ढांचा है।
पवार ने कहा कि टाटा संस के माध्यम से संचालित कारोबार से मिलने वाले लाभांश का बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य, शिक्षा, अनुसंधान और ग्रामीण आजीविका जैसे क्षेत्रों में लगाया जाता है। उन्होंने महाराष्ट्र में टाटा ट्रस्ट से जुड़े संस्थानों का उल्लेख करते हुए कहा कि मुंबई स्थित टाटा मेमोरियल अस्पताल, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज और नेशनल सेंटर फॉर द परफॉर्मिंग आर्ट्स जैसे संस्थानों का देश में महत्वपूर्ण स्थान है।
उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र को इन प्रतिष्ठित परोपकारी ट्रस्टों की मेजबानी करने पर गर्व है। ट्रस्टों की भूमिका कमजोर होने से उन संस्थानों पर भी असर पड़ सकता है, जिन पर देश और राज्य के लोग निर्भर हैं। पवार ने कहा कि एक सदी से अधिक समय से ट्रस्टों ने टाटा समूह में दीर्घकालिक मालिक की भूमिका निभाते हुए अल्पकालिक मुनाफे की तुलना में मूल्यों और प्रतिष्ठा को महत्व दिया है। उनके अनुसार, इसी व्यवस्था ने टाटा नाम के प्रति लोगों का विश्वास मजबूत किया है।
पवार ने 17 सितंबर को हुई टाटा संस की बोर्ड बैठक का भी उल्लेख किया। इस बैठक में एन. चंद्रशेखरन को फरवरी 2027 में मौजूदा कार्यकाल पूरा होने के बाद पांच साल के एक और कार्यकाल के लिए कार्यकारी चेयरमैन बनाए रखने का फैसला किया गया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार प्रस्ताव के पक्ष में बोर्ड में 4-1 से मतदान हुआ। टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा ने इसका विरोध किया, जबकि ट्रस्ट के दूसरे नामित निदेशक वेणु श्रीनिवासन ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया।
बोर्ड ने टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने की दिशा में कदम उठाने का भी फैसला किया। टाटा संस के मुताबिक, कंपनी इस संबंध में भारतीय रिजर्व बैंक के दिशा-निर्देशों के अनुरूप आगे की प्रक्रिया शुरू करेगी। टाटा ट्रस्ट ने हालांकि चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति और सूचीबद्धता से जुड़े फैसलों पर आपत्ति जताई है। ट्रस्ट का तर्क है कि कंपनी के अनुच्छेदों के अनुसार चेयरमैन की नियुक्ति में ट्रस्ट द्वारा नामित निदेशकों की आवश्यक सहमति जरूरी है।
पवार ने कहा कि टाटा समूह के नेतृत्व से जुड़ा विवाद कंपनी के अनुच्छेदों में निर्धारित व्यवस्था के अनुसार सुलझाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी संस्थागत व्यवस्था की स्थिरता के लिए तय नियमों और प्रक्रियाओं का पालन जरूरी है। उनके अनुसार, टाटा समूह की दीर्घकालिक पहचान केवल उसके कारोबारी आकार से नहीं, बल्कि समाज के प्रति उसकी प्रतिबद्धता से भी जुड़ी है।
उन्होंने टाटा समूह को महाराष्ट्र से जुड़ा राष्ट्रीय संस्थान बताते हुए कहा कि इसकी परोपकारी स्वामित्व व्यवस्था की रक्षा की जानी चाहिए। पवार ने यह भी कहा कि कारोबार और समाजसेवा के बीच टाटा समूह ने जिस संबंध को स्थापित किया है, उसे आगे भी बनाए रखना देशहित में महत्वपूर्ण है।
टाटा संस के बोर्ड के फैसले और टाटा ट्रस्ट की आपत्तियों के बीच समूह में शासन, नेतृत्व, स्वामित्व और प्रस्तावित सूचीबद्धता को लेकर बहस जारी है। ऐसे में पवार की अपील ने विवाद के बीच ट्रस्ट आधारित स्वामित्व व्यवस्था और उसके सामाजिक उद्देश्यों को एक बार फिर सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

 

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